वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों की एक नई चेतावनी के अनुसार, दुनिया में तेजी से घटती जैव विविधता को बचाने के लिए वैश्विक प्रकृति वित्त व्यवस्था में बुनियादी बदलाव करना बेहद जरूरी है। ‘ग्लोबल एनवायरनमेंटल चेंज’ जर्नल में प्रकाशित शोध और आर्मेनिया में आयोजित COP17 सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि प्राकृतिक पूंजी बाजारों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता और मौजूदा वित्तीय मॉडल प्रकृति संरक्षण के लिए नाकाफी हैं। वर्ष 2023 में पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों में 7.3 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हुआ, जो प्रकृति आधारित समाधानों (220 अरब डॉलर) से लगभग 30 गुना अधिक है। इसलिए, विशेषज्ञों ने मांग की है कि वित्तीय सुधारों के तहत पर्यावरण विरोधी सब्सिडी को बदला जाए, प्रकृति से जुड़े जोखिमों को वित्तीय नियमों में शामिल किया जाए और स्थानीय समुदायों के अधिकारों एवं सामाजिक कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : दुनिया में तेजी से घटती जैव विविधता को बचाने के लिए वैश्विक प्रकृति वित्त व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की जरूरत है। वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा वित्तीय मॉडल, विशेषकर प्राकृतिक पूंजी बाजार (नेचुरल कैपिटल मार्केट), पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और पुनर्बहाली के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं।
ग्लोबल एनवायरनमेंटल चेंज जर्नल में प्रकाशित एक नए शोध पत्र में विशेषज्ञों ने कहा है कि प्रकृति संरक्षण के लिए धन जुटाना अपने आप में लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य पर्यावरणीय सुधार, जैव विविधता की बहाली और स्थानीय समुदायों के सामाजिक कल्याण को सुनिश्चित करना होना चाहिए।
साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय के डॉ. थियो स्टेनली के नेतृत्व में किए गए इस शोध में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के स्मिथ स्कूल ऑफ एंटरप्राइज एंड एनवायरनमेंट की प्रोफेसर नथाली सेडन और सर्कुलर बायोइकोनॉमी एलायंस के जस्टिन एडम्स भी शामिल हैं।
यह अध्ययन आर्मेनिया में आयोजित हो रहे जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (COP17) के दौरान सामने आया है, जहां प्रकृति संरक्षण के लिए वित्त जुटाना प्रमुख मुद्दा है। प्रोफेसर सेडन के अनुसार, मौजूदा आर्थिक व्यवस्थाएं अभी भी ऐसे कार्यों को प्रोत्साहित करती हैं, जो प्रकृति के विनाश का कारण बनते हैं।
प्राकृतिक पूंजी बाजारों ने कुछ उपयोगी नवाचार जरूर किए हैं, लेकिन उनसे मिलने वाले संभावित लाभों की तुलना में उन पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्राथमिकता जैव विविधता से समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और उन समुदायों के अधिकारों एवं कल्याण को मिलनी चाहिए, जो प्रकृति के साथ रहते हैं और उसकी देखभाल करते हैं।
शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक पूंजी बाजारों की पांच प्रमुख कमियां बताई हैं। इनमें बड़े स्तर पर विस्तार की सीमाएं, वास्तविक पर्यावरणीय बहाली के बजाय नुकसान की भरपाई पर जोर, सामाजिक और पारिस्थितिक परिणामों की तुलना में वित्तीय लाभ को प्राथमिकता, पर्यावरणीय प्रभावों का सटीक आकलन करने में कठिनाई तथा न्याय और समानता से जुड़े सवाल शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बेहतर मानक और बाजार व्यवस्था विकसित करने से इन समस्याओं का समाधान नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 रिपोर्ट के आंकड़े भी इस असंतुलन को उजागर करते हैं। वर्ष 2023 में जीवाश्म ईंधन सब्सिडी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले क्षेत्रों सहित प्रकृति के प्रतिकूल गतिविधियों में 7.3 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हुआ, जबकि प्रकृति आधारित समाधानों के लिए केवल 220 अरब डॉलर उपलब्ध कराए गए।
यानी प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में निवेश, संरक्षण संबंधी निवेश से लगभग 30 गुना अधिक रहा। सकारात्मक निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी महज 23 अरब डॉलर थी। वैश्विक जैव विविधता, जलवायु और भूमि बहाली के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रकृति आधारित समाधानों में निवेश को 2030 तक बढ़ाकर सालाना 571 अरब डॉलर करना होगा, जो मौजूदा स्तर से लगभग 2.5 गुना अधिक है।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क के तहत 2030 तक जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रतिवर्ष 200 अरब डॉलर जुटाने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली सब्सिडी में कम से कम 500 अरब डॉलर का सुधार या पुनर्निर्देशन करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्ष 2024 में विकसित देशों से विकासशील देशों को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वित्त 18.9 अरब डॉलर तक पहुंचा, जो 20 अरब डॉलर के अंतरिम लक्ष्य के करीब है।
हालांकि, कुल वित्तीय जरूरत और उपलब्ध संसाधनों के बीच अंतर अभी भी बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल नए निवेश जुटाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि मौजूदा पूंजी के प्रवाह की दिशा बदलनी होगी। इसके लिए पर्यावरण विरोधी सब्सिडी में सुधार, वित्तीय नियमों और क्रेडिट रेटिंग में प्रकृति से जुड़े जोखिमों को शामिल करना, अनिवार्य पर्यावरणीय खुलासे तथा सार्वजनिक वित्त और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को बढ़ावा देना जरूरी है।
जस्टिन एडम्स ने कहा कि प्रकृति संरक्षण के लिए वित्तीय बाजार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन केवल उनकी कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने से प्रकृति के विनाश को बढ़ावा देने वाली आर्थिक प्रोत्साहन व्यवस्था नहीं बदलेगी। इसके लिए सरकारों, कारोबारियों और समुदायों को मिलकर प्राकृतिक संसाधनों के स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती में निवेश करना होगा। शोधकर्ताओं के मुताबिक, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का आधे से अधिक हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति पर निर्भर है।
ऐसे में जैव विविधता का नुकसान केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानव कल्याण के लिए भी गंभीर चुनौती है। विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि जब तक प्रकृति की बहाली और सामाजिक समानता को वित्तीय व्यवस्था के केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक जैव विविधता के नुकसान को रोकना और उसे फिर से बहाल करना मुश्किल होगा।

