ब्राजील की जेकीटिन्होन्या घाटी में बड़े पैमाने पर नीलगिरी के एकल-प्रजाति वाले वृक्षारोपण के कारण पिछले 45 वर्षों में भूजल स्तर लगभग 4.5 मीटर नीचे गिर गया है और कई झरने सूख चुके हैं। नीलगिरी के पेड़ों की अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन दर और कम जल पुनर्भरण क्षमता के चलते स्थानीय जलचक्र गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है, जिससे पारंपरिक खेती, पशुपालन और ग्रामीण समुदायों की जल सुरक्षा पर संकट खड़ा हो गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : ब्राजील की जेकीटिन्होन्या घाटी में बड़े पैमाने पर लगाए गए नीलगिरी (Eucalyptus) के एकल-प्रजाति वाले वृक्षारोपण को क्षेत्र में भूजल स्तर में उल्लेखनीय गिरावट से जोड़ा गया है।
शोध के अनुसार, 45 वर्षों की अवधि में यहां जलस्तर करीब 4.5 मीटर नीचे चला गया, जबकि बड़ी संख्या में झरने और छोटी जलधाराएं भी सूख गईं। इसका असर स्थानीय समुदायों और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ा है।
मिनास गेराइस के अल्टो जेकीटिन्होन्या क्षेत्र, विशेषकर तुरमालिना के पास चपाडा दास वेर्दास पठार में किए गए अध्ययनों के अनुसार, 1970 के दशक से औद्योगिक स्तर पर नीलगिरी के वृक्षारोपण का स्थानीय जलचक्र पर गहरा प्रभाव पड़ा। शोधकर्ताओं के विश्लेषण के मुताबिक, 1974 से 2019 के बीच भूजल स्तर लगभग 4.5 मीटर घटा।
नीलगिरी तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है और इसका इस्तेमाल इस्पात उद्योग के लिए चारकोल तथा कार्बन ऑफसेट परियोजनाओं में बायोचार के उत्पादन में किया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसकी सालभर उच्च वाष्पोत्सर्जन दर होती है और यह मूल सेराडो सवाना वनस्पति की तुलना में अधिक पानी खपत करता है।
अध्ययनों में पाया गया कि प्राकृतिक सेराडो वनस्पति वाले क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा मिट्टी में रिसकर भूजल भंडार को रिचार्ज करता था, जबकि घने नीलगिरी वृक्षारोपण वाले क्षेत्रों में यह अनुपात करीब 29 प्रतिशत रह गया। पठारी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में प्राकृतिक वनस्पति का विस्तार भी तेजी से घटा।
1970 के दशक की शुरुआत में जहां यह 86 प्रतिशत से अधिक था, बाद के आकलनों में यह करीब 25 प्रतिशत रह गया। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में नीलगिरी के बागान 60 प्रतिशत से अधिक भूमि पर फैल गए। 2019 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि स्थानीय वेरदास (झरना-आधारित आर्द्रभूमि) में से करीब 89 प्रतिशत सूख चुके थे।
जलप्रवाह पर भी इसका असर दर्ज किया गया है। फानाडो नदी के आंकड़ों में 1980 के दशक के बाद अधिकतम जलप्रवाह में भारी कमी दिखाई देती है। कभी सालभर बहने वाली कई धाराएं अब शुष्क मौसम में रुक-रुककर बहती हैं। जलस्रोतों में कमी ने पारंपरिक खेती, पशुपालन और ग्रामीण समुदायों की जल सुरक्षा को प्रभावित किया है।
इनमें क्विलोम्बोला समुदायों और छोटे किसान परिवारों की बड़ी संख्या शामिल है, जो पठार के जलस्रोतों पर निर्भर हैं। क्षेत्र में Aperam BioEnergia जैसी कंपनियां बड़े नीलगिरी वृक्षारोपण का प्रबंधन करती हैं और पिग आयरन उत्पादन के लिए चारकोल उपलब्ध कराती हैं।
कुछ मामलों में इस उत्पादन से जुड़े इस्पात को “ग्रीन स्टील” के रूप में बाजार में पेश किया जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि नीलगिरी वृक्षारोपण कार्बन को अवशोषित करने और औद्योगिक जरूरतें पूरी करने में भूमिका निभा सकता है, लेकिन सेराडो जैसे जल-संवेदनशील क्षेत्रों में इसके दीर्घकालिक जलविज्ञानीय प्रभावों का आकलन जरूरी है।
अध्ययन बेहतर भूजल रिचार्ज निगरानी और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र से परिवर्तित क्षेत्रों में अधिक टिकाऊ भूमि-उपयोग नीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
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