भारत में स्कूली पर्यावरण शिक्षा को किताबों और रटने तक सीमित रखने के बजाय “अनुभव-आधारित सीख” (जैसे—स्कूल वॉटर ऑडिट, वेस्ट ऑडिट, सोलर पैनल, कंपोस्टिंग) में बदलने की जरूरत है। NEP 2020 और NCF 2023 के तहत पर्यावरण शिक्षा को सिर्फ विज्ञान तक सीमित न रखकर गणित, भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र और कला जैसे सभी विषयों में पिरोने (Interdisciplinary approach) की सिफारिश की गई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत आज एक निर्णायक पर्यावरणीय मोड़ पर खड़ा है। जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, पानी की कमी, जंगलों का कटना, जैव विविधता का घटना, बढ़ता कचरा और मौसम की चरम घटनाएं—ये अब कोई दूर की, सिर्फ वैश्विक चिंताएं नहीं रहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही हैं।
आज के बच्चों के लिए ये चुनौतियां सिर्फ पाठ्यपुस्तकों का विषय नहीं हैं—आने वाले कल की अर्थव्यवस्था, सेहत, आजीविका और समुदाय इन्हीं से आकार लेंगे।
इसीलिए स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा का मतलब सिर्फ जंगल, प्रदूषण या रीसाइक्लिंग के बारे में पढ़ाना भर नहीं होना चाहिए।
भारत के पास इसके लिए पहले से एक मजबूत नीतिगत आधार मौजूद है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 पर्यावरण जागरूकता, जल एवं संसाधन संरक्षण, स्वच्छता जैसी क्षमताओं को छात्रों के लिए अहम मानती है।
वहीं स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 भी पर्यावरण शिक्षा को एक अंतर-विषयक क्षेत्र के तौर पर पूरे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश करती है। असली चुनौती अब इन नीतिगत वादों को कक्षा और समुदाय के स्तर पर सार्थक अनुभवों में बदलने की है।
असल लक्ष्य यही होना चाहिए कि “पर्यावरण के बारे में पढ़ने” से आगे बढ़कर “पर्यावरण के जरिए सीखने और पर्यावरण के लिए काम करने” तक पहुंचा जाए।
किताबी पाठ से अनुभव आधारित सीख की ओर भारत जो सबसे बड़ा बदलाव कर सकता है, वह है पर्यावरण शिक्षा में किताबों पर निर्भरता कम करना। बच्चे पर्यावरणीय समस्याओं को तब कहीं बेहतर समझते हैं जब वे अपने आसपास खुद देख, नाप और सुलझा सकें।
मसलन, जल संरक्षण पर पढ़ाया जाने वाला पाठ स्कूल के “वॉटर ऑडिट” में बदला जा सकता है। छात्र रोजाना पानी की खपत माप सकते हैं, टपकते नलों की पहचान कर सकते हैं, वर्षा जल संचयन का अध्ययन कर सकते हैं और यह हिसाब लगा सकते हैं कि छोटे-छोटे बदलावों से कितना पानी बचाया जा सकता है।
इसी तरह कचरे से जुड़े किसी अध्याय के साथ एक हफ्ते का “वेस्ट ऑडिट” जोड़ा जा सकता है, जिसमें छात्र गीले, सूखे, पुनर्चक्रण योग्य और खतरनाक कचरे को अलग-अलग वर्गीकृत करना सीखें।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम भी इसी बात पर जोर देता है कि कक्षा के ज्ञान को प्रकृति में मिलने वाले अनुभवों और व्यावहारिक गतिविधियों से पूरक बनाया जाए।
इसके लिए स्कूलों को महंगे ढांचे की जरूरत नहीं—एक बगीचा, कंपोस्टिंग यूनिट, वर्षामापी यंत्र, मौसम स्टेशन, जैव विविधता का एक कोना, या सौर ऊर्जा से चलने वाली कोई छोटी व्यवस्था ही एक जीवंत कक्षा बन सकती है।
हर विषय को “हरा” बनाएं पर्यावरण शिक्षा को सिर्फ विज्ञान या पर्यावरण अध्ययन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जलवायु और स्थिरता अपने स्वभाव से ही अंतर-विषयक विषय हैं। गणित के छात्र कार्बन उत्सर्जन, बारिश के पैटर्न, बिजली की खपत और कचरे की मात्रा का हिसाब लगा सकते हैं।
भूगोल में बदलते भू-दृश्य, भूजल और शहरीकरण का अध्ययन हो सकता है। इतिहास में पारंपरिक जल-प्रबंधन प्रणालियों और सामुदायिक संरक्षण पद्धतियों को टटोला जा सकता है। अर्थशास्त्र हरित परिवर्तन की लागत और अवसरों का विश्लेषण कर सकता है।
भाषा विषयों में पर्यावरण पत्रकारिता, कहानी-लेखन और रचनात्मक लेखन के जरिए पारिस्थितिक विषयों को उठाया जा सकता है। कला की कक्षाओं में बेकार सामग्री को उपयोगी वस्तुओं में बदला जा सकता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 खुद पर्यावरण शिक्षा को एक अंतर-विषयक क्षेत्र के रूप में देखती है, और मौजूदा भारतीय पाठ्यक्रम पहले से ही कई विषयों में पर्यावरणीय विषयों को पिरोए हुए है।
इस तरीके से स्थिरता कोई अलग-थलग अध्याय नहीं रह जाती, जिसे परीक्षा के लिए रटा जाए, बल्कि यह पूरी सीखने की प्रक्रिया से गुजरता एक सूत्र बन जाती है। स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं से जोड़कर पढ़ाएं पर्यावरण शिक्षा तब कहीं ज्यादा असरदार बनती है जब बच्चे पाठ में अपने ही मोहल्ले को देख पाते हैं।
लखनऊ का कोई स्कूल शहरी गर्मी, घटते भूजल, यातायात प्रदूषण और आसपास की झीलों की हालत पर अध्ययन कर सकता है। राजस्थान का कोई स्कूल पानी की कमी और पारंपरिक वर्षा जल संचयन प्रणालियों की पड़ताल कर सकता है।
तटीय इलाकों के छात्र मैंग्रोव, चक्रवात और तटीय कटाव के बारे में सीख सकते हैं। हिमालयी स्कूल भूस्खलन, बदलते बर्फबारी के पैटर्न और जैव विविधता जैसे विषयों को खंगाल सकते हैं।
भारत की पर्यावरणीय विविधता खुद में एक शैक्षणिक ताकत है। हर क्षेत्र अपने आप में एक अलग “पर्यावरण कक्षा” बन सकता है। स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान को भी ज्यादा तवज्जो मिलनी चाहिए।
भारत के अलग-अलग समुदायों ने पीढ़ियों से जल संरक्षण, खेती, जंगल और संसाधन प्रबंधन को लेकर अपनी-अपनी पद्धतियां विकसित की हैं। भारत को लेकर यूनेस्को की सिफारिशें भी जलवायु शिक्षा में स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान की अहमियत को खासतौर पर रेखांकित करती हैं।
छात्रों को सिर्फ किताबों और शिक्षकों से ही नहीं, बल्कि किसानों, वन कर्मियों, वैज्ञानिकों, कारीगरों, नगर निगम कर्मचारियों, संरक्षणविदों और समुदाय के बुजुर्गों से भी सीखने का मौका मिलना चाहिए। स्कूलों को खुद बनाएं “ग्रीन कैंपस” जो पढ़ाया जा रहा है, स्कूल को खुद उसका जीता-जागता उदाहरण बनना चाहिए।
कोई स्कूल पानी बर्बाद करते हुए, बेवजह बिजली खर्च करते हुए या ढेर सारा बेतरतीब कचरा पैदा करते हुए स्थिरता को असरदार ढंग से नहीं सिखा सकता। इसलिए स्कूलों को ऊर्जा, पानी, कचरा, परिवहन, भोजन और जैव विविधता जैसे पहलुओं को कवर करते हुए हर साल एक स्थिरता ऑडिट करना चाहिए।
सोलर पैनल अक्षय ऊर्जा को व्यावहारिक रूप से दिखा सकते हैं। वर्षा जल संचयन पानी बचाने का पाठ पढ़ा सकता है। कंपोस्टिंग चक्रीयता को समझा सकती है। देसी पौधे जैव विविधता के छोटे क्षेत्र बना सकते हैं।
ऊर्जा-दक्ष लाइटिंग यह दिखा सकती है कि तकनीक कैसे खपत घटा सकती है। यूनेस्को का ग्रीन स्कूल क्वालिटी स्टैंडर्ड पूरे संस्थान को साथ लेकर चलने वाला दृष्टिकोण अपनाता है, जो चार क्षेत्रों पर टिका है—प्रबंधन, सुविधाएं और संचालन, शिक्षण-अधिगम, और सामुदायिक भागीदारी।
भारत ऐसे ही किसी ढांचे को अपनाकर एक राष्ट्रव्यापी “ग्रीन स्कूल मिशन” बना सकता है, जिसमें स्कूलों को सिर्फ बुनियादी ढांचे के आधार पर नहीं, बल्कि मापने योग्य पर्यावरणीय नतीजों के आधार पर मान्यता मिले। शिक्षकों को सक्षम बनाना जरूरी बिना शिक्षकों के किसी भी पर्यावरण शिक्षा सुधार का सफल होना मुश्किल है।
यूनेस्को एक बड़े वैश्विक अंतर की ओर इशारा करता है—सर्वे में शामिल ज्यादातर शिक्षक मानते हैं कि जलवायु शिक्षा जरूरी है, लेकिन इसे पढ़ाने के लिए खुद को तैयार महसूस करने वाले शिक्षकों की संख्या 30% से भी कम है। इसलिए भारतीय शिक्षकों को जलवायु विज्ञान, जैव विविधता, स्थिरता, पर्यावरण संचार और अनुभव-आधारित शिक्षण पद्धति में निरंतर प्रशिक्षण की जरूरत है।
शिक्षक प्रशिक्षण में सिर्फ सैद्धांतिक जानकारी नहीं, बल्कि व्यावहारिक पाठ योजनाएं भी दी जानी चाहिए। एक शिक्षक को यह पता होना चाहिए कि स्कूल का ऊर्जा ऑडिट कैसे किया जाए, जैव विविधता सर्वे कैसे आयोजित हो, जलवायु से जुड़े आंकड़ों को कैसे समझाया जाए, विकास और संरक्षण पर बहस कैसे कराई जाए, और छात्रों को सामुदायिक परियोजनाओं में कैसे मार्गदर्शन दिया जाए।
शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान इसके लिए विश्वविद्यालयों, पर्यावरण संगठनों, शोध संस्थानों और सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर क्षेत्रीय संसाधन केंद्र बना सकते हैं। परीक्षा प्रणाली में बदलाव शायद सबसे अहम बदलाव मूल्यांकन के तरीके में करना होगा। अगर पर्यावरण शिक्षा लेक्चर के जरिए पढ़ाई जाए लेकिन रटने के आधार पर परखी जाए, तो छात्र स्वाभाविक रूप से तथ्यों को याद करने को ही प्राथमिकता देंगे। इसके बजाय पर्यावरणीय सीख को परियोजनाओं, फील्ड अवलोकन, समस्या-समाधान, प्रस्तुतियों और पोर्टफोलियो के जरिए परखा जाना चाहिए।
किसी छात्र को अपने मोहल्ले का जैव विविधता मानचित्र तैयार करने, स्थानीय वायु गुणवत्ता की जांच करने, घर के लिए कचरा-प्रबंधन योजना बनाने, या स्कूल की बिजली खपत घटाने का प्रस्ताव तैयार करने को कहा जा सकता है। ऐसे मूल्यांकन एक साथ ज्ञान, विश्लेषण क्षमता, रचनात्मकता, सहयोग और नागरिक जिम्मेदारी—सबकी परख कर सकते हैं।
मकसद ऐसे छात्र तैयार करना नहीं होना चाहिए जो सिर्फ जलवायु परिवर्तन की परिभाषा बता सकें। मकसद ऐसे छात्र गढ़ना होना चाहिए जो यह पूछ सकें—मेरे आसपास क्या हो रहा है, यह क्यों हो रहा है, और मैं इसके लिए क्या कर सकता हूं? तकनीक का इस्तेमाल, पर प्रकृति से नाता बनाए रखते हुए डिजिटल तकनीक पर्यावरण शिक्षा का दायरा बहुत बढ़ा सकती है।
सैटेलाइट तस्वीरें, इंटरैक्टिव मानचित्र, मौसम के आंकड़े, जैव विविधता डेटाबेस और डिजिटल सिमुलेशन छात्रों को उन पर्यावरणीय प्रणालियों को समझने में मदद कर सकते हैं जिन्हें हमेशा सीधे देखा नहीं जा सकता। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस छात्रों को डेटा का विश्लेषण करने, ऊर्जा खपत की तुलना करने या संभावित पर्यावरणीय परिदृश्यों का मॉडल बनाने में मदद कर सकता है।
मोबाइल ऐप प्रजातियों की पहचान, पेड़ों की मैपिंग और सिटीजन-साइंस परियोजनाओं में सहायक हो सकते हैं। लेकिन तकनीक को प्रकृति से सीधे जुड़ाव का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक बनना चाहिए। बच्चों को मिट्टी छूने, कीड़े-मकोड़े देखने, पेड़ लगाने, जंगलों में घूमने, नदियां देखने और मौसम के बदलाव को खुद महसूस करने की भी उतनी ही जरूरत है।
सबसे बेहतर पर्यावरण शिक्षा वही होगी जो डिजिटल समझ और प्राकृतिक अनुभव, दोनों को साथ लेकर चले। जलवायु के लिहाज से तैयार स्कूल बनाना पर्यावरण शिक्षा में जलवायु से निपटने की क्षमता को भी शामिल करना जरूरी है।
स्कूलों को छात्रों को लू, बाढ़, तूफान, पानी की कमी और जलवायु से जुड़े अन्य खतरों के लिए तैयार करना चाहिए। छात्र आपदा-तैयारी अभ्यासों में हिस्सा ले सकते हैं, स्थानीय जोखिमों की मैपिंग कर सकते हैं और आपातकालीन योजनाएं बना सकते हैं।
इमारतों को भी छाया, हवादार बनावट, पानी और ऊर्जा की बचत तथा गर्मी प्रबंधन के जरिए जलवायु के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। यह सोच यूनेस्को के ग्रीन स्कूल ढांचे से मेल खाती है, जो जलवायु-सुरक्षा, आपातकालीन तैयारी, संसाधन प्रबंधन और स्कूल की स्थिरता की निगरानी में छात्रों की भागीदारी पर जोर देता है।
स्कूलों को समुदाय से जोड़ना जब छात्र अपनी सीख को घर तक ले जाते हैं, तो पर्यावरण शिक्षा का असर कई गुना बढ़ जाता है। स्कूल कचरे के अलगाव, जल संरक्षण, पेड़ों की सुरक्षा और जिम्मेदार उपभोग को लेकर सामुदायिक अभियान चला सकते हैं। छात्र घरों में बिजली खपत का सर्वे कर सकते हैं या स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर आसपास की पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान कर सकते हैं।
अभिभावकों को भी इसमें भागीदार बनाया जाना चाहिए। स्कूल का स्थिरता कार्यक्रम परिवारों को भोजन की बर्बादी घटाने, पानी बचाने, एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक से बचने और ऊर्जा-दक्ष आदतें अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इस तरह स्कूल पूरे मोहल्ले के लिए पर्यावरण-ज्ञान का केंद्र बन सकता है। हरित कौशल और करियर के रास्ते खोलना पर्यावरण शिक्षा को सिर्फ यह नहीं सिखाना चाहिए कि प्रकृति की रक्षा कैसे करें, बल्कि यह भी दिखाना चाहिए कि हरित अर्थव्यवस्था में रोमांचक करियर के अवसर भी मौजूद हैं।
अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, टिकाऊ खेती, हरित भवन, कचरा प्रबंधन, पर्यावरण सलाह और जलवायु तकनीक की तरफ भारत का बढ़ता रुझान नए कौशल की मांग पैदा करेगा। स्कूल छात्रों को पर्यावरण इंजीनियरिंग, अक्षय ऊर्जा तकनीक, जैव विविधता संरक्षण, टिकाऊ वास्तुकला, जलवायु विज्ञान, पर्यावरण पत्रकारिता, हरित वित्त और चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रबंधन जैसे करियर विकल्पों से परिचित करा सकते हैं।
व्यावसायिक शिक्षा में सोलर इंस्टॉलेशन, कंपोस्टिंग, जल प्रबंधन, जैविक खेती, रीसाइक्लिंग और ऊर्जा ऑडिट जैसे व्यावहारिक मॉड्यूल शामिल किए जा सकते हैं। भारत को लेकर यूनेस्को की सिफारिशें खासतौर पर जलवायु शिक्षा और हरित कौशल एवं व्यावसायिक शिक्षा के बीच मजबूत जुड़ाव बनाने की बात कहती हैं। छात्रों को आवाज देना युवाओं को सिर्फ पर्यावरणीय जानकारी लेने वालों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्हें पर्यावरणीय फैसलों में भागीदार बनाया जाना चाहिए। स्कूल छात्रों के नेतृत्व वाली “ग्रीन काउंसिल” बना सकते हैं, जिनकी जिम्मेदारी ऊर्जा, पानी, कचरे और जैव विविधता की निगरानी हो। छात्र स्कूल प्रशासन के सामने स्थिरता से जुड़े प्रस्ताव रख सकते हैं और उन्हें लागू करने में भी भागीदार बन सकते हैं। अंतर-स्कूल प्रतियोगिताओं में सिर्फ पोस्टर और नारों के बजाय व्यावहारिक समाधानों को इनाम दिया जाना चाहिए।
जो छात्र सस्ती जल-बचत प्रणाली डिजाइन करता है या कचरा घटाने का सफल अभियान चलाता है, उसे नवाचार के लिए पहचान मिलनी चाहिए। इससे बच्चों में डर के बजाय आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना पैदा होती है। नतीजों को मापना आखिर में, भारत को मापने योग्य नतीजों की जरूरत है। एक राष्ट्रीय ग्रीन स्कूल ढांचा प्रति छात्र बिजली खपत, पानी की बचत, कचरे का सही निपटान, पेड़ों और जैव विविधता का दायरा, पर्यावरणीय परियोजनाओं में भागीदारी, शिक्षक प्रशिक्षण और सामुदायिक भागीदारी जैसे संकेतकों पर नजर रख सकता है। स्कूलों को हर साल सरल भाषा में अपनी स्थिरता रिपोर्ट प्रकाशित करनी चाहिए।
जिला-स्तर के डैशबोर्ड शिक्षा अधिकारियों को अलग-अलग स्कूलों की प्रगति की तुलना करने और जिन स्कूलों को मदद की जरूरत है, उनकी पहचान करने में मदद कर सकते हैं। यूनेस्को का ग्रीन स्कूल क्वालिटी स्टैंडर्ड भी प्रबंधन, संचालन, शिक्षण-अधिगम और सामुदायिक भागीदारी—इन सभी क्षेत्रों में मापने योग्य प्रगति पर जोर देता है।
एक नई पर्यावरणीय सीखने की संस्कृति भारत को पर्यावरण शिक्षा शून्य से शुरू नहीं करनी है। पाठ्यक्रम में पहले से पर्यावरणीय विषय मौजूद हैं, एनईपी 2020 और एनसीएफ 2023 के जरिए नीतिगत समर्थन भी है, और सरकार के कार्यक्रम अनुभव-आधारित सीख को बढ़ावा भी दे रहे हैं। अब जरूरत है तो बड़े पैमाने पर इसे जमीन पर उतारने की।
असली बदलाव पर्यावरण को महज एक विषय समझने से आगे बढ़कर, स्थिरता को स्कूल की पूरी संस्कृति बनाने का होना चाहिए। एक सच्चा हरित स्कूल सिर्फ यह नहीं बताएगा कि पानी कीमती है—वह यह भी दिखाएगा कि स्कूल खुद कितना पानी इस्तेमाल कर रहा है और छात्रों को इसे घटाने की चुनौती देगा। वह सिर्फ जैव विविधता समझाएगा नहीं, बल्कि स्थानीय प्रजातियों के लिए आवास भी बनाएगा। वह सिर्फ जलवायु परिवर्तन पर चर्चा नहीं करेगा, बल्कि ऊर्जा खपत मापकर जलवायु-सहनशीलता की योजनाएं भी बनाएगा। और वह बच्चों से सिर्फ प्रकृति बचाने को कहेगा नहीं, बल्कि उन्हें पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान खोजने का कौशल और आत्मविश्वास भी देगा। भारत की जनसांख्यिकीय ताकत इस बदलाव को बड़ी संभावना देती है।
हर साल लाखों छात्र स्कूलों में दाखिल होते हैं। अगर पर्यावरण जागरूकता, वैज्ञानिक समझ, व्यावहारिक कौशल और जिम्मेदार व्यवहार उनकी रोजमर्रा की पढ़ाई का हिस्सा बन जाएं, तो इसका असर स्कूल की चारदीवारी से कहीं आगे तक जा सकता है। इसलिए भारत में पर्यावरण शिक्षा का भविष्य और अध्याय जोड़ने में नहीं, बल्कि बच्चों के सीखने के तरीके, स्कूलों के काम करने के ढंग और समुदायों की भागीदारी को बदलने में छिपा है। भविष्य का हरित स्कूल एक साथ कक्षा भी होगा, प्रयोगशाला भी, सामुदायिक केंद्र भी—और स्थिरता की एक जीती-जागती मिसाल भी।
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