दिल्ली का वायु प्रदूषण केवल वाहनों, सड़क की धूल या निर्माण गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सालाना PM2.5 प्रदूषण का करीब एक-तिहाई हिस्सा (33%) ऐसे सूक्ष्म कणों से बनता है जो सीधे उत्सर्जित नहीं होते, बल्कि वातावरण में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के बाद तैयार होते हैं। Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) के विश्लेषण के अनुसार, सेकेंडरी अमोनियम सल्फेट इसका प्रमुख घटक है। जिसका स्तर पोस्ट-मानसून में 49% और सर्दियों में करीब 41% तक पहुँच जाता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: दिल्ली की वायु प्रदूषण समस्या केवल वाहनों, सड़क की धूल या निर्माण गतिविधियों तक सीमित नहीं है। एक विश्लेषण के मुताबिक, राजधानी के सालाना PM2.5 प्रदूषण का करीब एक-तिहाई हिस्सा ऐसे कणों से बनता है जो सीधे उत्सर्जित नहीं होते, बल्कि वातावरण में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के बाद तैयार होते हैं।
Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) के विश्लेषण में सेकेंडरी अमोनियम सल्फेट को इस प्रदूषण का प्रमुख घटक बताया गया है। अध्ययन के लिए 2024 के NASA MERRA-2 री-एनालिसिस डेटा का इस्तेमाल किया गया। इसके अनुसार अमोनियम सल्फेट दिल्ली के वार्षिक PM2.5 भार में औसतन करीब 33 प्रतिशत योगदान देता है। इस प्रदूषक की मात्रा मौसम के साथ तेजी से बदलती है। पोस्ट-मानसून अवधि में इसका योगदान करीब 49 प्रतिशत, जबकि सर्दियों में लगभग 41 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
इसके मुकाबले गर्मी और मानसून के दौरान इसका हिस्सा करीब 21 प्रतिशत बताया गया है। इस प्रक्रिया की शुरुआत मुख्य रूप से सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) से होती है। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों, उद्योगों, तेल रिफाइनरियों और ईंट भट्ठों से निकलने वाली SO₂ गैस वातावरण में ऑक्सीकृत होकर सल्फेट बनाती है। इसके बाद सल्फेट की प्रतिक्रिया अमोनिया से होती है। कृषि क्षेत्र में उर्वरकों के इस्तेमाल और पशुपालन समेत कई गतिविधियां अमोनिया का स्रोत हैं।
नमी और हवा के ठहराव जैसी परिस्थितियां इस रासायनिक प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकती हैं। परिणामस्वरूप बेहद महीन कण बनते हैं, जो PM2.5 का हिस्सा बनकर हवा में लंबे समय तक मौजूद रह सकते हैं। इस विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सेकेंडरी प्रदूषक बनाने वाली गैसें दिल्ली से काफी दूर स्थित स्रोतों से भी आ सकती हैं। यानी राजधानी की हवा पर आसपास के राज्यों और व्यापक क्षेत्र में होने वाले औद्योगिक तथा ऊर्जा उत्पादन से होने वाले उत्सर्जन का असर पड़ सकता है।
CREA के अनुसार, भारत के कुल PM2.5 प्रदूषण में सेकेंडरी पार्टिकुलेट मैटर की हिस्सेदारी कुछ परिस्थितियों में 42 प्रतिशत तक हो सकती है। कोयला आधारित बिजली उत्पादन वाले राज्यों में अमोनियम सल्फेट का योगदान भी अपेक्षाकृत अधिक पाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन निष्कर्षों से दिल्ली के वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की रणनीति में व्यापक क्षेत्रीय दृष्टिकोण की जरूरत सामने आती है।
सड़क की धूल, निर्माण और वाहन जैसे प्रत्यक्ष स्रोत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन PM2.5 का एक बड़ा हिस्सा वातावरण में बनने के कारण SO₂ और अमोनिया जैसी शुरुआती गैसों के उत्सर्जन को कम करना भी जरूरी है। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से SO₂ उत्सर्जन घटाने के लिए फ्ल्यू-गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) जैसी तकनीकों तथा कृषि क्षेत्र से अमोनिया उत्सर्जन कम करने के उपायों पर जोर दिया जा रहा है।
CREA ने भी कोयला आधारित संयंत्रों में SO₂ नियंत्रण को मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित की है। दिल्ली की हवा पर होने वाली बहस में यह तस्वीर एक अहम बदलाव दिखाती है—प्रदूषण सिर्फ उस धुएं का नाम नहीं जो चिमनी या वाहन से सीधे निकलता दिखाई देता है। हवा में अदृश्य रासायनिक प्रतिक्रियाएं भी वही महीन कण पैदा कर सकती हैं, जिन्हें हर दिन लोग सांस के साथ अपने फेफड़ों तक पहुंचा रहे हैं।

