छत्तीसगढ़ में तेजी से बढ़ते कोयला खनन और बड़े पैमाने पर वन कटाव के कारण हसदेव अरण्य के जंगलों और एलिफेंट कॉरिडोर (हाथी गलियारों) पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। विपक्षी नेताओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस पर गहरी चिंता जताई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। छत्तीसगढ़ में तेजी से हो रहे कोयला खनन और उससे जुड़े बड़े पैमाने पर वन कटाव को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि खनन परियोजनाओं के लिए जंगलों की कटाई से हाथियों के महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग यानी एलिफेंट कॉरिडोर खंडित हो रहे हैं।
इससे मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने के साथ मध्य भारत में एशियाई हाथियों की आबादी के दीर्घकालिक अस्तित्व पर भी खतरा पैदा हो रहा है। चिंता का सबसे बड़ा केंद्र हसदेव अरण्य के घने जंगल हैं, जिन्हें अक्सर छत्तीसगढ़ के ‘फेफड़े’ कहा जाता है। राज्य विधानसभा में कांग्रेस विधायकों ने सरगुजा, हसदेव अरण्य कोलफील्ड्स, तमनार और बस्तर क्षेत्रों में कोयला परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का आरोप लगाया है।
विपक्ष का कहना है कि कई परियोजनाओं को कथित तौर पर ऐसी जनसुनवाइयों के बाद मंजूरी मिली, जिनकी प्रक्रिया और प्रभावशीलता पर सवाल उठाए गए हैं। कांग्रेस नेताओं के अनुसार, हसदेव अरण्य में लाखों पेड़ों की कटाई से जैव विविधता, जल संसाधनों और हाथियों के आवागमन वाले मार्गों को नुकसान पहुंचा है। उनका दावा है कि यदि वनों की कटाई जारी रही तो मानव-हाथी संघर्ष और जल संकट दोनों गंभीर रूप ले सकते हैं।
विपक्ष ने राज्य की भाजपा सरकार पर औद्योगिक हितों को पर्यावरण और आदिवासी कल्याण से ऊपर रखने का आरोप लगाया है। पर्यावरण समूहों और हसदेव बचाओ संघर्ष समिति तथा छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन जैसे संगठनों ने भी खनन विस्तार के खिलाफ आवाज उठाई है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि परसा ईस्ट और कांता बसन (PEKB) ब्लॉक के अलावा कांता एक्सटेंशन जैसी प्रस्तावित परियोजनाएं बड़े पैमाने पर वन कटाई का कारण बन सकती हैं। इनमें से कुछ क्षेत्र लेमरू हाथी रिजर्व और उन वन गलियारों के करीब हैं, जिनके जरिए झारखंड और ओडिशा से हाथियों के झुंड छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों तक पहुंचते हैं।
इन जंगलों से होकर गुजरने वाले महत्वपूर्ण गलियारों में चारमार-जिंगोल कॉरिडोर भी शामिल है। कुछ हिस्सों में इस मार्ग से करीब 80 से 100 हाथियों की आवाजाही का अनुमान लगाया जाता है। संरक्षण विशेषज्ञों के मुताबिक खुले में होने वाले कोयला खनन से प्राकृतिक आवास और जल स्रोतों के नष्ट होने के कारण हाथी मानव बस्तियों के करीब पहुंच रहे हैं।
इसके परिणामस्वरूप फसल नुकसान, संपत्ति की क्षति और मानव तथा हाथियों की मौत की घटनाएं बढ़ी हैं। कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी देशभर में हाथी आवासों और कॉरिडोर पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि खनन और अन्य परियोजनाओं के कारण हाथियों के आवास और उनके पारंपरिक मार्ग व्यवस्थित तरीके से नष्ट किए जा रहे हैं।
यह मुद्दा ऐसे समय में सामने आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में हाथी गलियारों में मौजूद अवरोधों का सर्वेक्षण करने की दिशा में महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। लेमरू क्षेत्र के कुछ हिस्सों को पहले नीलामी से बाहर रखने संबंधी फैसलों के बावजूद हाल की मंजूरियों और अतिरिक्त वन भूमि के इस्तेमाल की सिफारिशों ने विरोध को फिर तेज कर दिया है।
आदिवासी समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ता खनन संबंधी मंजूरियां रद्द करने, पेसा कानून और वन अधिकार कानून के तहत ग्रामसभा की सहमति सुनिश्चित करने तथा खनिज दोहन की तुलना में संरक्षण को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हाथी गलियारों की सुरक्षा केवल एक प्रजाति के संरक्षण का मुद्दा नहीं है।
ये गलियारे वन्यजीव आबादी के बीच आनुवंशिक संपर्क बनाए रखने, पारिस्थितिक संतुलन कायम रखने और जंगलों पर निर्भर समुदायों की आजीविका सुरक्षित रखने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। यदि वन आवासों के विनाश और बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष पर तत्काल प्रभावी रोक नहीं लगाई गई, तो छत्तीसगढ़ में संरक्षण और मानव सुरक्षा—दोनों से जुड़ा संकट और गहरा सकता है।
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