सैटेलाइट ट्रैकिंग से ओलिव रिडले समुद्री कछुओं के महत्वपूर्ण प्रवासी मार्गों का खुलासा हुआ है, जिससे ओडिशा के घोंसला बनाने वाले स्थलों और श्रीलंका के भोजन क्षेत्रों के बीच की कड़ी का पता चला है। ये कछुए अंडे देने के बाद बंगाल की खाड़ी में हजारों किलोमीटर की लंबी यात्रा तय करते हैं। इस डेटा से इन संवेदनशील कछुओं के संरक्षण, मछली पकड़ने के खतरों से बचाव और प्रभावी रणनीतियां बनाने में मदद मिलेगी।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: ओलिव रिडले समुद्री कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग से उनके समुद्री प्रवास मार्गों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। इससे बंगाल की खाड़ी और उससे जुड़े समुद्री क्षेत्रों में इस संवेदनशील प्रजाति के संरक्षण को और मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित हुई है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान और ओडिशा के वन विभागों की टीमों ने गहिरमाथा और रुशिकुल्या जैसे प्रमुख nesting sites पर मादा ओलिव रिडले कछुओं में सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाए। टैग से मिले आंकड़ों के अनुसार, ये कछुए अंडे देने के बाद खुले समुद्र में हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं करते हैं। ट्रैकिंग से श्रीलंका के आसपास के भोजन क्षेत्रों और ओडिशा के nesting grounds के बीच एक महत्वपूर्ण प्रवासी गलियारे की पुष्टि हुई है।
कुछ कछुए तमिलनाडु और पुडुचेरी के समुद्री क्षेत्रों से गुजरते हुए 1,000 किलोमीटर से अधिक दूरी दो महीने से भी कम समय में तय करते पाए गए, जबकि कुछ की यात्राएं 3,500 किलोमीटर से अधिक रहीं। अध्ययनों में यह भी सामने आया कि कुछ कछुए महाद्वीपीय शेल्फ के पास रहते हैं, जबकि अन्य गहरे समुद्री क्षेत्रों में जाकर समुद्री धाराओं के अनुरूप अलग-अलग मार्ग अपनाते हैं।
बंगाल की खाड़ी में इन कछुओं की औसत दैनिक यात्रा करीब 30 किलोमीटर और तैरने की गति लगभग 2.5 किलोमीटर प्रति घंटा दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये निष्कर्ष पूरी बंगाल की खाड़ी को ओलिव रिडले संरक्षण के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में देखने की जरूरत बताते हैं।
सैटेलाइट डेटा भोजन क्षेत्रों, प्रजनन स्थलों और मछली पकड़ने से जुड़े संभावित खतरों की पहचान में मदद कर रहा है। संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि निरंतर सैटेलाइट टैगिंग से इन समुद्री मार्गों की बेहतर समझ विकसित होगी और ओलिव रिडले आबादी को पर्यावरणीय दबावों से बचाने के लिए प्रभावी संरक्षण रणनीतियां तैयार करने में मदद मिलेगी।
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