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Environment Pulse > ईको सिस्टम > जल > पहाड़ों में जलवायु परिवर्तन बदल रहा बीमारियों का नक्शा
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जलहवा

पहाड़ों में जलवायु परिवर्तन बदल रहा बीमारियों का नक्शा

Environment Pulse
Last updated: August 19, 2026 8:39 pm
Environment Pulse
Published: August 19, 2026
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बढ़ते तापमान और गर्म होती सर्दियों के कारण डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां अब मैदानों से निकलकर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल व उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में तेजी से फैल रही हैं।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। पहाड़ों में जलवायु परिवर्तन बदल रहा बीमारियों का नक्शा जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान और मौसम के बदलाव तक सीमित नहीं है। भारत के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में इसका असर बीमारियों के फैलाव के बदलते पैटर्न के रूप में भी सामने आ रहा है। बढ़ती गर्मी, बदलते बारिश के चक्र और गर्म होती सर्दियां मच्छरजनित बीमारियों के लिए ऐसे हालात पैदा कर रही हैं, जहां कभी उनका प्रसार सीमित था।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा क्षेत्र की आदिवासी महिला मनवती नाग का अनुभव इस बदलाव की गंभीरता को दर्शाता है। 1994 में बिजापुर से दंतेवाड़ा के जंगलों वाले इलाके में विवाह के बाद पहुंचने तक वह लगभग कभी बीमार नहीं पड़ती थीं। लेकिन वहां आने के बाद उन्हें हर एक-दो साल में मलेरिया होने लगा। वर्ष 2022 के बाद स्थिति और बिगड़ गई और उन्हें लगभग हर तीन महीने में मलेरिया होने लगा—चाहे गर्मी हो, मानसून या सर्दी। यह बदलाव देश के कई पहाड़ी और वन क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। वर्ष 2024 भारत के सबसे चरम मौसम वाले वर्षों में शामिल रहा, जब रिकॉर्ड गर्मी, बाढ़, तूफान और असामान्य रूप से लंबे गर्म दौर देखे गए।

इन घटनाओं में 3,200 से अधिक लोगों की मौत हुई, लाखों हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई और हजारों घर नष्ट हुए। गर्मी का असर अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। अनुमान के मुताबिक 2021 में अत्यधिक गर्मी के कारण भारत को करीब 160 अरब श्रम घंटे गंवाने पड़े, जो देश की जीडीपी के लगभग 5.4 प्रतिशत के बराबर था। श्रीनगर समेत कश्मीर घाटी में तापमान बढ़ रहा है और सर्दियों की अवधि घट रही है। कभी लंबे समय तक बर्फबारी और शून्य से नीचे तापमान के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है।

श्रीनगर की 21 वर्षीय अनीका ने बताया कि हाल की गर्मी ने उन्हें हैरान कर दिया। उन्होंने कहा कि पहली बार सोने के लिए उन्हें एसी और पंखा दोनों चलाने पड़े। उनके अनुसार कुछ वर्ष पहले नवंबर से अप्रैल तक सर्दी और बर्फबारी का दौर रहता था, जबकि अब बर्फबारी मुख्य रूप से फरवरी और मार्च तक सीमित होती दिखाई दे रही है। इस बदलाव की पुष्टि मौसम संबंधी आंकड़े भी करते हैं। इस वर्ष की शुरुआत में कश्मीर में फरवरी का तापमान सामान्य से करीब 10 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया और कुछ इलाकों में 21 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। लगातार दूसरे वर्ष क्षेत्र में सर्दियों के दौरान वर्षा में लगभग 50 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

2024 में श्रीनगर का अधिकतम तापमान 35.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था, जो सामान्य से करीब छह डिग्री अधिक और लगभग 25 वर्षों में जुलाई का सबसे अधिक तापमान था। हिमाचल प्रदेश में भी 2024 के अप्रैल से जून के बीच 28 हीटवेव दिवस दर्ज किए गए और इसी अवधि में करीब 2,700 जंगलों में आग की घटनाएं हुईं। तापमान बढ़ने के साथ मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसे मच्छरजनित रोगों में भी वृद्धि देखी जा रही है। ये बीमारियां पारंपरिक रूप से भारत के गर्म उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, मैदानी इलाकों तथा घनी आबादी वाले शहरों में अधिक केंद्रित रही हैं। लेकिन अब इनका भौगोलिक दायरा बदल रहा है। भारत ने मलेरिया के संक्रमण और इससे होने वाली मौतों को कम करने में प्रगति की है, लेकिन पिछले दो दशकों में देश में इस बीमारी से 10,000 से अधिक लोगों की मौत हुई है।

इससे पता चलता है कि जलवायु-संवेदनशील बीमारियां अभी भी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई हैं। जम्मू-कश्मीर में 2025 के दौरान डेंगू के 3,381 मामले दर्ज हुए, जबकि 2021 में यह संख्या 1,709 थी। चिकनगुनिया के संदिग्ध मामलों में भी तेज वृद्धि हुई। जम्मू-कश्मीर में 2021 के सात मामलों के मुकाबले 2025 में 773 संदिग्ध मामले दर्ज किए गए। हिमाचल प्रदेश में जहां 2021 में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ था, वहीं 2025 में 200 से अधिक मामले सामने आए। मेघालय और उत्तराखंड में भी मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक दिन और रात के तापमान के बीच का अंतर कम होना मच्छरों और अन्य रोग फैलाने वाले वाहकों के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियां बना रहा है। पहले पहाड़ी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान पड़ने वाला पाला मलेरिया और चिकनगुनिया के प्रसार को सीमित करता था।

अब गर्म होती सर्दियां, बढ़ती नमी और बदलते वनस्पति पैटर्न इन बीमारियों को उन इलाकों में भी टिकने और फैलने का अवसर दे रहे हैं, जहां वे पहले अपेक्षाकृत दुर्लभ थीं। जलवायु परिवर्तन भारत में मच्छरजनित बीमारियों के पारंपरिक मौसमी चक्र को भी प्रभावित कर रहा है। पहले इन बीमारियों का प्रकोप मुख्य रूप से बारिश के मौसम से जुड़ा होता था, लेकिन अब असामान्य समय पर बारिश, अलग-अलग मौसमों में बढ़ता तापमान और लंबे गर्म दौर इनके फैलाव के समय और भौगोलिक दायरे को बदल रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक जलवायु संबंधी आंकड़ों का बीमारी की निगरानी प्रणाली के साथ पर्याप्त रूप से जुड़ा न होना है।

पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में प्रकोप का पता अक्सर देर से चलता है। जब तक आधिकारिक तौर पर मामले सामने आते हैं और प्रतिक्रिया तंत्र सक्रिय होता है, तब तक बीमारी अधिक दूर तक फैल चुकी होती है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत की मौजूदा बीमारी निगरानी व्यवस्था काफी हद तक प्रतिक्रिया आधारित है। जरूरत इस बात की है कि सैटेलाइट से प्राप्त बारिश के आंकड़ों, तापमान के रुझानों और पर्यावरणीय संकेतकों को स्वास्थ्य निगरानी के साथ जोड़ा जाए, ताकि बीमारी के संभावित हॉटस्पॉट और प्रकोप का पहले से अनुमान लगाया जा सके।

इसके लिए जलवायु एजेंसियों, स्वास्थ्य विभागों और आपदा प्रबंधन संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय की कमी जलवायु और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से निपटने में बड़ी बाधा बनी हुई है। जलवायु से जुड़े बीमारी के खतरे के साथ कश्मीर में वायु प्रदूषण भी एक नई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन रहा है। श्रीनगर में वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ वायु गुणवत्ता पर दबाव बढ़ा है। कोविड-19 के बाद कश्मीर में पर्यटन बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला, लेकिन इसके साथ वाहनों की संख्या में भी तेजी आई। कई परिवारों ने पर्यटन से रोजगार पाने के लिए टैक्सी खरीदी, जिससे घाटी में वाहनों का दबाव और बढ़ गया। हालिया आकलनों में श्रीनगर में वायु प्रदूषण के गंभीर स्तर की बात सामने आई है।

2026 को अब तक 2019 के बाद शहर का सबसे प्रदूषित वर्ष बताया गया है, जहां औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स 159 रहा। लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। कश्मीर में जलवायु परिवर्तन, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, वायु प्रदूषण और बदलते रोग पैटर्न अब एक-दूसरे से जुड़ी हुई चुनौतियां बनते जा रहे हैं। हिमालयी क्षेत्रों में यह बदलाव आने वाले वर्षों में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए और गंभीर संकट का रूप ले सकता है।

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