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जल

गंगा बेसिन में 33 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में पौधरोपण, आर्द्रभूमि और जलीय जैव विविधता संरक्षण पर जोर

Environment Pulse
Last updated: September 19, 2026 9:20 pm
Environment Pulse
Published: September 19, 2026
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‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत गंगा बेसिन में पारिस्थितिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए अब तक 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण किया जा चुका है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) द्वारा 414 करोड़ रुपये की लागत से चलाए जा रहे इस अभियान का उद्देश्य मिट्टी का कटाव रोकना और भूजल बढ़ाना है। वनीकरण के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में आर्द्रभूमियों का पुनरुद्धार और सात जैव विविधता पार्क विकसित किए गए हैं। इसके अलावा गंगा डॉल्फिन (6,324 दर्ज), घड़ियाल, और मछलियों की संख्या बढ़ाने के प्रयास सफल रहे हैं, तथा देश की पहली डॉल्फिन रेस्क्यू एंबुलेंस भी शुरू की गई है। इन समन्वित प्रयासों से गंगा बेसिन के पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करने में महत्वपूर्ण मदद मिल रही है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क:  गंगा नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को बहाल करने के प्रयासों के तहत नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत गंगा बेसिन में अब तक 33,024 हेक्टेयर भूमि पर वनीकरण किया जा चुका है।

इसके साथ ही आर्द्रभूमियों के पुनरुद्धार और जलीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए भी कई योजनाएं लागू की जा रही हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के अनुसार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के राज्य वन विभागों के सहयोग से संचालित वानिकी हस्तक्षेप परियोजना के तहत करीब 414 करोड़ रुपये की लागत से यह काम किया गया है।

मुख्य गंगा धारा और उसकी सहायक नदियों के किनारे मुख्य रूप से स्थानीय प्रजातियों का रोपण किया जा रहा है। इन पौधरोपणों का उद्देश्य नदी के किनारों को स्थिर करना, मिट्टी के कटाव को कम करना, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना और वन्यजीवों के लिए आवास तैयार करना है।

यह पहल नमामि गंगे के ‘अविरल गंगा’ और पारिस्थितिक पुनरुद्धार घटकों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अधिकारियों के अनुसार, नदी किनारे बढ़ता हरित क्षेत्र तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के साथ जलीय जीवों के पुनर्वास में भी मदद कर रहा है।

वनीकरण के समानांतर आर्द्रभूमियों के संरक्षण और जलीय प्रजातियों की सुरक्षा पर भी काम किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड की पांच प्राथमिक आर्द्रभूमियों के पुनरुद्धार को मंजूरी दी गई है। वहीं उत्तर प्रदेश में सात गंगा जैव विविधता पार्क विकसित किए गए हैं।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य बाढ़ क्षेत्र और नदी के बीच संपर्क बेहतर करना, प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना तथा नदी तंत्र के समग्र आवास की गुणवत्ता सुधारना है। जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं। देश में पहली बार किए गए राष्ट्रीय स्तर के नदी डॉल्फिन सर्वेक्षण में 6,324 गंगा नदी डॉल्फिन और तीन सिंधु नदी डॉल्फिन दर्ज की गईं। इसे संकटग्रस्त गंगा नदी डॉल्फिन के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

इसके अलावा नदी तंत्र में 203 लाख से अधिक इंडियन मेजर कार्प मछलियों के फ्राई (fingerlings) छोड़े गए हैं। इसका उद्देश्य मछलियों की विविधता बढ़ाने और डॉल्फिन के लिए भोजन की उपलब्धता मजबूत करना है। गंगा के विभिन्न हिस्सों में ऊदबिलाव, कछुए, घड़ियाल और हिल्सा की बढ़ती मौजूदगी भी दर्ज की गई है। संरक्षण एजेंसियों के अनुसार, इन प्रजातियों के अधिक दिखाई देने से कुछ क्षेत्रों में जल गुणवत्ता और नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य में सुधार के संकेत मिलते हैं।

जलीय संरक्षण के तहत मीठे पानी के कछुओं के आवासों का पुनरुद्धार, जलीय जीवों का बचाव और पुनर्वास तथा विशेष संरक्षण केंद्रों की स्थापना की जा रही है। देश की पहली डॉल्फिन रेस्क्यू एंबुलेंस भी इस दिशा में शुरू की गई है।

वैज्ञानिक आकलनों में सर्वेक्षित नदी क्षेत्रों में 3,000 से अधिक घड़ियाल दर्ज किए गए हैं। इसके आधार पर घड़ियालों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय घड़ियाल संरक्षण कार्ययोजना तैयार की गई है। वर्ष 2014 में शुरू हुआ नमामि गंगे कार्यक्रम मार्च 2026 तक विस्तारित किया गया था।

कार्यक्रम पांच प्रमुख स्तंभों पर आधारित है—निर्मल गंगा, अविरल गंगा, अर्थ गंगा, जन गंगा और ज्ञान गंगा। वनीकरण और जैव विविधता से जुड़ी परियोजनाएं मुख्य रूप से अविरल गंगा के व्यापक प्रयासों का हिस्सा हैं। इसके अंतर्गत मत्स्य पालन, जलीय वन्यजीव, आर्द्रभूमि और वानिकी से जुड़ी कई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।

NMCG अधिकारियों के अनुसार बड़े पैमाने पर पौधरोपण, आर्द्रभूमि पुनरुद्धार और विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने से गंगा बेसिन में लंबे समय से जारी पारिस्थितिक क्षरण को कम करने में मदद मिल रही है। नदी किनारे रहने वाले स्थानीय समुदायों को भी जैव विविधता और नदी के स्वास्थ्य में बदलाव दिखाई देने की बात कही गई है। हालांकि मूल वनीकरण लक्ष्य इससे अधिक था, लेकिन 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण को लगातार हो रही प्रगति के रूप में देखा जा रहा है।

अब पौधों की गुणवत्ता, उनके जीवित रहने की दर और दीर्घकालिक रखरखाव पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। राज्य सरकारों के समन्वय के साथ आगे भी पौधरोपण का विस्तार करने की योजना है। इसके लिए CAMPA जैसी पूरक वित्तीय व्यवस्थाओं का भी उपयोग किया जा रहा है। NMCG के अनुसार गंगा बेसिन में हरित आवरण, आर्द्रभूमि और जलीय जीवों के संरक्षण को एक-दूसरे से जोड़कर आगे बढ़ाना नदी के पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करने के लिए आवश्यक है।

इन प्रयासों का लक्ष्य आने वाली पीढ़ियों के लिए गंगा को अधिक स्वस्थ, जीवंत और जलवायु एवं पर्यावरणीय दबावों के प्रति अधिक लचीला नदी तंत्र बनाना है।

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TAGGED:Afforestation in Ganga BasinAquatic Biodiversity ConservationGangetic River DolphinNamami Gange ProgrammeNational Mission for Clean GangaWetland Restoration
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