केरल के कोट्टायम जिले के मलारिक्कल में गुलाबी वाटर लिली (वॉटर लिली/कमल) के अनियंत्रित प्रसार से क्षेत्र के धान के खेत प्रमुख पर्यटन स्थल बन गए हैं, जिससे स्थानीय लोगों की कमाई करोड़ों में पहुंच गई है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इनका अत्यधिक फैलाव जलीय पारिस्थितिकी, जल प्रवाह, और रामसर स्थल (वेम्बनाड-कोल आर्द्रभूमि) की स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही, पौधों के सड़ने से मीथेन गैस का उत्सर्जन बढ़ सकता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण और सतत प्रबंधन को लेकर चिंताएं गहरी हो गई हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : केरल के कोट्टायम जिले में मलारिक्कल के धान के खेतों को गुलाबी जलकुंभियों जैसे आकर्षक वाटर लिली के फूलों ने प्रमुख पर्यटन स्थल बना दिया है। हालांकि, इन फूलों की अनियंत्रित वृद्धि अब स्थानीय शोधकर्ताओं और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
वैज्ञानिकों को आशंका है कि इन पौधों का तेजी से फैलाव क्षेत्र की नाजुक आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी को लंबे समय में प्रभावित कर सकता है। केरल राज्य जैव विविधता बोर्ड के लिए कराए गए दो वर्षीय अध्ययन में पाया गया कि 2018 की विनाशकारी बाढ़ के बाद मलारिक्कल क्षेत्र में वाटर लिली का विस्तार असाधारण रूप से बढ़ा है।
हर साल जून से अक्टूबर के बीच गुलाबी फूलों से ढके खेत पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यहां मुख्य रूप से Nymphaea × omarana या इससे संबंधित Nymphaea rubra प्रजाति के पौधे पाए जाते हैं। इन फूलों की लोकप्रियता ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी है। किसान, नाव संचालक और स्थानीय निवासी नाव की सैर, खानपान सेवाओं तथा पौधों और फूलों की बिक्री से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।
एक किसान की मौसमी कमाई एक से दो लाख रुपये तक पहुंच सकती है, जबकि पूरे क्षेत्र का कारोबार करोड़ों रुपये में होने का अनुमान है। शोधकर्ताओं के अनुसार, वाटर लिली की घनी परत पानी में सूर्य के प्रकाश के प्रवेश को रोक सकती है। इससे स्थानीय जलीय पौधों की वृद्धि प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा, पौधों का अत्यधिक फैलाव जल प्रवाह को बाधित कर सकता है और मछलियों सहित अन्य जलीय जीवों के आवास में बदलाव ला सकता है।
मौसम के अंत में बड़ी मात्रा में पौधों के सड़ने-गलने से मीथेन उत्सर्जन भी बढ़ सकता है। मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान देती है। अध्ययन में थन्नीरमुक्कम बैराज के लंबे समय तक बंद रहने को भी एक महत्वपूर्ण कारक बताया गया है।
धान की देर से बोई जाने वाली फसल की सुरक्षा के लिए संचालित इस व्यवस्था के कारण मीठे और खारे पानी के प्राकृतिक संतुलन में बदलाव आया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, पहले यह संतुलन खरपतवारों की वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद करता था। अब किसान अगली धान की बुवाई से पहले इन पौधों को नियंत्रित करने के लिए बार-बार खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हालांकि, इनके बीज पानी के नीचे तलछट में लंबे समय तक बने रह सकते हैं, जिससे पौधों का पूरी तरह उन्मूलन मुश्किल हो जाता है। वैज्ञानिकों ने यह भी माना है कि वाटर लिली के कुछ सकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। इनसे मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ सकती है। इसके अलावा, पौधों की कुछ प्रजातियां फाइटोरेमेडिएशन प्रक्रिया के जरिए पानी और मिट्टी से भारी धातुओं को अवशोषित करने में सक्षम होती हैं।
इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि अनियंत्रित विस्तार कुट्टनाड की विशिष्ट धान खेती प्रणाली की दीर्घकालिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। समुद्र तल से नीचे स्थित खेतों के लिए प्रसिद्ध यह क्षेत्र वेम्बनाड-कोल आर्द्रभूमि का हिस्सा है, जिसे रामसर स्थल के रूप में अंतरराष्ट्रीय महत्व प्राप्त है। स्थानीय शोधकर्ताओं और पर्यावरण संगठनों ने वाटर लिली के विस्तार को नियंत्रित करने के लिए संतुलित प्रबंधन रणनीति अपनाने की मांग की है।
इनमें मशीनों के जरिए नियंत्रित तरीके से पौधों को हटाना, जैविक नियंत्रण के उपाय, जल प्रवाह का बेहतर प्रबंधन और पौधों के प्रसार की नियमित निगरानी शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन फूलों से मिलने वाले पर्यटन और रोजगार संबंधी लाभों को बनाए रखते हुए आर्द्रभूमि की पारिस्थितिकी की रक्षा करना जरूरी है। मलारिक्कल की गुलाबी फूलों से ढकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर लगातार लोकप्रिय हो रही हैं, लेकिन इनके पीछे उभरती पर्यावरणीय चुनौतियां प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
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