केरल के पेरियार टाइगर रिजर्व (PTR) में हुए चार दिवसीय जीव-जंतु सर्वेक्षण में छह नई प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें गोल्डन-हेडेड सिस्टिकोला (पक्षी), कॉमन ऑनिक्स (तितली), और चार ड्रैगनफ्लाई-डैमसेलफ्ाइलियां (पैराकीट डार्नर, फ्रेजर क्लबटेल, स्पाइनी हॉर्नटेल, नीलगिरी क्लॉ-टेल) शामिल हैं। इसके साथ ही PTR में कुल पक्षियों की प्रजातियां 347 और ओडोनेट प्रजातियां 111 हो गई हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: केरल के पश्चिमी घाट में हालिया जैव विविधता सर्वेक्षणों ने क्षेत्र की समृद्ध प्राकृतिक विरासत को रेखांकित किया है। पेरियार टाइगर रिजर्व (PTR) में हुए चार दिवसीय जीव-जंतु सर्वेक्षण के दौरान छह ऐसी प्रजातियां दर्ज की गईं, जो इससे पहले रिजर्व की सूची में शामिल नहीं थीं।
वहीं, अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व (ABR) की व्यापक वनस्पति सूची में 3,261 पुष्पीय पौधों की प्रजातियां दर्ज की गई हैं।
10 से 13 सितंबर 2026 तक थेक्कडी में आयोजित सर्वेक्षण में एक पक्षी, एक तितली और चार ड्रैगनफ्लाई-डैमसेलफ्लाई प्रजातियां पहली बार दर्ज हुईं। इनमें गोल्डन-हेडेड सिस्टिकोला, कॉमन ऑनिक्स, पैराकीट डार्नर, फ्रेजर क्लबटेल, स्पाइनी हॉर्नटेल और नीलगिरी क्लॉ-टेल शामिल हैं।
सर्वेक्षण में 174 पक्षी प्रजातियां दर्ज हुईं, जिससे PTR की कुल पक्षी सूची 347 हो गई। ओडोनेट की 68 प्रजातियों के रिकॉर्ड के साथ इनकी संचयी संख्या 111 पहुंच गई। लगभग 75 प्रतिभागियों और 21 गैर-सरकारी, शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों की भागीदारी वाले सर्वेक्षण में 15 स्तनधारी, 30 मकड़ी, 34 चींटी और पांच सिकाडा प्रजातियां भी दर्ज की गईं। इसी बीच, जवाहरलाल नेहरू ट्रॉपिकल बॉटनिक गार्डन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (JNTBGRI) के शोधकर्ताओं ने अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व की पुष्पीय वनस्पतियों की विस्तृत सूची तैयार की है।
Plant Science Today में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार यहां 1,139 वंश और 190 कुलों से संबंधित 3,261 प्रजातियां, 26 उप-प्रजातियां और 28 किस्में दर्ज हैं। फैबेसी 349 टैक्सा के साथ सबसे समृद्ध कुल रहा।
इसके बाद रुबिएसी के 194, पोएसी के 193 और ऑर्किडेसी के 168 टैक्सा दर्ज किए गए। अध्ययन में 1,018 टैक्सा को भारत के लिए स्थानिक पाया गया, जिनमें 245 अत्यंत सीमित क्षेत्रों में पाई जाने वाली स्टेनो-एंडेमिक प्रजातियां हैं। केरल और तमिलनाडु में फैले लगभग 3,500 वर्ग किलोमीटर के इस बायोस्फीयर रिजर्व में उष्णकटिबंधीय वन, शोला वन और घासभूमियां शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार नए रिकॉर्ड पश्चिमी घाट की जैव विविधता के संरक्षण के लिए निरंतर सर्वेक्षण और क्षेत्र-विशिष्ट संरक्षण रणनीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
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