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भारत में बढ़ रहा मानव-बाघ संपर्क क्षेत्र, 20 राज्यों में करीब 6 करोड़ लोग बाघ क्षेत्रों के आसपास

Environment Pulse
Last updated: September 24, 2026 8:15 pm
Environment Pulse
Published: September 24, 2026
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भारत के 20 बाघ-आवास वाले राज्यों में लगभग 6 करोड़ लोग बाघों के कब्जे वाले क्षेत्रों या उनके आसपास रहते हैं, क्योंकि पिछले दो दशकों में बाघों का अधिवास क्षेत्र 30% बढ़कर 1,38,200 वर्ग किलोमीटर हो गया है। बाघों के आवास का लगभग 45% हिस्सा सख्त कोर संरक्षित क्षेत्रों के बाहर (जैसे बफर जोन, वन्यजीव अभयारण्य और मानव-प्रभुत्व वाले इलाके) स्थित है, जहाँ खेती और पशुपालन जैसी गतिविधियाँ होती हैं। केवल 25% आवास सीमित मानवीय गतिविधियों वाले कोर क्षेत्रों में हैं।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत में मानव और बाघों के बीच बढ़ते संपर्क क्षेत्र को लेकर किए गए एक बड़े वैज्ञानिक आकलन में सामने आया है कि देश के 20 बाघ-आवास वाले राज्यों में करीब 6 करोड़ लोग बाघों के कब्जे वाले क्षेत्रों या उनके आसपास रहते हैं।

बाघों की आबादी और उनके आवास का विस्तार होने के साथ मानव-बाघ संपर्क क्षेत्र भी बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं, जिनमें यदुवेंद्रदेव वी. झाला और उनके सहयोगी शामिल हैं, के अध्ययन के अनुसार पिछले दो दशकों में भारत में बाघों का अधिवास क्षेत्र करीब 30 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1,38,200 वर्ग किलोमीटर हो गया है।

हालांकि, इस विस्तार का बड़ा हिस्सा मानव बस्तियों और बहुउपयोगी क्षेत्रों के साथ साझा हो रहा है। अध्ययन के मुताबिक बाघों के कब्जे वाले लगभग 45 प्रतिशत आवास सख्त कोर संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थित हैं। इनमें टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र, वन्यजीव अभयारण्य, वन्यजीव गलियारे और मानव-प्रभुत्व वाले इलाके शामिल हैं, जहां खेती, पशुपालन और अन्य आजीविका गतिविधियां होती हैं।

करीब 25 प्रतिशत बाघ आवास ऐसे कोर क्षेत्रों में है, जहां मानव गतिविधियां काफी सीमित हैं। लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र बफर या अभयारण्यों में और करीब 10 प्रतिशत गलियारों में आता है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों के कुछ क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों और बाघों के बीच सह-अस्तित्व संभव हुआ है।

पर्यटन से मिलने वाले आर्थिक लाभ और पशुधन के नुकसान पर सरकारी मुआवजा योजनाएं भी संघर्ष कम करने में मदद करती हैं। हालांकि, बाघों की संख्या बढ़ने और कई संरक्षित क्षेत्रों की क्षमता संतृप्त होने के बाद उनके आसपास के इलाकों में फैलाव बढ़ रहा है। भारत में बाघों की संख्या अब 3,600 से अधिक आंकी जाती है, जो दुनिया की कुल बाघ आबादी का लगभग 75 प्रतिशत है। इसके परिणामस्वरूप अधिक बाघ रिजर्व की सीमाओं से बाहर निकलकर आसपास के साझा परिदृश्यों में पहुंच रहे हैं।

इससे मानव-बाघ संघर्ष, पशुधन के शिकार और कुछ क्षेत्रों में मानव मृत्यु की घटनाओं का जोखिम बढ़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार बाघ संरक्षण में ‘लैंड-सेविंग’ और ‘लैंड-शेयरिंग’ दोनों दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हैं। जहां सख्त संरक्षित कोर क्षेत्र प्रजनन करने वाली बाघ आबादी के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं, वहीं बहुउपयोगी क्षेत्रों में समुदायों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व के लिए प्रभावी व्यवस्थाएं आवश्यक हैं।

शोध में यह भी रेखांकित किया गया है कि गरीबी, अवैध वन्यजीव शिकार और पुराने मानव-बाघ संघर्ष जैसे सामाजिक-आर्थिक कारक बाघों की पुनर्बहाली को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों ने संघर्ष-निवारण, वन्यजीव गलियारों की बेहतर कनेक्टिविटी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी तथा संरक्षित और साझा दोनों प्रकार के परिदृश्यों में निरंतर निवेश को मजबूत करने की आवश्यकता बताई है।

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