भारत सरकार ने वर्ष 2031 से 2035 के लिए नए और महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य (एनडीसी) तय किए हैं। इसके तहत 2035 तक जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में 47% की कमी लाने, कुल बिजली क्षमता का 60% हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने और 3.5 से 4 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बन सिंक विकसित करने का संकल्प लिया गया है। भारत 2026 तक पहले ही 52.57% गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता हासिल कर चुका है। सरकार का यह कदम 2070 तक नेट-जीरो और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : भारत सरकार ने वर्ष 2031 से 2035 की अवधि के लिए अपने संशोधित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को मंजूरी दे दी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत इन लक्ष्यों को पेरिस जलवायु समझौते के तहत संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। नए लक्ष्यों के तहत भारत ने वर्ष 2035 तक 2005 के स्तर की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की उत्सर्जन तीव्रता में 47 प्रतिशत की कमी लाने का संकल्प लिया है।
इसके साथ ही, कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत तक पहुंचाने और वन एवं वृक्ष आवरण के विस्तार के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
ये प्रतिबद्धताएं भारत के पहले के जलवायु लक्ष्यों को आगे बढ़ाती हैं। वर्ष 2015 में घोषित एनडीसी में 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 33 से 35 प्रतिशत कमी और बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की 40 प्रतिशत हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा गया था। वर्ष 2022 में संशोधित लक्ष्यों के तहत उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी और गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत करने का संकल्प लिया गया।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत फरवरी 2026 तक अपनी स्थापित बिजली क्षमता में 52.57 प्रतिशत हिस्सेदारी गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर चुका था। वहीं, वर्ष 2005 से 2020 के बीच उत्सर्जन तीव्रता में 36 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। वर्ष 2021 तक वनों और वृक्ष आवरण के माध्यम से लगभग 2.29 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य का कार्बन सिंक तैयार किया जा चुका था।
गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों में सौर, पवन, जलविद्युत, बायोमास और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं। हालांकि, स्थापित बिजली क्षमता में इन स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ने के बावजूद वास्तविक बिजली उत्पादन में उनका योगदान अपेक्षाकृत कम है। उपलब्ध हालिया आंकड़ों में यह हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत बताई गई है। ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर उपयोग के लिए बिजली ग्रिड के आधुनिकीकरण, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों और विभिन्न ऊर्जा स्रोतों के समुचित एकीकरण की आवश्यकता बनी हुई है।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों के तेजी से विस्तार का उल्लेख करते हुए नए लक्ष्यों को हासिल करने को लेकर विश्वास जताया। ये प्रतिबद्धताएं वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप हैं। सरकार की ऊर्जा योजनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार, बैटरी भंडारण, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर, स्वच्छ विनिर्माण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने में सक्षम बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया जा रहा है। भारत ने नए लक्ष्यों में समानता, साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं के सिद्धांतों तथा अपनी विकास संबंधी प्राथमिकताओं को भी महत्व दिया है।
सरकार का कहना है कि विकसित देशों को जलवायु कार्रवाई तेज करने के साथ विकासशील देशों को वित्तीय सहायता और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने में भी बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। आर्थिक विकास के साथ भारत का कुल उत्सर्जन बढ़ रहा है, लेकिन देश का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक स्तर पर अपेक्षाकृत कम बना हुआ है। नए एनडीसी भारत की बढ़ती बिजली मांग के बीच स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने और दीर्घकालिक जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की दिशा में एक और कदम हैं।
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