लगभग 30 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद गंगा नदी के ऊपरी हिस्से (उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले) में हिल्सा (Hilsa) मछली दोबारा देखी गई है, जो नदी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में सुधार का एक बड़ा और सकारात्मक संकेत है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। करीब तीस साल बाद गंगा नदी के ऊपरी हिस्से में हिल्सा मछली दोबारा देखी गई है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में टांडा खुर्द के पास इसका मिलना नदी विशेषज्ञों के लिए एक उत्साहजनक संकेत माना जा रहा है, क्योंकि हिल्सा एक ऐसी प्रवासी मछली है जो समुद्र से निकलकर प्रजनन के लिए नदियों में लंबी दूरी तय करती है।
यह वापसी अहम क्यों है हिल्सा जैसी मछली के लिए इतनी लंबी यात्रा करना आसान नहीं होता। इसके लिए नदी में पानी की पर्याप्त मात्रा, घुली हुई ऑक्सीजन का सही स्तर, अनुकूल तापमान और रास्ते में कम से कम रुकावटें होना जरूरी है।
इसलिए चंदौली जैसी दूर की जगह तक हिल्सा का पहुंचना बताता है कि गंगा के इस हिस्से का पर्यावरण पहले की तुलना में काफी बेहतर हुआ है। विदेशी मीडिया में भी इसे गंगा के संरक्षण प्रयासों की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया गया है।
हिल्सा आमतौर पर बंगाल की खाड़ी से गंगा में दाखिल होकर प्रजनन के लिए ऊपर की ओर बढ़ती है। लेकिन 1975 में फरक्का बैराज बनने के बाद इसके इस प्राकृतिक रास्ते में बड़ी रुकावट आ गई थी। बैराज के ऊपर वाले हिस्सों में इसकी मौजूदगी लगभग खत्म ही हो गई थी।
रास्ते में आई इस बाधा के अलावा बढ़ता प्रदूषण, घटता जलप्रवाह और जरूरत से ज्यादा मछली पकड़े जाने ने भी इसकी आबादी को नुकसान पहुंचाया। ऐसे में दशकों बाद इसका इतनी दूर तक फिर से पहुंचना सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि गंगा के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे धीमे लेकिन सकारात्मक बदलाव का प्रमाण माना जा रहा है।
डॉल्फिन की संख्या में भी इजाफा गंगा में सुधार का एक और संकेत डॉल्फिन की बढ़ती तादाद है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक गंगा में डॉल्फिन की संख्या अब 6,327 तक पहुंच गई है। इसके साथ ही नदी के उन हिस्सों में भी कमी आई है जिन्हें पहले सर्वाधिक प्रदूषित माना जाता था।
नदी की सेहत सिर्फ प्रदूषण से नहीं आंकी जाती विशेषज्ञों का कहना है कि किसी नदी का स्वास्थ्य केवल पानी में मौजूद प्रदूषण की मात्रा नापकर तय नहीं किया जा सकता। वहां रहने वाली मछलियों और दूसरे जलीय जीवों की विविधता, और उनका सामान्य ढंग से चलने वाला जीवन-चक्र भी उतना ही महत्वपूर्ण संकेतक है।
हिल्सा जैसी प्रवासी प्रजाति का बिना किसी बड़ी बाधा के लंबी दूरी तय कर पाना इस बात का सबूत है कि नदी के भीतर हालात अब उसके अनुकूल बनने लगे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह वापसी उम्मीद जगाती है — अगर संरक्षण के प्रयास और नदी प्रबंधन इसी तरह जारी रहे, तो हिल्सा जैसी अन्य प्रवासी जलीय प्रजातियों के लिए भी गंगा में स्थितियां आगे और सुधर सकती हैं।
Also Read: भोपाल का बड़ा तालाब: गहराई घटी, गाद बढ़ी

