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जंगल

अमूर फाल्कन की 6,000 किमी की वापसी उड़ान शुरू, मणिपुर के जंगलों की ओर बढ़े प्रवासी पक्षी

Environment Pulse
Last updated: September 5, 2026 9:09 pm
Environment Pulse
Published: September 5, 2026
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अमूर फाल्कन (छोटे प्रवासी शिकारी पक्षी) ने दक्षिणी अफ्रीका से भारत के रास्ते अपने प्रजनन क्षेत्रों (मणिपुर और सुदूर पूर्व) की ओर अपनी लंबी वापसी यात्रा शुरू कर दी है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। प्रकृति की सबसे अद्भुत लंबी दूरी की प्रवास यात्राओं में शामिल अमूर फाल्कन ने दक्षिणी अफ्रीका से भारत के रास्ते अपने प्रजनन क्षेत्रों की ओर वापसी यात्रा शुरू कर दी है। सैटेलाइट ट्रांसमीटर से लैस इन छोटे प्रवासी शिकारी पक्षियों में कुछ ने करीब 6,000 किलोमीटर की लगभग नॉन-स्टॉप उड़ान भरनी शुरू की है। इनका लक्ष्य भारत-म्यांमार सीमा के निकट मणिपुर के वन क्षेत्र और आगे सुदूर पूर्व में स्थित प्रजनन क्षेत्र हैं।

इस असाधारण प्रवास की निगरानी मणिपुर अमूर फाल्कन ट्रैकिंग प्रोजेक्ट के तहत की जा रही है। इस परियोजना का नेतृत्व वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) राज्य वन विभाग के सहयोग से कर रहा है। नवंबर 2025 में मणिपुर के तामेंगलांग जिले के चिउलुआन रोस्टिंग साइट पर कुछ अमूर फाल्कन को हल्के सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाए गए थे। इनमें अपापांग, अलांग और आहू नाम के पक्षी भी शामिल हैं। दक्षिणी अफ्रीका के गैर-प्रजनन क्षेत्रों में चार महीने से अधिक समय बिताने के बाद ये पक्षी अब वसंत प्रवास के तहत उत्तर और पूर्व की ओर बढ़ रहे हैं।

उनका प्रवासी मार्ग भारत से होकर गुजरता है और मणिपुर इस लंबी यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी इस असाधारण प्रवास को रेखांकित किया है। उनके अनुसार सोमालिया से पूर्वोत्तर भारत की दिशा में समुद्री क्षेत्र पार करते समय अमूर फाल्कन लगभग छह दिनों में करीब 6,000 किलोमीटर की लगातार उड़ान भर सकते हैं। यह दूरी इस छोटे से पक्षी की असाधारण उड़ान क्षमता और ऊर्जा-संचय की क्षमता को दर्शाती है।

सैटेलाइट निगरानी ने इस यात्रा के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाया है। ट्रैक किए गए पक्षियों में युवा मादा अलांग की गतिविधियां अरब सागर के ऊपर दर्ज की गईं, जहां वह भारत के पश्चिमी तट की दिशा में बढ़ रही थी। अनुकूल पछुआ हवाओं ने उसकी उड़ान को अतिरिक्त सहायता दी। लगभग 150 ग्राम वजन वाले अमूर फाल्कन को दुनिया के सबसे उल्लेखनीय प्रवासी पक्षियों में गिना जाता है।

इतनी लंबी दूरी तय करने से पहले ये पक्षी अपने शरीर में पर्याप्त ऊर्जा जमा करते हैं। मणिपुर के तामेंगलांग जैसे पड़ावों पर दीमकों और अन्य उपलब्ध खाद्य स्रोतों का भरपूर सेवन करके वे लंबी समुद्री उड़ान के लिए खुद को तैयार करते हैं। तामेंगलांग लंबे समय से अमूर फाल्कन के महत्वपूर्ण सामुदायिक संरक्षण क्षेत्रों में शामिल रहा है। प्रवास के दौरान यहां एक समय में एक लाख से अधिक पक्षियों का जमावड़ा देखा जा चुका है।

स्थानीय समुदायों की भागीदारी ने इन पक्षियों की सुरक्षा और उनके महत्वपूर्ण रोस्टिंग स्थलों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई है। सैटेलाइट ट्रैकिंग परियोजना का महत्व केवल इन पक्षियों की वर्तमान स्थिति जानने तक सीमित नहीं है। इससे वैज्ञानिकों को उनके प्रवास मार्ग, उड़ान की गति, समय-निर्धारण, समुद्री क्षेत्र पार करने की रणनीति और लंबी दूरी के नेविगेशन को समझने में मदद मिल रही है।

आने वाले वर्षों में यह जानकारी अमूर फाल्कन के आवासों और प्रवासी मार्गों के बेहतर संरक्षण की रणनीति तैयार करने में उपयोगी साबित हो सकती है। विशेषज्ञों और वन अधिकारियों का कहना है कि अमूर फाल्कन की यह यात्रा पूर्वोत्तर भारत के पारिस्थितिक महत्व को भी रेखांकित करती है। भारत केवल इन पक्षियों के प्रवास का रास्ता नहीं है, बल्कि मणिपुर जैसे क्षेत्र उनके जीवन-चक्र में महत्वपूर्ण पड़ाव प्रदान करते हैं।

अमूर फाल्कन की वर्तमान यात्रा पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। सैटेलाइट से मिलने वाले नए संकेतों से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि ये पक्षी मणिपुर के किन वन क्षेत्रों से गुजरते हैं और भारत-म्यांमार सीमा के आसपास उनके प्रवासी मार्ग किस तरह बदलते हैं। छोटे आकार और महज कुछ सौ ग्राम से कम वजन के बावजूद हजारों किलोमीटर की यात्रा करने वाला अमूर फाल्कन प्रवासी पक्षियों की अद्भुत सहनशक्ति का उदाहरण है।

इसके संरक्षण में वैज्ञानिक निगरानी के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मणिपुर से शुरू हुई यह निगरानी अब इस बात की नई तस्वीर पेश कर रही है कि एक छोटा सा पक्षी महाद्वीपों और महासागरों को पार कर हर वर्ष अपने प्रजनन क्षेत्र तक कैसे पहुंचता है।

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