संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई ‘Limiting Overshoot’ रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा नीतियों के तहत वैश्विक तापमान वृद्धि का 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करना अब लगभग तय है। इस स्थिति से निपटने के लिए जलवायु नीति का फोकस अब ‘ओवरशूट, पीक और डिक्लाइन’ रणनीति पर केंद्रित हो गया है, जिसके तहत तापमान को एक निश्चित शिखर तक पहुँचने के बाद कार्बन हटाने की तकनीकों और भारी उत्सर्जन कटौती के जरिए धीरे-धीरे वापस 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाने का प्रयास किया जाएगा। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तापमान का चरम स्तर जितना अधिक होगा, जलवायु जोखिम, पारिस्थितिकी तंत्र का नुकसान और ‘टिपिंग पॉइंट्स’ के पार जाने की आशंका उतनी ही अधिक होगी। हालांकि यह प्रक्रिया बेहद चुनौतीपूर्ण है, लेकिन UNEP ने इसे जलवायु कार्रवाई से पीछे हटने के बजाय अधिक महत्वाकांक्षी कदम उठाने और ग्रीनहाउस गैसों में तेजी से कटौती करने का संकेत बताया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई ‘Limiting Overshoot’ रिपोर्ट ने वैश्विक जलवायु संकट को लेकर एक महत्वपूर्ण वास्तविकता सामने रखी है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा और निकट भविष्य की नीतियों तथा उत्सर्जन की प्रवृत्तियों को देखते हुए वैश्विक तापमान वृद्धि का 1.5 डिग्री सेल्सियस स्तर को पार करना अब लगभग अपरिहार्य माना जा रहा है।
इसके साथ ही जलवायु नीति का फोकस केवल इस सीमा के नीचे बने रहने से आगे बढ़कर तापमान वृद्धि को सीमित करने, उसके चरम स्तर को कम रखने और बाद में उसे फिर 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाने की रणनीति पर केंद्रित हो रहा है। 2 सितंबर 2026 को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि पेरिस समझौते का 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य अब भी बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन मौजूदा नीतियों और निकट अवधि के संभावित रास्तों के तहत इसके पार जाने की संभावना व्यापक रूप से स्वीकार की जा रही है।
यदि देश अपने राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों और दीर्घकालिक नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह लागू भी करते हैं, तो वैश्विक तापमान वृद्धि का चरम लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है। विभिन्न अनुमानों में यह सीमा 1.7 से 2.2 डिग्री सेल्सियस के बीच हो सकती है।
वहीं, मौजूदा नीतियों के आधार पर 2100 तक तापमान वृद्धि का औसत अनुमान करीब 2.6 डिग्री सेल्सियस है। UNEP के अनुसार, ओवरशूट किसी एक समय पर तापमान सीमा पार करने की घटना नहीं है, बल्कि कई दशकों तक चलने वाली प्रक्रिया है। इसमें तापमान पहले 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है, एक उच्चतम स्तर पर पहुंचता है और इसके बाद उत्सर्जन में भारी कटौती तथा कार्बन डाइऑक्साइड हटाने के उपायों के जरिए धीरे-धीरे नीचे लाने का प्रयास किया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, ‘ओवरशूट, पीक और डिक्लाइन’ रणनीति मौजूदा परिस्थितियों में तापमान वृद्धि की अवधि और अधिकतम स्तर को सीमित करने तथा सदी के अंत तक वैश्विक तापमान को फिर 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाने की दिशा में सबसे बेहतर उपलब्ध विकल्प है।
UNEP ने चेताया है कि तापमान का चरम स्तर जितना अधिक होगा और 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहने की अवधि जितनी लंबी होगी, जलवायु संबंधी जोखिम उतने ही गंभीर होंगे। अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और अन्य चरम मौसम घटनाओं के अलावा पारिस्थितिकी तंत्र के नुकसान, खाद्य एवं जल सुरक्षा पर खतरे और महत्वपूर्ण जलवायु ‘टिपिंग पॉइंट्स’ के पार जाने की आशंका बढ़ सकती है। इनमें बर्फ की चादरों का अस्थिर होना, अमेजन क्षेत्र का गंभीर क्षरण और प्रमुख समुद्री धाराओं में बदलाव जैसी घटनाएं शामिल हैं।
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि तापमान वृद्धि की हर छोटी मात्रा और ओवरशूट का हर अतिरिक्त वर्ष मायने रखता है। तापमान का चरम स्तर जितना कम और ओवरशूट की अवधि जितनी छोटी होगी, इंसानों, अर्थव्यवस्थाओं और प्रकृति पर होने वाले नुकसान का जोखिम उतना ही कम किया जा सकेगा। UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस स्थिति को जलवायु कार्रवाई से पीछे हटने का कारण मानने के बजाय अधिक महत्वाकांक्षी प्रयासों का संकेत बताया है।
गुटेरेस ने हालिया भीषण गर्मी, जंगलों की आग और बाढ़ जैसी घटनाओं को चेतावनी बताते हुए तापमान वृद्धि को यथासंभव कम और कम अवधि तक सीमित रखने के लिए जलवायु महत्वाकांक्षा बढ़ाने का आह्वान किया है। रिपोर्ट में तेजी से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने, विशेष रूप से मीथेन उत्सर्जन में कटौती, कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीकों को विकसित करने और जलवायु अनुकूलन उपायों में तेजी लाने पर जोर दिया गया है।
हालांकि, कार्बन हटाने की तकनीकों को उत्सर्जन में वास्तविक और गहरी कटौती के विकल्प के रूप में नहीं देखा गया है। साथ ही जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और क्षति से निपटने के लिए कमजोर समुदायों और देशों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई गई है। वैश्विक तापमान को दोबारा 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाना संभव है, लेकिन यह बेहद चुनौतीपूर्ण है और इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसके लिए नेट-जीरो के बाद नकारात्मक उत्सर्जन हासिल करना होगा तथा कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीकों का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करना होगा। इन तकनीकों से जुड़े पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक जोखिमों को भी ध्यान में रखना होगा।
UNEP के अनुसार, तापमान को सफलतापूर्वक 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाने के बाद भी कई क्षेत्रों में स्थायी नुकसान और बदली हुई जलवायु परिस्थितियां बनी रह सकती हैं। ऐसे में जलवायु न्याय, समानता और प्रभावी वैश्विक शासन भी महत्वपूर्ण मुद्दे बने रहेंगे। रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य को अब शायद ‘ऊपर से’ हासिल करने की दिशा में काम करना होगा। आज लिए जाने वाले फैसले यह तय करेंगे कि तापमान वृद्धि का चरम कितना ऊंचा होगा और दुनिया कितने समय तक 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहेगी। इसलिए ओवरशूट को निष्क्रियता का बहाना नहीं, बल्कि हर संभव अंश की तापमान वृद्धि को रोकने के लिए तत्काल और तेज जलवायु कार्रवाई का संकेत माना जाना चाहिए।
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