प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत होने के कारण इस बार भारत में सामान्य से अधिक गर्म सर्दी और शीतलहर के दिनों में कमी आने की आशंका जताई गई है, जिसका सीधा असर देश की आगामी गेहूं की फसल पर पड़ सकता है। मौसम विभाग के अनुसार, सर्दियों में तापमान सामान्य से ऊपर रहने और फरवरी-मार्च में अधिक गर्मी होने से गेहूं के पकने की अवधि घट सकती है और पैदावार कम हो सकती है। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में इस संभावित संकट को लेकर चिंता बढ़ गई है, जिससे निपटने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने राज्यों को आकस्मिक योजनाओं और जलवायु-अनुकूल बीजों को अपनाने की सलाह दी है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत होने के साथ भारत में इस बार सामान्य से अधिक गर्म सर्दी पड़ने की आशंका जताई गई है। जलवायु अनुमानों के अनुसार, सर्दियों में शीतलहर के दिनों में कमी आ सकती है, जिससे देश की आगामी गेहूं की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, प्रशांत महासागर के प्रमुख क्षेत्रों में समुद्र की सतह का तापमान दिसंबर तक औसत से लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है।
विभिन्न अंतरराष्ट्रीय केंद्रों के मॉडलों पर आधारित इस अनुमान ने संभावित रूप से अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो को लेकर चिंता बढ़ाई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका प्रभाव शीतलहर की तीव्रता और आवृत्ति पर पड़ सकता है, जिससे सर्दियों का औसत तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है। भारत की प्रमुख रबी फसल गेहूं के लिए ठंडा मौसम जरूरी होता है।
खासकर फसल की बढ़वार और दाने भरने के चरण में तापमान की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। फरवरी और मार्च में तापमान अधिक रहने से फसल के पकने की अवधि घट सकती है, पैदावार कम हो सकती है और कटाई के आसपास गर्मी से नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डी.एस. पई ने कहा कि शीतलहर वाले दिनों की तीव्रता और संख्या कम रहने की आशंका है तथा सर्दियों का समग्र तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है।
कृषि विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों ने पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में संभावित असर को लेकर चिंता जताई है। वर्ष 2026 के कमजोर मानसून के बाद जलाशयों में पानी का स्तर कम रहने से कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए उपलब्ध अतिरिक्त जल भंडार भी सीमित हो सकता है।
इससे गर्म मौसम का जोखिम और बढ़ने की आशंका है। कुछ अनुमानों में हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी कम होने की संभावना भी जताई गई है, जिसका असर सेब की फसल पर पड़ सकता है। संभावित जोखिमों को देखते हुए राज्यों को आकस्मिक योजनाएं तैयार करने, पानी का कुशल उपयोग बढ़ाने और जलवायु के अनुकूल बीज किस्मों को अपनाने की सलाह दी जा रही है।
बुवाई के मौसम में किसानों को फसल प्रबंधन संबंधी उपायों के लिए तैयार रहने की जरूरत है। रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो की आशंकाओं के बीच सरकार ने 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्यों में भी संशोधन किया है। हालांकि, कृषि पर वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि वर्ष 2027 की शुरुआत तक अल नीनो की स्थिति किस तरह विकसित होती है।
वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती बदलते मौसम के बीच खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय की रक्षा करना है।
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