वैज्ञानिकों ने बाघ और तेंदुओं की गैर-आक्रामक निगरानी के लिए एक नई तकनीक विकसित की है, जिसमें उनके मूत्र और मल में मौजूद वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) का रासायनिक विश्लेषण किया जाता है। इस पद्धति से वन्यजीवों को पकड़े या परेशान किए बिना उनकी प्रजाति, उम्र, लिंग और प्रजनन स्थिति की जानकारी मिल सकती है। अध्ययन में मशीन-लर्निंग की मदद से मूत्र और मल के नमूनों के जरिए बाघ और तेंदुए की पहचान में लगभग 75% से 79% तक सटीकता पाई गई है। यह तकनीक कैमरा ट्रैप और आनुवंशिक विश्लेषण जैसी पारंपरिक प्रणालियों की एक प्रभावी और कम लागत वाली पूरक बन सकती है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: बाघ और तेंदुओं की निगरानी के लिए वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो इन वन्यजीवों को पकड़ने या उन्हें किसी तरह परेशान किए बिना उनके बारे में महत्वपूर्ण जैविक जानकारी जुटाने में मदद कर सकती है।
इस पद्धति में जानवरों के मूत्र और मल में मौजूद विशिष्ट रासायनिक गंधों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज (NCBS), अहमदाबाद यूनिवर्सिटी और डेनिश एकेडमी ऑफ टेक्निकल साइंसेज के शोधकर्ताओं ने बंगाल टाइगर और भारतीय तेंदुओं द्वारा छोड़े गए scent marks में मौजूद वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (Volatile Organic Compounds—VOCs) का अध्ययन किया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन रासायनिक संकेतों में प्रजाति, उम्र, लिंग और यहां तक कि प्रजनन स्थिति से जुड़ी जानकारी छिपी हो सकती है। बड़े शिकारी जानवर अपने क्षेत्र को चिह्नित करने के लिए नियमित रूप से मूत्र का छिड़काव करते हैं और मल छोड़ते हैं। इन scent marks में विभिन्न प्रकार के VOCs का जटिल मिश्रण मौजूद होता है। ये रसायन दूसरे जानवरों तक उनकी पहचान और जैविक स्थिति से जुड़ी सूचनाएं पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं।
शोधकर्ताओं ने चिड़ियाघरों में रखे गए जानवरों से नमूने लिए। इसके अलावा, रणथंभौर टाइगर रिजर्व में व्यक्तिगत रूप से पहचाने गए जंगली बाघों के नमूनों का भी अध्ययन किया गया। इसके बाद नमूनों में मौजूद रासायनिक यौगिकों की पहचान और तुलना की गई। विश्लेषण के लिए Thermal Desorption-Gas Chromatography-Mass Spectrometry (TD-GC-MS) तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसके साथ मशीन-लर्निंग तकनीकों को जोड़ा गया, ताकि अलग-अलग जानवरों से प्राप्त रासायनिक संकेतों में पैटर्न की पहचान की जा सके।
अध्ययन में मशीन-लर्निंग आधारित वर्गीकरण ने मूत्र में मौजूद वाष्पशील यौगिकों के आधार पर बाघ और तेंदुए को अलग पहचानने में लगभग 79 प्रतिशत सटीकता हासिल की। मल के नमूनों के मामले में यह सटीकता लगभग 75 प्रतिशत रही। शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ वर्गों की पहचान अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से की जा सकी, विशेष रूप से मादाओं और कम उम्र के जानवरों के मामले में।
हालांकि, उम्रदराज नर जानवरों की पहचान में अभी और सुधार की आवश्यकता है। इस शोध की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जंगली बाघों के नमूनों में प्रजनन स्थिति से जुड़े संभावित रासायनिक संकेतों की पहचान है। शोधकर्ताओं ने पाया कि गर्भवती और स्तनपान कराने वाली मादा बाघिनों के मूत्र में nonanol या 2-nonanol नामक यौगिक का स्तर गैर-प्रजननशील मादाओं की तुलना में अधिक था। यह अंतर भविष्य में बाघिनों की प्रजनन स्थिति की पहचान के लिए एक संभावित रासायनिक संकेतक के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि इस निष्कर्ष को व्यापक स्तर पर क्षेत्रीय अध्ययनों के जरिए सत्यापित करने की आवश्यकता है। अध्ययन की संबंधित लेखिका B.V. Aditi Prasad के अनुसार, शोध का उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या जानवरों द्वारा प्राकृतिक रूप से छोड़ी गई गंध के जरिए उनकी प्रजाति, उम्र, लिंग और प्रजनन स्थिति जैसी जैविक जानकारी हासिल की जा सकती है, वह भी उन्हें पकड़ने, बेहोश करने या शारीरिक रूप से संभालने की आवश्यकता के बिना। वर्तमान में बाघों और अन्य बड़े मांसाहारी जीवों की निगरानी के लिए कैमरा ट्रैप और आनुवंशिक नमूना विश्लेषण जैसी तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। ये तरीके आबादी की संख्या, घनत्व और कई अन्य महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाने में प्रभावी हैं।
हालांकि, जानवरों की विस्तृत जनसांख्यिकीय और शारीरिक स्थिति से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने में उनकी कुछ सीमाएं हैं। नई गंध-आधारित तकनीक इन मौजूदा प्रणालियों की पूरक बन सकती है। इसका एक प्रमुख लाभ यह है कि जानवरों को पकड़ने या उनके करीब जाकर शारीरिक हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं होती।
इससे निगरानी के दौरान वन्यजीवों पर पड़ने वाले तनाव को कम किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पद्धति अपेक्षाकृत सरल और कम लागत वाली निगरानी व्यवस्था के रूप में विकसित की जा सकती है। हालांकि, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले इसकी सटीकता बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों तथा परिस्थितियों में इसकी विश्वसनीयता की जांच जरूरी होगी।
कान्हा नेशनल पार्क सहित भारत के विभिन्न बाघ परिदृश्यों में बाघों द्वारा scent-marking एक सामान्य व्यवहार है। ऐसे प्राकृतिक रासायनिक संकेतों को व्यवस्थित रूप से एकत्र कर उनका विश्लेषण किया जाए तो वन्यजीव प्रबंधकों को आबादी की संरचना, संभावित स्वास्थ्य संकेतकों और प्रजनन गतिविधियों की निगरानी में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में गंध विश्लेषण को कैमरा ट्रैप, आनुवंशिक नमूनों और अन्य पारंपरिक निगरानी प्रणालियों के साथ जोड़ा जा सकता है। इससे बाघ और तेंदुए जैसे संवेदनशील वन्यजीवों की निगरानी अधिक व्यापक तरीके से की जा सकेगी। हालांकि तकनीक अभी विकास और सत्यापन के चरण में है, लेकिन प्राकृतिक scent marks में मौजूद रासायनिक संकेतों को पढ़ने की क्षमता वन्यजीव संरक्षण विज्ञान में एक नया रास्ता खोल सकती है।

