भारत में तितलियों और पतंगों की प्रजातियाँ हैं 13,703
भारत में कॉकरोच की 191 प्रजातियाँ पाई जाती हैं
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
भारत में लेपिडोप्टेरा (तितलियों और पतंगों का समूह) को लेकर लंबे समय से बनी जिज्ञासा पर अब एक ऐतिहासिक वैज्ञानिक मुहर लग गई है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) के वैज्ञानिकों के एक गहन और विस्तृत विश्लेषण के बाद तैयार किया गया कैटलॉग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर पीयर-रिव्यूड जर्नल ‘ज़ूटैक्सा’ (Zootaxa) में प्रकाशित हो चुका है। नए आंकड़ों के अनुसार, भारत में तितलियों और पतंगों की कुल 13,703 प्रजातियाँ मौजूद हैं, जो दुनिया की कुल लेपिडोप्टेरा संख्या का लगभग सवा आठ फीसदी (8.25%) हैं।
12 साल की कड़ी मेहनत और खोज का नतीजा
ZSI के वरिष्ठ वैज्ञानिक नवनीत सिंह और राहुल जोशी ने 12 वर्षों की निरंतर फील्ड रिसर्च, म्यूज़ियम संग्रह के गहन निरीक्षण और सदियों पुराने वैज्ञानिक साहित्यों की छानबीन के बाद यह विशाल डेटाबेस तैयार किया है।
वैज्ञानिक नवनीत सिंह के अनुसार, “लेपिडोप्टेरा को व्यवस्थित तरीके से वर्गीकृत करने और उनका कैटलॉग बनाने का प्रयास पिछले 100 से अधिक वर्षों से चल रहा था। अब हम आधिकारिक तौर पर कह सकते हैं कि भारत में 13,703 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ये प्रजातियाँ 3,705 जेनेरा, 240 सब-फैमिली, 102 फैमिली और 31 सुपर-फैमिली में विभाजित हैं।” यह ऐतिहासिक दस्तावेज़ एक सदी से भी पुरानी टैक्सोनॉमिक गलतियों और खामियों को दूर करते हुए भारत को दुनिया के प्रमुख ‘मेगा-डायवर्स’ (Mega-diverse) देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा करता है।
जियोमेट्रोइडिया और कॉकरोच प्रजातियों पर भी बड़ा खुलासा
ZSI की इस महत्वपूर्ण स्टडी में लेपिडोप्टेरा और अन्य कीट समूहों से जुड़े कई दिलचस्प तथ्य सामने आए हैं।
जियोमेट्रोइडिया (Geometroidea) समूह: कुल 13,703 प्रजातियों में से 2,205 प्रजातियाँ जियोमेट्रोइडिया समूह की हैं। यह समूह 479 जेनेरा, 13 सब-फैमिली और 4 फैमिली में फैला हुआ है। दुनिया भर में पाई जाने वाली जियोमेट्रोइडिया प्रजातियों का लगभग 8.80% हिस्सा अकेले भारत में मौजूद है।
कॉकरोच की स्थानिक (Endemic) प्रजातियाँ: ZSI के एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि भारत में कॉकरोच की 191 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से लगभग 60% प्रजातियाँ केवल भारत में ही पाई जाती हैं (यानी वे स्थानिक हैं)।
यह शोध भारत की समृद्ध प्राकृतिक विरासत, जैव विविधता की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण नीतियों को नया आधार प्रदान करेगा।

