उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित वासुंधरा ताल में राज्य की पहली ग्लेशियल झील प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (GLOF Early Warning System) स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसका उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे की रियल-टाइम निगरानी करना है। मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने वाडिया इंस्टीट्यूट, सीबीआरआई रुड़की और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों की संयुक्त टीम को इस अभियान के लिए रवाना किया है, जिसे SDRF, NDRF और ITBP का सहयोग मिल रहा है। यह अभियान 15 अक्टूबर तक चलेगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : उत्तराखंड ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे की रियल-टाइम निगरानी मजबूत करने के लिए चमोली जिले की वासुंधरा ताल में राज्य की पहली ग्लेशियल झील प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
29 सितंबर 2026 को राज्य सचिवालय से मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून और सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI), रुड़की के वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम को रवाना किया।
अभियान 15 अक्टूबर तक चलेगा। इसमें SDRF, NDRF और ITBP का सहयोग मिल रहा है। करीब 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित वासुंधरा ताल की गहराई लगभग 38 मीटर है। यह उत्तराखंड की उन 13 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों में शामिल है, जिन्हें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने चिन्हित किया है।
राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के 2023 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 344 ग्लेशियल झीलें हैं। सौर ऊर्जा से संचालित प्रणाली में जलस्तर, मौसम, बर्फ की गहराई, भूमिगत तापमान, भू-गतिविधि और जल प्रवाह मापने वाले सेंसर लगाए जाएंगे। मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण डेटा सैटेलाइट के जरिए भेजा जाएगा। निर्धारित सीमा पार होने पर सिस्टम स्वतः अलर्ट जारी कर आपदा प्रबंधन अधिकारियों तक सूचना पहुंचाएगा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों के जरिए आपदा तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। यह परियोजना राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा लागू की जा रही है।
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