देश के कई ताप विद्युत संयंत्रों में भारी बारिश के कारण खनन और परिवहन प्रभावित होने से कोयले का भंडार गंभीर रूप से कम हो गया है। 5 सितंबर तक 58 ऐसे बिजली संयंत्र थे, जहां कोयले का भंडार जरूरत के 25 प्रतिशत से भी कम (या 3 दिन से कम की खपत के बराबर) बचा है। इस संकट से निपटने के लिए सरकार और कोल इंडिया ने रेल के जरिए कोयले की आपूर्ति तेज कर दी है, जिससे लोडिंग 3 सितंबर के 370 रेक से बढ़कर 6 सितंबर को 444 रेक प्रतिदिन हो गई है। हालांकि खदानों के पास पर्याप्त कोयला मौजूद है, लेकिन मुख्य चुनौती इसे समय पर प्रभावित बिजलीघरों तक पहुँचाना है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। देश के कई ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले का भंडार गंभीर स्तर तक पहुंचने के बाद सरकार ने बिजलीघरों तक ईंधन की आपूर्ति तेज कर दी है।
कोयला खदानों से बिजली संयंत्रों तक रेल के जरिए अधिक मात्रा में कोयला भेजा जा रहा है। प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में भारी बारिश के कारण खनन और परिवहन प्रभावित होने से बिजली उत्पादन के लिए ईंधन की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 5 सितंबर तक ऐसे बिजली संयंत्रों की संख्या बढ़कर 58 हो गई, जहां कोयले का भंडार निर्धारित जरूरत के 25 प्रतिशत से कम रह गया है या तीन दिन से भी कम समय के उत्पादन के लिए ईंधन उपलब्ध है।
इनमें 53 संयंत्र घरेलू कोयले पर आधारित हैं। अगस्त के अंत में ऐसे संयंत्रों की संख्या 46 थी। कोयला मंत्रालय ने स्थिति पर लगातार नजर रखने की बात कही है।
मंत्रालय के अनुसार, कम भंडार वाले बिजली संयंत्रों तक आपूर्ति सुधारने के लिए आवश्यक कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं। कोयला आपूर्ति बढ़ाने के लिए रेल रेक की संख्या में भी तेजी लाई गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिजली संयंत्रों के लिए कोयला लोडिंग 3 सितंबर के 370 रेक से बढ़कर 6 सितंबर को 444 रेक प्रतिदिन हो गई।
3 सितंबर के बाद हर दिन लोडिंग में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आपूर्ति बढ़ाने में सरकारी कंपनी कोल इंडिया और उसकी सहायक कंपनियों के साथ निजी खदानों की भी भूमिका है। बिजलीघरों में भंडार घटने के बीच कोल इंडिया ने मौजूदा ईंधन आपूर्ति समझौतों वाले संयंत्रों को अतिरिक्त कोयला उपलब्ध कराने की पेशकश भी की है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के अनुसार, 2 सितंबर तक 50 ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले का भंडार उनकी निर्धारित आवश्यकता के 25 प्रतिशत से कम था। इन संयंत्रों के पास कुल 2.82 करोड़ टन कोयला उपलब्ध था, जबकि निर्धारित जरूरत करीब 5.87 करोड़ टन थी।
85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर पर यह भंडार करीब नौ दिन की खपत के बराबर था, जबकि सामान्य स्थिति में लगभग 19 दिन का भंडार अपेक्षित माना जाता है। कोयले की आपूर्ति पर सबसे बड़ा असर मानसून की भारी बारिश का पड़ा है। ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में बारिश के कारण खनन गतिविधियों और कोयले के परिवहन की रफ्तार प्रभावित हुई है।
दूसरी ओर बिजली की मांग ऊंची बनी हुई है, जिससे बिजलीघरों तक समय पर कोयला पहुंचाना और भी महत्वपूर्ण हो गया है। भारत की बिजली व्यवस्था में ताप विद्युत की अहम भूमिका है। देश के कुल बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी करीब तीन-चौथाई है।
ऐसे में यदि ईंधन आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो बिजली उत्पादन और ग्रिड की विश्वसनीयता पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, सरकार ने देश में व्यापक कोयला संकट की बात नहीं कही है। दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी कोल इंडिया के पास उसके खदान क्षेत्रों में करीब 7.6 करोड़ टन कोयले का भंडार मौजूद है।
इसलिए मौजूदा चुनौती मुख्य रूप से उपलब्ध कोयले को खदानों से उन बिजली संयंत्रों तक तेजी से पहुंचाने की है, जहां भंडार तेजी से कम हुआ है। अब सरकार का ध्यान कोयला खदानों से बिजलीघरों तक परिवहन की गति बढ़ाने पर है। अधिक रेल रेक, खदानों से अतिरिक्त आपूर्ति और कम भंडार वाले संयंत्रों की निगरानी के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश की जा रही है।
मानसून से जुड़ी परिवहन संबंधी दिक्कतें कम होने के साथ बिजलीघरों में कोयले का भंडार सामान्य स्तर पर लौटने की उम्मीद है।
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