फिजी में आयोजित प्री-कॉप31 (Pre-COP31) बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने विकसित देशों से जलवायु वित्तपोषण (Climate Finance) की कमी को दूर करने और पेरिस समझौते के तहत की गई अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने का आह्वान किया। भारत ने स्पष्ट किया कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के लिए सार्वभौमिक मॉडल के बजाय प्रत्येक देश की राष्ट्रीय परिस्थितियों, ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों’ (CBDR-RC) और समानता के सिद्धांतों का सम्मान किया जाना चाहिए। पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के तहत विकसित देशों से विकासशील देशों को वित्तीय सहायता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण उपलब्ध कराने की मांग करते हुए भारत ने कहा कि केवल नई घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि पुराने वादों का तेजी से क्रियान्वयन आवश्यक है। नवंबर 2026 में अंताल्या (तुर्किये) में होने वाले COP31 से भारत को ऐसे संतुलित और व्यावहारिक परिणामों की उम्मीद है जो जलवायु अनुकूलन और उत्सर्जन में कमी दोनों को मजबूत करें।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : भारत ने विकसित देशों से जलवायु वित्तपोषण में लगातार बनी कमी को दूर करने और पेरिस समझौते के तहत अपनी मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह निभाने का आह्वान किया है। भारत ने जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों पर एक समान रणनीति लागू नहीं की जा सकती, क्योंकि प्रत्येक देश की परिस्थितियां, विकास संबंधी प्राथमिकताएं और जरूरतें अलग-अलग हैं।
अक्टूबर 2026 की शुरुआत में फिजी में आयोजित प्री-कॉप31 की तैयारी बैठकों में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए यह बात कही।
उन्होंने विकासशील देशों को जलवायु संबंधी लक्ष्यों को अधिक महत्वाकांक्षी बनाने में सक्षम करने के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाने, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण पर विशेष जोर दिया। ऑस्ट्रेलिया, फिजी और तुवालु की सह-मेजबानी में आयोजित प्री-कॉप31, नवंबर 2026 में तुर्किये के अंताल्या में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप31) की तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की आवश्यकता पर व्यापक सहमति है, लेकिन जलवायु संबंधी अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ उन्हें हासिल करने के लिए आवश्यक संसाधन और व्यावहारिक सहायता भी उपलब्ध करानी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जलवायु कार्रवाई के लिए कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं हो सकता। प्रत्येक देश की राष्ट्रीय परिस्थितियों, विकास प्राथमिकताओं और समानता के सिद्धांतों का सम्मान करना आवश्यक है।
इस संदर्भ में उन्होंने साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, स्थानीय परिस्थितियों के आकलन के आधार पर ही जलवायु अनुकूलन और उत्सर्जन में कमी से जुड़े उचित उपाय तय किए जाने चाहिए। भारत ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और इन प्रयासों को लागू करने के साधनों पर समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता रेखांकित की।
यादव ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 को अंतरिम एजेंडे में शामिल किए जाने को महत्वपूर्ण अवसर बताया। यह प्रावधान विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को जलवायु कार्रवाई के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने से संबंधित है।
उन्होंने कहा कि केवल नई प्रतिबद्धताओं की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है। पहले से किए गए वादों को तेजी से लागू करना और वित्तीय संसाधनों तथा उनके वितरण में मौजूद कमियों को दूर करना भी जरूरी है। भारत को उम्मीद है कि कॉप31 में ऐसा संतुलित और महत्वाकांक्षी परिणाम सामने आएगा, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और उनके अनुकूलन, दोनों को आगे बढ़ाएगा। इसके साथ ही विकासशील देशों को आवश्यक वित्तीय सहायता, तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण के अवसर मिलने चाहिए, ताकि वे जलवायु संबंधी प्रयासों में प्रभावी भागीदारी कर सकें।
भूपेंद्र यादव ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कॉप31 की अध्यक्षता करने वाले पक्ष, सम्मेलन के अध्यक्षों और सभी भागीदार देशों के साथ रचनात्मक सहयोग करने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।
भारत का यह रुख उसकी लंबे समय से चली आ रही नीति को दर्शाता है, जिसके अनुसार वैश्विक जलवायु सहयोग तभी सफल हो सकता है, जब सहायता वास्तव में जरूरतमंद देशों और समुदायों तक पहुंचे। भारत ने संकेत दिया कि जलवायु कार्रवाई को केवल घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय जमीन पर ठोस परिणाम देने वाली व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है।

