लखनऊ और बाढ़ का संबंध कोई नया नहीं है, बल्कि इसका इतिहास सौ साल से भी अधिक पुराना है। नवाब वाजिद अली शाह के दौर में 1855 से गोमती के उफान का जिक्र मिलता है, और ब्रिटिश काल (1903, 1923, 1936) तथा स्वतंत्र भारत में 1960 की भीषण बाढ़ ने शहर को संकट में डाला था। 1960 के दशक के बाद गऊ घाट से पिपराघाट तक बने तटबंधों ने पुराने शहर को तो बचा लिया, लेकिन अनियोजित शहरीकरण, फ्लड प्लेन पर बसाई गई कॉलोनियों (जैसे फैजुल्लागंज) और 2015-16 में बने गोमती रिवरफ्रंट की ऊंची दीवारों ने नदी के प्राकृतिक बहाव और चौड़ाई को सीमित कर दिया। नतीजतन, जलवायु परिवर्तन के कारण कम दिनों में होने वाली भारी बारिश और गोमती के जलस्तर में वृद्धि का पूरा दबाव फैजुल्लागंज और गोमती नगर विस्तार जैसे इलाकों पर पड़ने लगा। इस ऐतिहासिक समस्या का स्थायी समाधान यही है कि गोमती के फ्लड प्लेन जोन (2000 मीटर के दायरे) में नए निर्माण पर रोक लगाने के लिए कड़े कानून बनाए जाएं, पुराने नालों और अतिक्रमणों को हटाया जाए तथा शहर के भीतर जलभराव से निपटने के लिए पुराने तालाबों और वेटलैंड्स को पुनर्जीवित किया जाए।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : लखनऊ को अक्सर कहा जाता है कि ये गोमती के किनारे बसा एक तहज़ीब का शहर है। लेकिन यही गोमती जब गुस्से में आती है, तो इसी तहज़ीब को डुबो भी देती है। 2026 में जो हो रहा है – फैजुल्लागंज, डालीगंज, मनकामेश्वर, गोमती नगर विस्तार में 4 से 5 फीट पानी – ये पहली बार नहीं है। लखनऊ का बाढ़ से नाता 100 साल से भी पुराना है।
- नवाबों के ज़माने से शुरू हुई कहानी
इतिहास के पन्ने पलटें तो 1855 में पहली बार गोमती के बड़े उफान का ज़िक्र मिलता है। तब लखनऊ नवाब वाजिद अली शाह के दौर में था। उस समय गोमती के दोनों किनारों पर घने जंगल और बाग थे, इसलिए पानी फैल जाता था और शहर बच जाता था।
अंग्रेजों ने 1860 में पहला गेज लगाया गोमती पर। उनके रिकॉर्ड बताते हैं कि 1903, 1923 और 1936 में गोमती ने खतरे के निशान को पार किया था। तब पानी हुसैनाबाद और चौक तक आ गया था। बड़ा इमामबाड़ा के पास नावें चली थीं, ऐसा पुराने लोग आज भी बताते हैं।
- 1960 – जब लखनऊ ने पहली आधुनिक बाढ़ देखी
आजाद भारत में लखनऊ की सबसे बड़ी बाढ़ 1960 में आई थी। तब लगातार 10 दिन तक बारिश हुई थी। गोमती का जलस्तर 113 मीटर तक पहुंच गया था, जबकि खतरे का निशान 105 मीटर है।
उस समय फैजुल्लागंज नाम की कोई जगह ही नहीं थी। वो पूरा इलाका गोमती का खादर था, जहां खेती होती थी। पानी वहीं फैलता था, इसलिए पुराना लखनऊ – अमीनाबाद, हजरतगंज बच गया।
1960 के बाद सरकार ने तय किया कि गोमती के किनारे तटबंध बनाए जाएं। गऊ घाट से लेकर पिपराघाट तक बंधे बने। इन बंधों ने पुराने शहर को तो बचा लिया, लेकिन पानी का दबाव दूसरी तरफ डाल दिया।
- 1971, 1980 और 2007 – तीन बड़े झटके
1971 में फिर गोमती उफनी। इस बार नया बना इंदिरा नगर डूबा। 1980 में हालात और बिगड़े, जब पहली बार गोमती नगर का नया इलाका पानी में आया।
लेकिन लखनऊ वालों को जो बाढ़ सबसे ज्यादा याद है, वो है 2007-08 की बाढ़।
2007 में गोमती 112 मीटर तक आ गई थी। डालीगंज पुल के नीचे पानी खतरे के निशान से 3 फीट ऊपर था। मनकामेश्वर मंदिर पूरी तरह डूब गया था, शिवलिंग तक पानी आ गया था। उस साल फैजुल्लागंज में पहली बार कॉलोनियां कटी थीं – कृष्णा लोक, मिलन नगर। वो पहली बार डूबीं और तब से हर 2-3 साल में डूब रही हैं।
2007 के बाद ही रिवरफ्रंट का प्रोजेक्ट बना। सोचा गया कि नदी को चैनलाइज करेंगे तो बाढ़ रुकेगी। लेकिन हुआ उल्टा।
- रिवरफ्रंट बना या बाढ़ का कारण?
2015-16 में अखिलेश यादव सरकार ने गोमती रिवरफ्रंट बनाया। सुंदर पार्क, लाइटें, डायफ्राम वॉल।
पर्यावरणविदों ने तभी चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि आपने नदी की चौड़ाई 250 मीटर से घटाकर 100 मीटर कर दी है। नदी को फैलने की जगह नहीं दी। जब पानी आएगा तो वो कहां जाएगा?
2026 में वही हुआ। रिवरफ्रंट की ऊंची दीवारों ने पानी को गोमती नगर की तरफ रोक दिया, तो सारा दबाव फैजुल्लागंज, मटियारी, बीकेटी की तरफ शिफ्ट हो गया। जो पानी पहले 2 किलोमीटर में फैलता था, अब वो एक संकरी नहर में फंस गया।
- फैजुल्लागंज – बाढ़ का नया एपिसेंटर क्यों बना?
फैजुल्लागंज की कहानी लखनऊ की अनप्लान्ड ग्रोथ की कहानी है।
2000 तक ये ग्राम सभा था। गोमती का फ्लड प्लेन। 2005 के बाद जमीन सस्ती मिली, कॉलोनाइजरों ने खेतों को प्लॉट में काट दिया। न कोई मैप, न कोई ड्रेनेज प्लान। नाले के नाम पर सिर्फ कागज पर लाइनें।
आज फैजुल्लागंज में 40,000 से ज्यादा परिवार रहते हैं, करीब 3 लाख लोग। सब उसी जमीन पर जो नदी की है।
जब 15 दिन में 25% साल भर की बारिश हुई, तो गोमती का पानी वहीं लौटा जहां वो 50 साल पहले बहती थी – लोगों के घरों में।
- 2026 की बाढ़ क्या सिखा रही है?
इस बार की बाढ़ ने तीन सच्चाइयां सामने ला दी हैं।
पहली, लखनऊ का ड्रेनेज सिस्टम 1960 के हिसाब से बना है, जबकि आबादी 10 गुना बढ़ गई है। शहर के 13 बड़े नाले, जिनमें से 8 पूरी तरह बंद हैं।
दूसरी, हमने वेटलैंड खत्म कर दिए। कुर्सी रोड पर जो तालाब थे, जहां बाढ़ का पानी जमा होता था, वहां अब मकान हैं।
तीसरी, क्लाइमेट चेंज। अब बारिश 90 दिन में नहीं, 15 दिन में होगी। इसका मतलब है कि बाढ़ ज्यादा अचानक और ज्यादा खतरनाक होगी।
आगे का रास्ता क्या है?
योगी सरकार ने अब फैजुल्लागंज से नैमिष तक 35 किलोमीटर लंबे तटबंध का सर्वे करने को कहा है। ये जरूरी है, लेकिन सिर्फ तटबंध से काम नहीं चलेगा।
लखनऊ को तीन काम करने होंगे। पहला, गोमती के 200 मीटर के दायरे में कोई नया निर्माण न हो, इसे कानून बनाना होगा। दूसरा, पुराने नालों को जिंदा करना होगा, उनसे अतिक्रमण हटाना होगा। तीसरा, शहर के अंदर 50 से ज्यादा छोटे तालाबों को फिर से खोदना होगा ताकि बाढ़ का पानी वहां जमा हो सके।
लखनऊ का इतिहास कहता है कि गोमती ने हमेशा शहर को जीवन दिया है, पानी दिया है, तहज़ीब दी है। लेकिन जब हमने उसकी जगह छीनी, तो उसने अपना रास्ता याद दिला दिया।
2026 की बाढ़ एक चेतावनी है कि अगर अभी भी नहीं सुधरे, तो अगली बार पानी फैजुल्लागंज तक नहीं, हजरतगंज तक आएगा।
Also Read: EXPLAINER: लखनऊ क्यों डूबा? गोमती के उफान के पीछे का पूरा सच

