सस्टेनेबिलिटी (टिकाऊपन) को मापने के तरीके पर फिर से सोचना होगा
यूएन यूनिवर्सिटी की एक नई स्टडी ने किया इस खतरे की तरफ संकेत

एनवायरमेंट पल्स डेस्क
एआई अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से अब पर्यावरण को भारी नुकसान होने की आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी हैं। इन आशंकाओं ने इस तर्क को मजबूत बना दिया है कि अब हमें सस्टेनेबिलिटी (टिकाऊपन) को मापने के तरीके पर फिर से सोचना है। क्योंकि एआई धरती को गर्म करने वाली ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ाने के लिए तो जिम्मेवार है ही, बल्कि इसका पर्यावरण पर इतना बुरा असर पड़ रहा है कि इससे धरती के प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ने की आशंका है। इसके कारण हैं एआई को चलाने वाले डाटा सेंटर्स, जो एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक हर साल 945 टेरावाट-घंटे बिजली की खपत कर सकते हैं। यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल सालाना बिजली खपत का लगभग तीन गुना है। इन तीनों देशों में 65 करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं।
यह तो एक बानगी भर है। डेटा सेंटर द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बिजली की हर यूनिट के साथ कार्बन फुटप्रिंट के अलावा, कूलिंग और एनर्जी प्रोडक्शन के लिए वॉटर फुटप्रिंट (पानी की खपत) और बिजली बनाने व सप्लाई चेन से जुड़ा लैंड फुटप्रिंट (ज़मीन का इस्तेमाल) भी जुड़ा होता है।
यूएन यूनिवर्सिटी की एक नई स्टडी के अनुसार, इस दशक के अंत तक एआई से जुड़ी पानी की खपत 130 करोड़ लोगों की बुनियादी सालाना घरेलू ज़रूरतों के बराबर हो सकती है। जबकि इसका लैंड फुटप्रिंट 14,500 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा हो सकता है, जो जकार्ता मेट्रोपॉलिटन इलाके के आकार का लगभग दोगुना है।
रिपोर्ट एआई के पर्यावरण पर असर को मापने के तरीके में एक अहम कमी की ओर इशारा करती है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, खासकर बड़े मॉडल को ट्रेन करने से जुड़ा उत्सर्जन, अक्सर प्राथमिकता पाता है किंतु यह तरीका पर्यावरण से जुड़ी अन्य लागतों या नुकसानों को नज़रअंदाज़ कर देता है। इसलिए जो समाधान एक नज़रिए से “ग्रीन” या पर्यावरण के अनुकूल लगते हैं, वे दूसरे मामलों में दबाव बढ़ा सकते हैं। खासकर उन इलाकों में जहां पहले से ही संसाधनों की भारी कमी है। उदाहरण के लिए, कुछ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाने से कार्बन उत्सर्जन तो कम हो सकता है पर इससे पानी की खपत और ज़मीन के इस्तेमाल में काफी बढ़ोतरी हो सकती है।
आम बहस ज़्यादातर एडवांस्ड एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए ज़रूरी एनर्जी पर केंद्रित रही है, लेकिन स्टडी से पता चलता है कि रोज़ाना के इस्तेमाल से कुल एनर्जी की मांग का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा खर्च होता है।
इसका पैमाना चौंकाने वाला है। एक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली एआई सर्विस हर दिन लगभग 250 करोड़ प्रॉम्प्ट (निर्देश) प्रोसेस करती है, जिससे हर साल सैकड़ों गीगावाट-घंटे बिजली की खपत होती है।
काम के आधार पर एनर्जी का इस्तेमाल भी काफी अलग-अलग होता है। एक एआई इमेज बनाने में साधारण टेक्स्ट क्लासिफिकेशन की तुलना में हज़ार गुना से ज़्यादा एनर्जी लग सकती है, जबकि वीडियो बनाने में और भी ज़्यादा संसाधनों की ज़रूरत होती है।
सिर्फ़ एफिशिएंसी (दक्षता) में सुधार से इन बढ़ती मांगों की भरपाई होने की संभावना नहीं है। यह रिपोर्ट ‘रीबाउंड इफ़ेक्ट’ की ओर इशारा करती है, जिसमें कम लागत और बेहतर परफ़ॉर्मेंस के कारण इस्तेमाल बढ़ जाता है, जिससे आखिर में कुल संसाधनों की खपत भी बढ़ जाती है।
एआई इंफ़्रास्ट्रक्चर का पर्यावरण पर असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। जहां इस टेक्नोलॉजी के फ़ायदे वैश्विक हैं, वहीं इसकी लागत अक्सर कुछ खास इलाकों तक ही सीमित रहती है।
कुछ देशों में, डेटा सेंटर पहले से ही देश की कुल बिजली खपत का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे ऊर्जा प्रणालियों पर दबाव पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर, बढ़ती सुविधाओं के लिए पानी की भारी खपत हो रही है और कई बार तो सूखे जैसे हालात में भी ऐसा हो रहा है।
साथ ही, रिपोर्ट इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती चुनौती के बारे में भी चेतावनी देती है। अनुमान है कि 2030 तक एआई इंफ़्रास्ट्रक्चर से हर साल 25 लाख टन तक ई-वेस्ट पैदा होगा। इस बोझ का ज़्यादातर हिस्सा कम आय वाले देशों पर पड़ने की संभावना है, जिनके पास इसे सुरक्षित रूप से निपटाने की सीमित क्षमता है। एआई हार्डवेयर के लिए ज़रूरी अहम खनिजों के उत्पादन से भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचने और खनन वाले इलाकों में सामाजिक असमानता बढ़ने की चिंताएं पैदा होती हैं।
एआई इंफ़्रास्ट्रक्चर का विस्तार पहुँच और प्रभाव के मामले में नई असमानताएं भी पैदा कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, एआई-स्पेशलाइज़्ड कंप्यूटिंग क्षमता का 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा सिर्फ़ दो देशों –अमेरिका और चीन–में होता है। वहीं, 150 से ज़्यादा देशों में कोई खास घरेलू एआई इंफ़्रास्ट्रक्चर नहीं है।
यह असंतुलन न सिर्फ़ आर्थिक मौकों को सीमित करता है, बल्कि पर्यावरणीय न्याय के सवाल भी खड़े करता है, क्योंकि कुछ देश एआई-आधारित विकास के फ़ायदों में हिस्सेदारी किए बिना ही पर्यावरणीय लागत उठाते हैं।

इन अहम नतीजों के बावजूद, यूएन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि यह रिपोर्ट एआई के ख़िलाफ़ कोई तर्क नहीं है। बल्कि, यह इस बात पर ज़ोर देती है कि टेक्नोलॉजी का विकास पृथ्वी की सीमाओं के भीतर हो, इसके लिए तुरंत कदम उठाए जाएं।
यह स्टडी एक “ज़िम्मेदार एआई इकोसिस्टम” के लिए एक रूपरेखा (फ़्रेमवर्क) बताती है, जो पारदर्शिता, डिज़ाइन के ज़रिए दक्षता, समानता, लाइफ़साइकल ज़िम्मेदारी, वैश्विक सहयोग और टिकाऊ इस्तेमाल जैसे सिद्धांतों पर आधारित है।
सरकारों से आग्रह किया जाता है कि वे एआई इंफ़्रास्ट्रक्चर को ऊर्जा, पानी और ज़मीन के इस्तेमाल की योजना में शामिल करें, जबकि कंपनियों को ऐसे सिस्टम डिज़ाइन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जो संसाधनों की खपत को कम करें। यूज़र्स की भी इसमें भूमिका है कि वे जहां संभव हो, कम असर वाले एप्लिकेशन चुनें। अंत में, रिपोर्ट का तर्क है कि एआई का भविष्य न केवल तकनीकी इनोवेशन पर, बल्कि आज लिए गए गवर्नेंस से जुड़े फ़ैसलों पर भी निर्भर करेगा।

