भोपाल के ‘बड़े तालाब’ में IISER भोपाल और स्थानीय समाचार पत्र द्वारा किए गए विस्तृत सर्वे में पाया गया कि गाद जमा होने के कारण तालाब की औसत गहराई 1993 के 6 मीटर से घटकर अब 4.29 मीटर (लगभग 24% की कमी) रह गई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भोपाल की पहचान माने जाने वाला बड़ा तालाब धीरे-धीरे उथला होता जा रहा है। हाल ही में हुए एक बड़े वैज्ञानिक सर्वेक्षण में सामने आया है कि तालाब की तलहटी में गाद की मोटी परत जमा हो चुकी है, जिससे उसकी पानी रोकने की क्षमता लगातार कम हो रही है।
सर्वे कैसे हुआ यह अध्ययन एक दैनिक भास्कर अखबार और आईआईएसईआर भोपाल (भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान) के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया।
नौ दिनों के दौरान तालाब के 63 हजार से ज्यादा अलग-अलग बिंदुओं पर पानी की गहराई मापी गई — जो अपनी तरह का अब तक का सबसे विस्तृत मापन बताया जा रहा है। इससे पहले 1939, 1950 और 1963 में भी गहराई मापी गई थी, लेकिन उन सर्वे का पूरा तकनीकी रिकॉर्ड मौजूद न होने से आज के आंकड़ों से उनकी तुलना करना मुश्किल है।
इसलिए मौजूदा सर्वे को भविष्य में तुलना के लिए एक नया आधार-बिंदु माना जा रहा है। पानी के भीतर की स्थिति देखने के लिए गोताखोरों की मदद ली गई।
उनके मुताबिक ज्यादातर जगह पानी इतना गंदला है कि एक फुट की दूरी पर भी कुछ साफ दिखाई नहीं देता। सबसे ज्यादा गहराई करीब 9 मीटर तक मिली, हालांकि गहरे हिस्सों में पानी अपेक्षाकृत साफ पाया गया। घटती गहराई के आंकड़े 1993 की एक पुरानी रिपोर्ट में तालाब की औसत गहराई करीब 6 मीटर आंकी गई थी।
नए सर्वे में यह घटकर 4.29 मीटर रह गई है — यानी लगभग पौने दो मीटर या करीब 24% की कमी। गहराई का वितरण कुछ इस तरह मिला: 1 मीटर से कम: 3.5% 1–2 मीटर: करीब 6% 2–3 मीटर: करीब 12% 3–4 मीटर: करीब 26% (सबसे बड़ा हिस्सा) 4–5 मीटर: करीब 19% 5–6 मीटर: करीब 10% 6–7 मीटर: करीब 8.5% 7 मीटर से ज्यादा: 1.4% से भी कम यानी तालाब का लगभग एक-चौथाई हिस्सा सिर्फ 3 मीटर या उससे कम गहरा है, जो जल-स्तर घटते ही सबसे पहले सूखने या दलदल में बदलने के खतरे में है। वहीं सिर्फ मुट्ठी भर जगहों पर गहराई 7 मीटर से ज्यादा दर्ज हुई — यानी सचमुच गहरा माना जाने वाला हिस्सा अब बहुत सीमित रह गया है।
गाद का बढ़ता बोझ अनुमान है कि तालाब के करीब 361 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट) से हर साल लगभग 3.6 लाख घनमीटर गाद बहकर तालाब में पहुंच रही है। इस वजह से तालाब का तल हर साल औसतन कुछ मिलीमीटर ऊपर उठ रहा है। पिछले करीब 27 वर्षों में जुड़ी कुल गाद का अनुमान लगभग एक करोड़ घनमीटर लगाया गया है।
कोलांस नदी, हलालपुर, बिशनखेड़ी, चंदगढ़ कलां और लाखापुर जैसे इलाकों को गाद जमा होने के प्रमुख हॉटस्पॉट के तौर पर चिह्नित किया गया है। इनमें बिशनखेड़ी की स्थिति सबसे गंभीर बताई गई, जहां गाद की परत 5 से 8 मीटर तक मोटी हो चुकी है।
अगर आगे भी गाद इसी रफ्तार से जमा होती रही, तो असर और गंभीर हो सकता है: आधा मीटर अतिरिक्त गाद जमा होने पर जल भंडारण क्षमता में करीब 11-12% की कमी आ सकती है।
एक मीटर अतिरिक्त गाद से यह कमी करीब 23% तक पहुंच सकती है। दो मीटर अतिरिक्त गाद जमा होने पर तालाब की क्षमता लगभग आधी, यानी करीब 45%, घट सकती है।
पुराने अनुमानों के अनुसार 1999 में ही तालाब की तलहटी में साढ़े पांच करोड़ घनमीटर के आसपास गाद जमा हो चुकी थी, जिसका बड़ा हिस्सा ऊपरी दो मीटर की परत में ही था।
पानी की गुणवत्ता भी चिंताजनक पानी की गुणवत्ता को आमतौर पर चार श्रेणियों में बांटा जाता है — पीने योग्य, ट्रीटमेंट के बाद पीने योग्य, सिर्फ खेती के लिए उपयुक्त, और नहाने लायक भी नहीं। बड़े तालाब का पानी फिलहाल तीसरी और चौथी श्रेणी के बीच आंका गया है, यानी इसे सीधे पीने या नहाने के लायक नहीं माना जा सकता। यही वजह है कि यहां से ली जाने वाली सप्लाई को पहले वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से गुजारा जाता है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो अगले पांच-छह साल में पानी की गुणवत्ता और बिगड़ सकती है।
जलकुंभी और दूसरी जलीय वनस्पतियों का फैलाव भी एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। ये पौधे पानी की सतह पर सूरज की रोशनी को रोकते हैं, जिससे पानी में घुली ऑक्सीजन घटती है और जलीय जीवों के लिए मुश्किलें बढ़ती हैं। समाधान के तौर पर सुझाए गए उपाय देश की 150 से ज्यादा झीलों को पुनर्जीवित कर चुके एक जाने-माने झील-संरक्षक विशेषज्ञ ने तालाब का दो दिन तक निरीक्षण करने के बाद कुछ सुझाव दिए हैं: कैचमेंट क्षेत्र में ही गाद रोकें — नदी का पानी तालाब में मिलने से पहले छोटे सिल्ट-ट्रैप बनाए जाएं, ताकि मिट्टी वहीं बैठ जाए और साफ पानी आगे बढ़े।
पूरे तालाब की बजाय सिर्फ किनारों की सफाई — चूंकि गाद ज्यादातर किनारों पर जमा है, बीच का हिस्सा अपेक्षाकृत गहरा और साफ है, इसलिए किनारों से 70-100 मीटर तक ही खुदाई पर्याप्त हो सकती है।
निकाली गई गाद का दोबारा इस्तेमाल — इसे दूर ले जाने के बजाय छोटे टापू और तटबंध बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिन पर पेड़-पौधे लगाकर पक्षियों के लिए नया आवास भी बनाया जा सकता है। पुराने जल-निकासी मार्गों को फिर से चालू करना — ऐतिहासिक दौर में मौजूद एक पुरानी सुरंग को आधुनिक तकनीक से फिर खोलकर मानसून के दौरान अतिरिक्त गाद बाहर निकाली जा सकती है।
कैचमेंट में रसायनों के इस्तेमाल पर नियंत्रण — खेतों से बहकर आने वाले खरपतवारनाशक और कीटनाशक पानी में फायदेमंद बैक्टीरिया को खत्म कर रहे हैं, जिन्हें रोकना जरूरी है। बिगड़ते हालात की तीन बड़ी वजहें शहर की नालियों का बिना शोधन के सीधे तालाब में गिरना, जिससे पानी में पोषक तत्व असंतुलित हो रहे हैं।
तालाब के बड़े हिस्से की गहराई लगभग एक-समान होना, जिससे गाद तेजी से जमा होती है। सचमुच गहरे माने जाने वाले हिस्सों का सिमटते जाना। प्रशासनिक स्तर पर मांग स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि तालाब की सुरक्षा के लिए एक अलग मास्टर प्लान बनाया जाए, जिसमें कैचमेंट क्षेत्र और आसपास निर्माण को लेकर स्पष्ट नियम हों।
तालाब के 50 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के निर्माण और अतिक्रमण पर रोक लगाने और निगरानी के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त करने की मांग की गई है।
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