भारत में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ब्लैक कार्बन और मीथेन जैसे अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों (SLCPs) के उत्सर्जन में कटौती पर जोर दिया जा रहा है। इन प्रदूषकों पर नियंत्रण से तापमान वृद्धि की रफ्तार धीमी करने, वायु गुणवत्ता सुधारने, हिमालयी ग्लेशियरों को बचाने और कृषि उत्पादकता तथा खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : भारत में पर्यावरण विशेषज्ञों और नीति संस्थानों ने अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों (SLCPs) के उत्सर्जन में कटौती पर ध्यान केंद्रित किया है। ब्लैक कार्बन और मीथेन जैसे प्रदूषकों को नियंत्रित करना निकट भविष्य में तापमान वृद्धि की रफ्तार कम करने, वायु गुणवत्ता सुधारने और कृषि उत्पादकता को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
अल्पकालिक जलवायु प्रदूषक वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कम समय तक बने रहते हैं, लेकिन इस दौरान उनकी गर्मी रोकने की क्षमता काफी अधिक हो सकती है। ब्लैक कार्बन, जिसे आमतौर पर कालिख कहा जाता है, अधूरे दहन से पैदा होता है। वहीं मीथेन कृषि, पशुपालन, कचरा प्रबंधन और ऊर्जा क्षेत्र से उत्सर्जित होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्रदूषकों में लक्षित कटौती से निकट भविष्य में जलवायु परिवर्तन की गति धीमी करने के साथ स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को भी लाभ मिल सकता है। कुछ आकलनों में इनके उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण से वर्ष 2050 तक संभावित तापमान वृद्धि में 0.6 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आने की संभावना जताई गई है। भारत में ब्लैक कार्बन के प्रमुख स्रोतों में ठोस ईंधन से खाना पकाना, डीजल वाहन, ईंट भट्ठे और कृषि अवशेषों को जलाना शामिल हैं।
दूसरी ओर, देश में मीथेन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र से आता है। पशुओं के पाचन के दौरान होने वाला उत्सर्जन और धान के खेत इसके प्रमुख स्रोत हैं। कचरा तथा ऊर्जा क्षेत्र भी इसमें योगदान करते हैं। वैश्विक उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी लगभग नौ प्रतिशत आंकी जाती है, जिससे वह मीथेन उत्सर्जित करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।
ब्लैक कार्बन के कण जब हिमालयी ग्लेशियरों और बर्फ पर जमते हैं, तो सतह की सूर्य की रोशनी परावर्तित करने की क्षमता कम हो जाती है। इससे बर्फ तेजी से पिघल सकती है और उन नदी घाटियों की जल सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, जिन पर करोड़ों लोग निर्भर हैं। इसी तरह, वातावरण में अन्य प्रदूषकों की रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनने वाली निचले वायुमंडल की ओजोन फसलों को नुकसान पहुंचाती है।
इससे गेहूं, चावल और अन्य कृषि उत्पादों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। प्रदूषण कम करने से फसल क्षति घटाने और खाद्य उत्पादन को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद मिल सकती है। जलवायु एवं स्वच्छ वायु गठबंधन (CCAC) सहित विभिन्न संस्थानों और भारतीय नीति विशेषज्ञों के विश्लेषण में भी अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों को कम करने से होने वाले लाभों को रेखांकित किया गया है। पंजाब में कृषि से जुड़े उत्सर्जन घटाने के लिए स्वच्छ कोल्ड-चेन तकनीकों पर काम किया जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश सहित कुछ राज्यों ने गैर-कार्बन डाइऑक्साइड प्रदूषकों के उत्सर्जन का आकलन करने और उन्हें कम करने के लिए योजनाएं या रोडमैप विकसित किए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP), स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन को बढ़ावा देने वाली योजनाएं, बायोगैस और पशु अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े प्रयास भी इन प्रदूषकों को कम करने में योगदान दे सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों को केवल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन घटाने के सहायक मुद्दे के रूप में देखने के बजाय जलवायु, कृषि, ऊर्जा, परिवहन और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में सीधे शामिल किया जाना चाहिए।
ब्लैक कार्बन और मीथेन पर नियंत्रण से अपेक्षाकृत कम समय में जलवायु संबंधी लाभ मिलने की संभावना है। इससे हिमालयी जल संसाधनों की सुरक्षा, वायु प्रदूषण में कमी और कृषि व्यवस्था की जलवायु सहनशीलता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
बढ़ती गर्मी और अनियमित मौसम के बीच भारत के लिए इन प्रदूषकों पर प्रभावी नियंत्रण पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आजीविका और देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
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