भारत समेत ब्रिक्स के सदस्य देशों ने यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का औपचारिक रूप से विरोध किया है। नई दिल्ली में आयोजित 12वीं ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक और 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की घोषणा में इसे “एकतरफा, दंडात्मक और भेदभावपूर्ण” करार दिया गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत समेत ब्रिक्स के सदस्य देशों ने यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का औपचारिक रूप से विरोध किया है।
ब्रिक्स देशों ने इसे “एकतरफा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी” बताते हुए कहा है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है।
यह रुख 18 अगस्त को नई दिल्ली में भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत आयोजित 12वीं ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक के संयुक्त मंत्रिस्तरीय बयान में सामने आया था।
सितंबर के मध्य में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में जारी नई दिल्ली घोषणा में भी इस स्थिति को दोहराया गया। संयुक्त बयान में ब्रिक्स पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रियों ने कहा कि वे ऐसे एकतरफा और संरक्षणवादी उपायों का विरोध करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं हैं।
मंत्रियों ने चिंता जताई कि CBAM जैसे उपाय विकासशील देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने, अनुकूलन क्षमता बढ़ाने और लचीलेपन को मजबूत करने के प्रयासों को प्रभावित कर सकते हैं। ब्रिक्स देशों ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) और पेरिस समझौते के तहत “साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं” (CBDR-RC) के सिद्धांत पर भी जोर दिया।
CBAM ने 1 जनवरी 2026 से अपने परिचालन चरण में प्रवेश किया। इसके तहत यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाले कार्बन-गहन उत्पादों, जैसे लोहा-इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक और बिजली पर कार्बन मूल्य से जुड़ी व्यवस्था लागू होती है। EU का कहना है कि इसका उद्देश्य “कार्बन लीकेज” को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि आयातित उत्पादों पर भी ऐसा कार्बन मूल्य लागू हो, जैसा यूरोपीय संघ में उत्पादित वस्तुओं पर होता है।
भारत समेत कई विकासशील देशों ने लंबे समय से इस व्यवस्था पर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि इससे वैश्विक दक्षिण के निर्यातकों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ सकता है। आलोचकों के अनुसार, इससे डीकार्बोनाइजेशन की लागत का एक हिस्सा उन देशों पर स्थानांतरित हो सकता है, जिनका ऐतिहासिक उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में कम रहा है।
CBAM के दायरे में आने वाले क्षेत्रों में भारत के इस्पात निर्यात पर भी इसके संभावित प्रभाव को लेकर हालिया विश्लेषण सामने आए हैं। बैठक की अध्यक्षता करने वाले केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
ब्रिक्स ने विकसित देशों से जलवायु वित्त में उल्लेखनीय वृद्धि करने, विशेष रूप से अनुकूलन के लिए अनुदान आधारित और रियायती वित्त उपलब्ध कराने तथा COP30 में सहमत न्यू कलेक्टिव क्वांटिफाइड गोल जैसे वित्तीय दायित्वों को पूरा करने का भी आह्वान किया।
CBAM के खिलाफ ब्रिक्स का यह रुख जलवायु से जुड़े व्यापारिक उपायों को लेकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की साझा चिंताओं को दर्शाता है। साथ ही, सदस्य देशों ने पेरिस समझौते और उत्सर्जन में कमी लाने के अपने प्रयासों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराते हुए ऊर्जा सुरक्षा और ऐसी व्यावहारिक जलवायु नीति की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें अलग-अलग देशों की परिस्थितियों और क्षमताओं को ध्यान में रखा जाए।
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