बेंगलुरु में यातायात की समस्या को दूर करने के लिए प्रस्तावित हेब्बल सुरंग परियोजना और लंबी उत्तर-दक्षिण सुरंग परियोजना शहर की जल सुरक्षा और पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं। विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि इन परियोजनाओं से शहर के भूजल पुनर्भरण, जलभृतों (एक्विफर्स) और बाढ़ प्रबंधन पर बुरा असर पड़ सकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: बेंगलुरु में यातायात की समस्या कम करने के उद्देश्य से प्रस्तावित सुरंग परियोजनाएं अब शहर की जल सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस का विषय बन गई हैं।
विशेषज्ञों और पर्यावरण समूहों ने आशंका जताई है कि सुरंग निर्माण से भूजल पुनर्भरण की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है, जलभृतों यानी एक्विफर की संरचना प्रभावित हो सकती है और बारिश के दौरान बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
सबसे अधिक चिंता हेब्बल क्षेत्र में प्रस्तावित करीब 2.2 किलोमीटर लंबी सुरंग को लेकर है, जो हेब्बल झील के बेहद करीब से गुजरती है। बेंगलुरु की लगभग 50 प्रतिशत पानी की जरूरत भूजल से पूरी होती है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के आकलन में हेब्बल सहित येलहंका तालुक को भूजल दोहन की दृष्टि से ‘अति-दोहित’ क्षेत्र में रखा गया है।
इस इलाके में बोरवेल सामान्यतः 700 से 800 फीट गहरे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर इनकी गहराई 1,200 फीट तक पहुंच चुकी है। वर्ष 2024 की गर्मियों में इनमें से कई बोरवेल सूख गए थे। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि भूजल पुनर्भरण के रास्तों में स्थायी बदलाव शहर के जल संकट को और गंभीर बना सकता है।
हेब्बल शॉर्ट टनल परियोजना प्रस्तावित हेब्बल शॉर्ट टनल लगभग 2.2 किलोमीटर लंबी होगी। इसका मार्ग हेब्बल फ्लाईओवर जंक्शन से शुरू होकर गांधी कृषि विज्ञान केंद्र (GKVK) परिसर से गुजरते हुए कर्नाटक पशु चिकित्सा, पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय (KVAFSU) तक जाएगा।
परियोजना में तीन लेन वाली दोतरफा सुरंग बनाने का प्रस्ताव है। इसका निर्माण कट-एंड-कवर तकनीक से किया जाना है। इसके तहत जमीन को करीब 18.5 मीटर यानी लगभग 60 फीट तक खोदा जाएगा, सुरंग का ढांचा बनाया जाएगा और उसके बाद ऊपर की सतह को ढक दिया जाएगा। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1,130 से 1,385 करोड़ रुपये बताई गई है।
यानी प्रति किलोमीटर लागत लगभग 622 करोड़ रुपये तक बैठती है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने जून 2026 में परियोजना की आधारशिला रखी थी और अगस्त की शुरुआत में KVAFSU परिसर में प्रारंभिक कार्य शुरू हो गया। बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (BDA) परियोजना की कार्यान्वयन एजेंसी है। इसे टोल-फ्री परियोजना के रूप में विकसित किया जा रहा है। परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) में हेब्बल झील के आसपास के क्षेत्र को जलवैज्ञानिक दृष्टि से संवेदनशील माना गया है।
हालांकि DPR में कहा गया है कि इंजीनियरिंग उपायों के जरिए जल संबंधी चुनौतियों को नियंत्रित किया जा सकता है। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के एक विश्लेषण में परियोजना को मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर यातायात सुधार देने वाली परियोजना बताया गया है। विश्लेषण के अनुसार, सुरंग लंबे समय में यातायात की समस्या का स्थायी समाधान करने के बजाय भीड़ को दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित कर सकती है और मॉडलिंग के मुताबिक 2047 तक इसकी क्षमता भी पर्याप्त नहीं रह सकती।
हेब्बल झील के बेहद करीब निर्माण पर्यावरण और जल विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता सुरंग की हेब्बल झील से निकटता को लेकर है। करीब 141 एकड़ में फैली यह झील बेंगलुरु की पारंपरिक झील श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रस्तावित सुरंग का कुछ हिस्सा झील की सीमा से केवल 8 से 12 मीटर की दूरी पर बताया गया है। कर्नाटक टैंक संरक्षण एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम के तहत झीलों के आसपास 30 मीटर का बफर क्षेत्र महत्वपूर्ण माना जाता है।
परियोजना के लिए लगभग 3 से 3.5 एकड़ झील भूमि अथवा बफर क्षेत्र के हस्तांतरण का भी उल्लेख किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह क्षेत्र केवल खाली जमीन नहीं है, बल्कि झील के जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और बाढ़ के दौरान अतिरिक्त पानी को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बेंगलुरु की झीलें एक-दूसरे से जुड़ी ऐतिहासिक जल प्रणाली का हिस्सा रही हैं। वर्षाजल और अतिरिक्त पानी राजकालुवे यानी स्टॉर्मवॉटर ड्रेनों के माध्यम से एक झील से दूसरी झील तक पहुंचता है।
डोड्डाबोम्मसंद्रा और जे.पी. पार्क क्षेत्र की झीलों से पानी हेब्बल झील में पहुंचता है और वहां से नागवारा तथा कल्केरे की ओर आगे बढ़ता है। शहरीकरण, अतिक्रमण और नालों के अवरुद्ध होने से यह नेटवर्क पहले ही कमजोर हो चुका है। ATREE के 2022 के एक अध्ययन में पाया गया था कि हेब्बल-नागवारा घाटी की 72 झीलों में केवल 32 में इनलेट, आउटलेट और ड्रेनेज की व्यवस्था पूरी तरह कार्यशील थी।
भूजल पुनर्भरण पर क्या होगा असर? बेंगलुरु की भूगर्भीय संरचना मुख्य रूप से कठोर चट्टानों से बनी है। यहां भूजल का संचरण चट्टानों में मौजूद दरारों, जोड़ों और ऊपर की ओर मौजूद अपक्षयित मिट्टी तथा सैप्रोलाइट परतों के माध्यम से होता है। जल विशेषज्ञों के अनुसार, झीलें, नाले और वर्षाजल इस प्राकृतिक प्रणाली में भूजल पुनर्भरण के प्रमुख स्रोत हैं। यदि जमीन को 60 फीट तक खोदकर अपक्षयित मिट्टी और ऊपरी जलधारण करने वाली परतों को हटा दिया जाता है, तो पानी के नीचे जाने के प्राकृतिक रास्ते बदल सकते हैं। WELL Labs के जल विशेषज्ञ शशांक पालुर और सेवानिवृत्त भूविज्ञान प्रोफेसर टी.जे. रेणुका प्रसाद सहित विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि सुरंग के लिए बनाई जाने वाली स्थायी, जलरोधक कंक्रीट संरचना भूजल के प्राकृतिक प्रवाह में अवरोध पैदा कर सकती है।
खासतौर पर पूर्व-पश्चिम दिशा में पानी के भूमिगत प्रवाह पर इसका असर पड़ने की संभावना जताई गई है। निर्माण के दौरान लगातार पानी निकालने यानी डी-वॉटरिंग की आवश्यकता भी स्थानीय जलस्तर को अस्थायी रूप से नीचे ला सकती है। विशेषज्ञों की चिंता यह है कि यदि ऐसी प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है और भूजल प्रवाह की संरचना बदलती है तो इसके प्रभाव केवल निर्माण स्थल तक सीमित नहीं रह सकते। बाढ़ का खतरा भी चिंता का विषय हेब्बल जंक्शन पहले से ही बाढ़ की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है।
भारी बारिश के दौरान अपर्याप्त स्टॉर्मवॉटर क्षमता और झील से पानी के बैकफ्लो के कारण यहां जलभराव की समस्या सामने आती रही है। प्रस्तावित सुरंग का प्रवेश बिंदु अपेक्षाकृत निचले स्तर पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि झील के बफर क्षेत्र में कमी आती है और आसपास के क्षेत्र में कंक्रीटीकरण बढ़ता है तो वर्षाजल के प्राकृतिक फैलाव और अवशोषण की क्षमता कम हो सकती है।
इससे तेज बारिश के दौरान सुरंग के प्रवेश क्षेत्र में पानी भरने का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों, विशेषकर नागवारा और Manyata Tech Park के आसपास भी पड़ने की आशंका व्यक्त की गई है। DPR में इन चुनौतियों से निपटने के लिए जलरोधक ‘टैंक्ड सिस्टम’, नालों का अस्थायी डायवर्जन, कॉफरडैम, लगातार डी-वॉटरिंग, बाढ़ अवरोधक और सम्प पंप जैसी व्यवस्थाओं का प्रस्ताव है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन इंजीनियरिंग उपायों की सफलता व्यापक झील और स्टॉर्मवॉटर नेटवर्क की स्थिति पर निर्भर करेगी। बड़ी हेब्बल-सिल्क बोर्ड सुरंग पर भी सवाल बेंगलुरु में प्रस्तावित लंबी उत्तर-दक्षिण सुरंग सड़क भी पर्यावरण और भूगर्भीय जोखिमों को लेकर सवालों के घेरे में रही है। लगभग 16.7 से 18.5 किलोमीटर लंबी इस परियोजना का उद्देश्य हेब्बल से सिल्क बोर्ड तक यातायात को सुगम बनाना है। इस परियोजना में विशेष चिंता लालबाग बॉटनिकल गार्डन के आसपास प्रस्तावित टनल बोरिंग मशीन (TBM) शाफ्ट को लेकर सामने आई है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट, जिसे कर्नाटक हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया गया, में क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना और भूजल प्रवाह पर संभावित प्रभावों को लेकर सावधानी बरतने की सिफारिश की गई। रिपोर्ट में लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी Peninsular Gneiss National Geological Monument के निकट TBM शाफ्ट के स्थान की समीक्षा की आवश्यकता बताई गई।
साथ ही लालबाग झील के भूजल प्रवाह में बदलाव, चट्टानों में मौजूद दरारों के माध्यम से जल प्रवाह के बदलने और भूजल स्तर में गिरावट की संभावना पर भी ध्यान दिया गया। रिपोर्ट में 20.5 से 23.5 मीटर के अपेक्षाकृत कम सतही आवरण वाले क्षेत्रों में जमीन के धंसने यानी सतही settlement का जोखिम भी चिन्हित किया गया है।
GSI ने लगातार हाइड्रोजियोलॉजिकल मॉनिटरिंग और अतिरिक्त भूगर्भीय जांच की सिफारिश की है। पेड़ों और हरित क्षेत्र पर भी असर हेब्बल शॉर्ट टनल परियोजना को लेकर पेड़ों की कटाई का मुद्दा भी उठाया गया है। परियोजना के मार्ग में कम से कम 893 पेड़ों के प्रभावित होने की बात सामने आई है। GKVK परिसर से होकर गुजरने वाले मार्ग के कारण परिसर की जैव विविधता और हरित क्षेत्र पर संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई गई है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि सुरंग परियोजना के प्रभावों का आकलन केवल निर्माण क्षेत्र तक सीमित नहीं होना चाहिए। झील, भूजल, पेड़-पौधे, जलनिकासी, बाढ़ और आसपास के शहरी पारिस्थितिकी तंत्र पर संयुक्त और दीर्घकालिक प्रभाव का अध्ययन जरूरी है। EIA को लेकर भी सवाल परियोजना के लिए मौजूदा नियमों के तहत स्वतंत्र सुरंग परियोजना के रूप में पूर्ण पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अनिवार्य नहीं है। हालांकि DPR में EIA के लिए 75 लाख रुपये का बजट प्रावधान होने की जानकारी सामने आई है।
पर्यावरण समूहों और नागरिक संगठनों का कहना है कि भले ही कानूनी रूप से पूर्ण EIA अनिवार्य न हो, लेकिन बेंगलुरु जैसे गंभीर जल संकट और बाढ़ की समस्या वाले शहर में व्यापक पर्यावरणीय, भूजल और हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन को परियोजना का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। हाई कोर्ट में पहुंचा मामला परियोजना को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले पर्याप्त हाइड्रोलॉजिकल, भूजल और झील प्रभाव आकलन नहीं किया गया। अदालत ने राज्य सरकार से झील के पानी के इनफ्लो और आउटफ्लो पर परियोजना के संभावित प्रभाव तथा प्रस्तावित सुरक्षा उपायों से संबंधित जानकारी मांगी है।
अदालत के समक्ष इंजीनियरों की प्रस्तुति की व्यवस्था करने का निर्देश भी दिया गया है। सितंबर 2026 की शुरुआत तक परियोजना पर कोई रोक नहीं लगाई गई थी और निर्माण गतिविधियां जारी थीं। हालांकि परियोजना की निगरानी और इससे जुड़े पर्यावरणीय तथा जल संबंधी सवालों पर कानूनी प्रक्रिया जारी है। सरकार और BDA का पक्ष सरकारी अधिकारियों का कहना है कि परियोजना के लिए हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन किए गए हैं और इंजीनियरिंग उपायों के जरिए झीलों के इनफ्लो-आउटफ्लो तथा भूजल से जुड़े संभावित जोखिमों को नियंत्रित किया जाएगा।
BDA ने अदालत में भी अपने पक्ष और सुरक्षा उपायों से संबंधित जवाब दाखिल किया है। हालांकि नागरिक समूहों, पर्यावरण विशेषज्ञों और जल वैज्ञानिकों की मांग है कि संबंधित अध्ययन और आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं ताकि स्वतंत्र विशेषज्ञ उनकी समीक्षा कर सकें। उनका कहना है कि किसी भी ऐसी परियोजना में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है जिसका असर शहर की जल सुरक्षा पर पड़ सकता है।
विकास और जल सुरक्षा के बीच चुनौती हेब्बल सुरंग परियोजना बेंगलुरु के सामने मौजूद एक बड़ी नीति चुनौती को उजागर करती है। एक ओर शहर को बढ़ते यातायात और परिवहन दबाव से राहत देने के लिए बड़े बुनियादी ढांचे की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर भूजल संकट, झीलों का क्षरण और शहरी बाढ़ जैसी समस्याएं पहले से गंभीर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरंग को केवल यातायात परियोजना के रूप में देखने के बजाय इसे शहर की व्यापक जल और पर्यावरण प्रणाली के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि निर्माण के दौरान भूजल प्रवाह में स्थायी बदलाव आता है या झीलों के बफर और जलधारण क्षेत्र कमजोर होते हैं, तो भविष्य में इसकी कीमत केवल पर्यावरण नहीं बल्कि शहर की जल आपूर्ति और बाढ़ प्रबंधन को भी चुकानी पड़ सकती है।
विशेषज्ञों की प्रमुख सिफारिशें विशेषज्ञों और पर्यावरण समूहों ने परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले स्वतंत्र और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हाइड्रोलॉजिकल तथा हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययन कराने की मांग की है। उनके अनुसार भूजल स्तर, झीलों के जलस्तर, इनफ्लो-आउटफ्लो और जमीन के धंसने की लगातार निगरानी के लिए व्यापक मॉनिटरिंग नेटवर्क स्थापित किया जाना चाहिए।
झीलों और संवेदनशील भूगर्भीय संरचनाओं से अधिकतम संभव दूरी बनाए रखने, बफर क्षेत्रों की सुरक्षा करने तथा राजकालुवे और स्टॉर्मवॉटर नेटवर्क को मजबूत करने की भी जरूरत बताई गई है। इसके साथ ही कम पर्यावरणीय प्रभाव वाले वैकल्पिक यातायात समाधान और परियोजना के डिजाइन में बदलाव की संभावनाओं का भी मूल्यांकन करने की सलाह दी गई है। बेंगलुरु पहले ही पानी की कमी और शहरी बाढ़ के दोहरे संकट का सामना कर रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि नई परिवहन परियोजनाओं का लक्ष्य केवल सड़क पर यातायात कम करना नहीं होना चाहिए, बल्कि शहर की दीर्घकालिक जल सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन को सुरक्षित रखना भी होना चाहिए।
हेब्बल सुरंग का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि विकास की जरूरत और जल-संवेदनशील शहरी नियोजन के बीच कितना संतुलन स्थापित किया जाता है।
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