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भारत में 6,300 से अधिक गंगा नदी डॉल्फिन, पहली व्यापक राष्ट्रीय गणना में सामने आई आबादी

Environment Pulse
Last updated: September 19, 2026 9:26 pm
Environment Pulse
Published: September 19, 2026
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भारत में पहली बार आयोजित व्यापक वैज्ञानिक गणना (प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत) के अनुसार देश में 6,324 गंगा नदी डॉल्फिन और 3 सिंधु नदी डॉल्फिन यानी कुल 6,327 डॉल्फिन मौजूद हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा 8,500 किलोमीटर से अधिक नदी क्षेत्र में किए गए इस सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक (लगभग 2,397) डॉल्फिन दर्ज की गईं। यह लुप्तप्राय प्रजाति नदी के स्वास्थ्य का सूचक है, जो जाल में फंसने, प्रदूषण और बांधों जैसे खतरों का सामना कर रही है। सरकार इस वैज्ञानिक डेटा के आधार पर इनके संरक्षण और ‘नमामि गंगे’ जैसी पहलों को और मजबूत कर रही है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत की नदियों में गंगा नदी डॉल्फिन की आबादी को लेकर पहली व्यापक वैज्ञानिक गणना में देश के प्रमुख नदी तंत्रों में 6,300 से अधिक गंगा नदी डॉल्फिन होने का अनुमान सामने आया है। अधिकारियों और शोधकर्ताओं के अनुसार, यह आकलन देश में नदी डॉल्फिन की संख्या और उनके वितरण को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराता है।

केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत 2021 से 2023 के बीच भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने राज्य वन विभागों और संरक्षण संगठनों के सहयोग से देशभर में यह सर्वेक्षण किया। इसमें लगभग 6,324 गंगा नदी डॉल्फिन दर्ज की गईं। इसके अलावा पंजाब की ब्यास नदी में तीन सिंधु नदी डॉल्फिन भी मिलीं। इस तरह देश में नदी डॉल्फिन की कुल अनुमानित संख्या 6,327 रही।

राष्ट्रीय स्तर के इस आकलन में 8,500 किलोमीटर से अधिक नदी क्षेत्र को शामिल किया गया। सर्वेक्षण गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन तथा उनकी सहायक नदियों में किया गया। इसके लिए नावों से प्रत्यक्ष दृश्य सर्वेक्षण के साथ-साथ हाइड्रोफोन के जरिए निष्क्रिय ध्वनि निगरानी तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

आकलन के अनुसार गंगा नदी डॉल्फिन में करीब 3,275 डॉल्फिन गंगा की मुख्य धारा में, 2,414 उसकी सहायक नदियों में, 584 ब्रह्मपुत्र की मुख्य धारा में और 51 उसकी सहायक नदियों में पाई गईं।

राज्यों के लिहाज से उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक लगभग 2,397 गंगा नदी डॉल्फिन होने का अनुमान लगाया गया। इसके बाद बिहार में 2,220, पश्चिम बंगाल में 815 और असम में 635 डॉल्फिन दर्ज की गईं। झारखंड, राजस्थान-मध्य प्रदेश और अन्य नदी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटी आबादी दर्ज की गई।

गंगा नदी डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम Platanista gangetica है। इसे भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है। यह प्रजाति IUCN की रेड लिस्ट में लुप्तप्राय (Endangered) श्रेणी में शामिल है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत संरक्षित है।

गंगा नदी डॉल्फिन गंदले नदी जल में रास्ता तलाशने और शिकार करने के लिए इकोलोकेशन का इस्तेमाल करती हैं। इसलिए उनकी मौजूदगी और आबादी नदी पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति का महत्वपूर्ण संकेत देती है।

हालांकि, इन जलीय स्तनधारियों के सामने कई खतरे बने हुए हैं। मछली पकड़ने वाले जाल में फंसना, जल प्रदूषण, बांधों और बैराजों के कारण आवास का विभाजन, नदी के प्रवाह में कमी और रेत खनन उनकी आबादी पर दबाव डाल रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार पहले गंगा नदी डॉल्फिन की आबादी को लेकर अलग-अलग अध्ययनों में काफी भिन्न आंकड़े सामने आए थे। कुछ पुराने अध्ययनों में यह संख्या करीब 1,800 बताई गई थी, जबकि हाल के अनुमानों में 3,500 से 4,500 के बीच की आबादी का अनुमान लगाया गया था।

हालांकि, नई गणना में सामने आया 6,324 का आंकड़ा सीधे तौर पर आबादी में वृद्धि या गिरावट का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसकी वजह यह है कि पुराने अध्ययनों में सर्वेक्षण के तरीके, क्षेत्र और तकनीक अलग-अलग रहे थे। मौजूदा सर्वेक्षण एक समान और वैज्ञानिक पद्धति से तैयार किया गया व्यापक आधार उपलब्ध कराता है।

आबादी में वास्तविक बदलाव का आकलन करने के लिए समय के साथ समान पद्धति से किए गए सर्वेक्षण जरूरी होंगे। इसी उद्देश्य से दूसरी राष्ट्रीय स्तर की गणना शुरू की जा चुकी है, जिसमें आंकड़ों को अपडेट करने के साथ सर्वेक्षण का दायरा भी बढ़ाया जा रहा है।

संरक्षण विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों के लिए यह सर्वेक्षण आगे की संरक्षण रणनीति का आधार बनेगा। प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत डॉल्फिन के आवासों की सुरक्षा, मानवजनित दबावों को कम करने और वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

इसके साथ ही नमामि गंगे जैसे नदी पुनर्जीवन कार्यक्रमों के जरिए जल गुणवत्ता में सुधार, नदी के प्राकृतिक आवासों की बहाली और प्रदूषण एवं अन्य मानवीय दबावों को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

भारत की नदियों में 6,300 से अधिक गंगा नदी डॉल्फिन का अनुमान जहां इस प्रतिष्ठित जलीय प्रजाति के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण आधार देता है, वहीं यह भी स्पष्ट करता है कि उनकी दीर्घकालिक सुरक्षा नदी के प्राकृतिक प्रवाह, स्वच्छ जल, जुड़े हुए आवास और सुरक्षित जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर करेगी।

Also Read: गंगा बेसिन में 33 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में पौधरोपण, आर्द्रभूमि और जलीय जैव विविधता संरक्षण पर जोर

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