
25 लाख की आबादी वाले शहर में पानी की कमी के बीच डेटा सेंटर को 20 साल की गारंटी पर सवाल, हाईकोर्ट में सुनवाई इसी महीने।
सिर्फ़ 860 मीटर दूर तेंदुओं के नाज़ुक आवास को नुकसान पहुँचने की आशंका, अमेरिका में भी उठे डेटा सेंटर विरोधी सुर।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
विशाखापत्तनम में AI हब को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। गूगल का $15 अरब का भारतीय डेटा सेंटर पानी और वन्यजीवों से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। विशाखापत्तनम में एक बड़ा AI हब पानी की कमी और पास ही मौजूद तेंदुए अभयारण्य के कारण विवाद का केंद्र बन गया है। भारत में डेटा-सेंटर का तेज़ी से बढ़ता कारोबार स्थानीय सीमाओं से टकरा रहा है।
$15 अरब का डेटा Center और ज़मीनी विरोध
भारत में गूगल का सबसे बड़ा दांव ज़मीनी स्तर पर विरोध का सामना कर रहा है। विशाखापत्तनम में उसका $15 अरब का डेटा-सेंटर प्रोजेक्ट पानी के इस्तेमाल और पास रहने वाले वन्यजीवों को लेकर बढ़ते विरोध में फंस गया है।
यह प्रोजेक्ट किसी भी पैमाने पर बहुत बड़ा है। गौतम अडानी के ग्रुप के साथ मिलकर बनाया जा रहा यह प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे बड़े डेटा-सेंटर निवेशों में से एक है। राज्य सरकार का कहना है कि इससे 188,000 तक नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
पानी की किल्लत और 20 साल की गारंटी पर विवाद
पानी सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा है। विशाखापत्तनम में 480 मिलियन लीटर की मांग के मुकाबले रोज़ाना लगभग 410 मिलियन लीटर पानी मिलता है। 25 लाख की आबादी वाले इस शहर में एक नए बड़े ग्राहक के आने से पहले ही पानी की राशनिंग करनी पड़ती है। निवासियों को डर है कि स्थिति और खराब हो जाएगी। एक्टिविस्ट का तर्क है कि पानी की भारी खपत करने वाला डेटा सेंटर जलाशयों पर दबाव डालेगा और कमी को और बढ़ाएगा। इससे एक सार्वजनिक संसाधन घरों की ज़रूरतों को पूरा करने के बजाय सर्वर को ठंडा करने में इस्तेमाल होगा।
राज्य सरकार ने उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश की है। सरकार ने प्रोजेक्ट के लिए 20 साल तक पानी की गारंटी दी है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा है कि ग्रामीण इलाकों के पीने के पानी का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। आलोचक इसे मौजूदा पानी की कमी के साथ मेल नहीं खाती हुई बात मानते हैं।
गूगल का कहना है कि उसका डिज़ाइन इस समस्या को कम करता है। कंपनी स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए एडवांस्ड एयर कूलिंग तकनीक का ज़िक्र करती है। यह तरीका हाइपरस्केल साइट द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पानी की मात्रा को कम तो करता है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं करता।
कंबालकोंडा वन्यजीव अभयारण्य पर खतरा और कानूनी जंग
इसके अलावा वन्यजीवों का मुद्दा भी है। कंबालकोंडा वन्यजीव अभयारण्य यहाँ से सिर्फ़ 860 मीटर दूर है। यह तेंदुओं और पैंगोलिन का घर है। संरक्षणवादियों ने चेतावनी दी है कि निर्माण कार्य का शोर और भारी मशीनरी उनके नाज़ुक आवास को नुकसान पहुँचा सकती है।
यह विवाद अदालतों तक पहुँच गया है। पर्यावरण अदालत में कई कानूनी चुनौतियाँ दायर की गई हैं। इस महीने के आखिर में हाई कोर्ट में सुनवाई होनी है, जिससे प्रोजेक्ट की समय-सीमा पर भारी दबाव बन गया है।
राज्य सरकार का कहना है कि उसने पूरी तैयारी कर ली है। अधिकारी इस बात से इनकार करते हैं कि प्रोजेक्ट को बिना सही रिस्क असेसमेंट के तेज़ी से आगे बढ़ाया गया। उनका कहना है कि मंज़ूरी ज़रूरी एनवायरनमेंटल जांच के बाद ही मिली, न कि उसे नज़रअंदाज़ करके।
ग्लोबल AI हब बनने की चुनौती और जन-आंदोलन
भारत के लिए, दांव पर सिर्फ़ एक शहर नहीं है। देश ग्लोबल AI डेवलपमेंट का हब बनना चाहता है। विशाखापत्तनम के मामले को वह कैसे संभालता है, इससे यह तय होगा कि दूसरे बड़े प्रोजेक्ट्स का विरोध होगा या स्वागत।
विरोध प्रदर्शनों का एक नारा भी है। मार्च करने वालों ने ऐसे बैनर उठाए जिन पर लिखा था “हम डेटा नहीं पी सकते।” यह एक ऐसे समुदाय की सोच को साफ़ तौर पर दिखाता है जो नौकरी के वादों और रोज़मर्रा की ज़रूरतों के बीच तुलना कर रहा है। कैंपेन चलाने वाले इसे प्राथमिकताओं का मामला बताते हैं। ‘ग्रीन विशाखा’ के फ़ाउंडर राजा राम मोहन रॉय ने साफ़ कहा कि विकास लोगों की आजीविका की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
वैश्विक स्तर पर भी उठ रहे विरोध के सुर
विरोध सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी डेटा-सेंटर का विरोध राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है। दर्जनों राज्यों में लोग AI डेवलपमेंट का विरोध कर रहे हैं। पानी का मुद्दा बार-बार विवाद का कारण बनता है। इसके समर्थक भी मानते हैं कि यह एक पेचीदा मुद्दा है। यह दावा कि डेटा सेंटर गोल्फ़ कोर्स की तुलना में कम पानी इस्तेमाल करते हैं, असल आंकड़े देखने पर सवालों के घेरे में आ जाता है।
कुछ सरकारों ने दखल देना शुरू कर दिया है। न्यूयॉर्क अमेरिका का पहला राज्य बना जिसने एक साल के लिए नए डेटा सेंटरों पर रोक लगा दी। यह इस बात का संकेत है कि मंज़ूरी देने की आसान प्रक्रिया अब सख़्त हो रही है।
गूगल के समर्थक कंपनी के पिछले कामों का ज़िक्र करते हैं। कंपनी ने पानी के सही इस्तेमाल और साफ़ ऊर्जा को लेकर सार्वजनिक वादे किए हैं। उनका तर्क है कि सही कूलिंग और सोर्सिंग के साथ ऐसे प्रोजेक्ट ज़िम्मेदारी से बनाए जा सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि सिर्फ़ वादे करना आसान है। विशाखापत्तनम में असल बात यह है कि पानी कहाँ से आता है। क्या किसी कंपनी से किए गए वादे तब भी पूरे होंगे जब सूखे के साल में मुश्किल फ़ैसले लेने पड़ें।
भारत की दुविधा इस तेज़ी से बढ़ते विकास का एक छोटा रूप है। वह निवेश और नौकरियाँ चाहता है। लेकिन जिन प्रोजेक्ट्स से ये मिलते हैं, उनकी पर्यावरण के लिहाज़ से भारी कीमत चुकानी पड़ती है। विशाखापत्तनम वह जगह है जहाँ अब इस बात पर संघर्ष हो रहा है।
Also Read: बारिश की कमी का असर: भारत में खरीफ की बुआई पिछले साल के मुकाबले करीब 39 लाख हेक्टेयर कम

