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Environment Pulse > ईको सिस्टम > खनिज > खनिज कानून पर सियासी संग्राम: राज्यों के अधिकार बनाम केंद्र की ‘आर्थिक स्थिरता’
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खनिज कानून पर सियासी संग्राम: राज्यों के अधिकार बनाम केंद्र की ‘आर्थिक स्थिरता’

Environment Pulse
Last updated: August 22, 2026 8:11 pm
Environment Pulse
Published: August 22, 2026
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भारत में खनन क्षेत्र के नए माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 को लेकर केंद्र सरकार और खनिज संपदा वाले राज्यों के बीच राजनीतिक और कानूनी टकराव तेज हो गया है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत में खनन क्षेत्र से जुड़े नए कानून ने केंद्र और राज्यों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और तेज कर दिया है। माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 (MMDR Amendment) को लेकर विपक्षी दलों और खनिज संपदा वाले राज्यों ने इसे राज्यों की वित्तीय और संवैधानिक शक्तियों पर सीधा प्रहार बताया है।

वहीं केंद्र सरकार का तर्क है कि खनिज क्षेत्र में कर व्यवस्था को स्थिर, स्पष्ट और निवेश के अनुकूल बनाना जरूरी है। अगस्त 2026 के मध्य में संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति ने करीब 18 अगस्त को विधेयक को मंजूरी दी।

संशोधन का प्रमुख असर राज्यों की उस शक्ति पर पड़ता है, जिसके तहत वे खनिज अधिकारों और खनिज वाले क्षेत्रों पर कर, उपकर या इसी तरह के शुल्क लगा सकते थे।

हालांकि केंद्र ने स्पष्ट किया है कि राज्यों के लघु खनिजों से जुड़े अधिकारों में बदलाव नहीं किया गया है और संशोधन मुख्य रूप से प्रमुख खनिजों पर केंद्रित है।

केंद्र सरकार का कहना है कि अलग-अलग राज्यों में खनिजों पर ऊंचे या असमान शुल्क से देश में खनिजों की लागत बढ़ती है। इससे भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होती है और कई मामलों में घरेलू खनिजों की तुलना में आयात सस्ता पड़ सकता है।

सरकार के अनुसार, एक अधिक समान और पूर्वानुमान योग्य वित्तीय व्यवस्था से निवेश को बढ़ावा मिलेगा और खनिज आधारित उद्योगों को स्थिरता मिलेगी।

लेकिन राज्यों की आपत्ति केवल राजस्व तक सीमित नहीं है। विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू संघीय ढांचे से जुड़ा है। राज्यों का तर्क है कि 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने Mineral Area Development Authority मामले में राज्यों के खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को मान्यता दी थी।

अदालत ने रॉयल्टी को कर से अलग माना था। आलोचकों के मुताबिक नया कानून संसद के जरिए उस संवैधानिक स्थिति को सीमित करने की कोशिश करता है, खासकर जब संशोधन में ‘मिनरल-बेयरिंग लैंड’ यानी खनिज युक्त भूमि को भी दायरे में लाया गया है।

खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए यह मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि खनन से मिलने वाला राजस्व उनकी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। झारखंड में अपने गैर-कर राजस्व में खनिज क्षेत्र की हिस्सेदारी हालिया आंकड़ों के अनुसार करीब 85 प्रतिशत तक रही है। ओडिशा और अन्य खनिज उत्पादक राज्यों के लिए भी खनन से मिलने वाली आय विकास योजनाओं, सामाजिक कल्याण और स्थानीय बुनियादी ढांचे के लिए महत्वपूर्ण है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संशोधन के कुछ प्रावधानों को राज्य के साथ ‘सौतेला व्यवहार’ बताते हुए इसके सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों पर असर की आशंका जताई है।

ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी इसे राज्यों के वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप बताया है। विवाद अब अदालत तक पहुंचने की तैयारी में है।

कांग्रेस शासित कर्नाटक, केरल और तेलंगाना द्वारा सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त चुनौती की तैयारी किए जाने की खबर है। झारखंड को भी इस कानूनी प्रयास में शामिल करने की कोशिश की जा रही है। केरल और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि केंद्र का कदम राज्य सूची में शामिल अधिकारों को कमजोर करता है और भारत के संघीय ढांचे के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है।

झारखंड में वाम दलों ने भी इसके खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया है। इस राजनीतिक टकराव के बीच एक दूसरा सवाल भी उभर रहा है—खनन के बढ़ते विस्तार का पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर क्या असर होगा? इस संशोधन में पर्यावरणीय मंजूरियों की व्यवस्था को सीधे बदलने का मुख्य प्रावधान नहीं है।

इसलिए फिलहाल बहस का केंद्र वित्तीय और संवैधानिक अधिकार हैं। लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों और आलोचकों का एक वर्ग इसे भारत की व्यापक खनन नीति में बढ़ते केंद्रीकरण और अधिक तेज खनन की प्रवृत्ति से जोड़कर देख रहा है। खनिज संपदा वाले क्षेत्र अक्सर जंगलों, जलस्रोतों और आदिवासी आबादी के महत्वपूर्ण इलाकों में स्थित हैं।

भारत के कई खनन क्षेत्रों में पहले से ही विस्थापन, भूमि क्षरण, जल प्रदूषण, जैव विविधता पर दबाव और आजीविका के नुकसान जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। आलोचकों को आशंका है कि यदि राज्यों के पास स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वित्तीय और नियामकीय हस्तक्षेप के कम साधन रह गए, तो पर्यावरणीय और सामाजिक लागत को नियंत्रित करना और कठिन हो सकता है।

आलोचकों का एक वर्ग यह भी तर्क दे रहा है कि खनिज नीति में लगातार किए जा रहे सुधारों का जोर उत्पादन बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने पर अधिक है।

ऐसे में स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पर्यावरणीय सुरक्षा और पारिस्थितिक नुकसान की भरपाई जैसे मुद्दों को पर्याप्त महत्व देना चुनौती बन सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार इस दृष्टिकोण को खारिज करती है।

उसका कहना है कि संशोधन का उद्देश्य राज्यों के राजस्व को खत्म करना नहीं, बल्कि खनिज क्षेत्र में ऐसी कर व्यवस्था बनाना है जो उद्योगों और निवेशकों के लिए स्थिर और अनुमान योग्य हो। सरकार का दावा है कि राज्यों को कुल मिलाकर वित्तीय नुकसान नहीं होगा और असंगत कर व्यवस्था से पैदा होने वाली अनिश्चितता को कम करना जरूरी है। यही कारण है कि MMDR Amendment 2026 अब केवल खनन क्षेत्र का आर्थिक सुधार नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है कि प्राकृतिक संसाधनों पर कर लगाने का अधिकार किसके पास हो, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता की सीमा क्या हो और केंद्र-राज्य संबंधों में संवैधानिक संतुलन कैसे कायम रखा जाए।

आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट में संभावित चुनौती इस विवाद की दिशा तय कर सकती है। अदालत के सामने कराधान की शक्तियों, राज्य सूची, संसद की विधायी क्षमता और 2024 के संविधान पीठ के फैसले के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण प्रश्न होगा। इस कानूनी लड़ाई का परिणाम केवल खनन कंपनियों या राज्यों के राजस्व तक सीमित नहीं रहेगा। यह भारत में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, निवेश नीति, पर्यावरणीय जवाबदेही और केंद्र-राज्य संबंधों के भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।

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