देहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान में हाल ही में आयोजित चौथे वार्षिक जैव विविधता एवं बटरफ्लाई ट्रेल सर्वेक्षण के दौरान तितलियों की 165 प्रजातियों (कुल 260 से अधिक) की पहचान की गई है, जिनमें 37 संकटग्रस्त प्रजातियां भी शामिल हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। असम के देहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान में हाल ही में किए गए जैव विविधता सर्वेक्षण में तितलियों की 165 प्रजातियों की पहचान की गई है। इनमें 37 संकटग्रस्त प्रजातियां शामिल हैं। सर्वेक्षण के नतीजे इस वर्षावन क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए इसके महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास होने को रेखांकित करते हैं। ये निष्कर्ष 28 से 31 जुलाई 2026 के बीच आयोजित चौथे वार्षिक देहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान जैव विविधता एवं बटरफ्लाई ट्रेल के दौरान सामने आए।
चार दिवसीय कार्यक्रम के तहत असम के जयपुर, लखीपाथर और साराइपुंग रेंज सहित कई वर्षावन क्षेत्रों में सर्वेक्षण किया गया। इसके अलावा पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश के तिरप जिले में स्थित देओमाली रेंज को भी सर्वेक्षण में शामिल किया गया। अलग-अलग स्थानों पर किए गए सर्वेक्षण में जयपुर क्षेत्र में 60 से अधिक तितली प्रजातियां दर्ज की गईं, जबकि देओमाली में करीब 57 प्रजातियों की पहचान हुई।
देओमाली में दर्ज प्रजातियों में छह संकटग्रस्त प्रजातियां शामिल थीं। लखीपाथर रेंज के अंतर्गत सिरिंग मामोरोनी में करीब 68 और साराइपुंग क्षेत्र में लगभग 78 प्रजातियां दर्ज की गईं। पूरे बटरफ्लाई ट्रेल के दौरान दर्ज तितली प्रजातियों की कुल संख्या 260 से अधिक रही। इस सर्वेक्षण में पर्यावरणविदों, तितली संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।
गुवाहाटी विश्वविद्यालय, डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय और तिंगखोंग कॉलेज के छात्र भी इस जैव विविधता अध्ययन का हिस्सा रहे। प्रतिभागियों ने विभिन्न वन क्षेत्रों में तितलियों की मौजूदगी, प्रजातियों की विविधता और उनके प्राकृतिक आवासों का दस्तावेजीकरण किया। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर सर्वेक्षण के निष्कर्षों को साझा करते हुए कहा कि 165 तितली प्रजातियों की मौजूदगी, जिनमें 37 संकटग्रस्त प्रजातियां हैं, देहिंग पटकाई के स्वस्थ और समृद्ध प्राकृतिक आवास को दर्शाती है।
उन्होंने इसे दुर्लभ और संवेदनशील वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्ल बरुआ ने भी इस परिदृश्य के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि तितलियों की इतनी विविध आबादी स्वस्थ और आपस में जुड़े प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के महत्व को दर्शाती है। उनके अनुसार, ऐसे पारिस्थितिक तंत्रों की निरंतर सुरक्षा जैव विविधता को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
देहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान असम के डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया जिलों में 234.26 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यह असम घाटी के उष्णकटिबंधीय सदाबहार वर्षावनों के बचे हुए महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है। वर्ष 2021 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया था। यह राष्ट्रीय उद्यान एक बड़े जैव विविधता संपन्न पारिस्थितिक क्षेत्र का हिस्सा है, जहां हाथी, बाघ समेत कई महत्वपूर्ण वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं।
इसके अलावा यहां वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की व्यापक विविधता मौजूद है। घने वर्षावन, नदियां और प्राकृतिक वन क्षेत्र इस इलाके को वन्यजीवों के लिए अनुकूल आवास बनाते हैं। तितलियों को पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। तापमान, वर्षा, वनस्पति, जल स्रोतों और आवास में होने वाले बदलावों के प्रति उनकी संवेदनशीलता के कारण किसी क्षेत्र में तितलियों की विविधता वहां के पर्यावरण की स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती है।
विशेषज्ञों और संरक्षणवादियों के अनुसार, देहिंग पटकाई में बड़ी संख्या में तितली प्रजातियों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि क्षेत्र के वर्षावन अब भी जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वहीं संकटग्रस्त प्रजातियों की मौजूदगी इस प्राकृतिक आवास की सुरक्षा की आवश्यकता को और महत्वपूर्ण बनाती है। सर्वेक्षण के निष्कर्षों ने देहिंग पटकाई के जंगलों और उससे जुड़े प्राकृतिक गलियारों के संरक्षण की जरूरत को भी रेखांकित किया है।
संरक्षणवादियों का कहना है कि जंगलों की निरंतरता बनाए रखना, प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना और मानवीय गतिविधियों के दबाव को नियंत्रित करना इस क्षेत्र की जैव विविधता को लंबे समय तक बचाए रखने के लिए जरूरी होगा। 260 से अधिक तितली प्रजातियों का दस्तावेजीकरण देहिंग पटकाई और आसपास के वर्षावन क्षेत्र की जैव विविधता के पैमाने को सामने लाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के नियमित सर्वेक्षण दुर्लभ प्रजातियों की निगरानी, संरक्षण की प्राथमिकताएं तय करने और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रभाव को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

