
Uniqus Consultech की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक भारत की 90% रिन्यूएबल एनर्जी पाइपलाइन पर क्लाइमेट जोखिम का गंभीर खतरा।
वैश्विक नियमों के सख्त होने के बीच कंपनियों को अब वित्तीय नतीजों की तरह सस्टेनेबिलिटी परफॉर्मेंस की भी देनी होगी पारदर्शी रिपोर्ट।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
भारत अगर अपने इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का मात्र 2% हिस्सा क्लाइमेट-रेज़िलिएंट (जलवायु-सहनशील) डिज़ाइन में निवेश करे, तो वह भविष्य में होने वाले 28 अरब डॉलर (लगभग 2.3 लाख करोड़ रुपये) के संभावित नुकसान को टाल सकता है। यह महत्वपूर्ण खुलासा AI-संचालित कंसल्टिंग फर्म Uniqus Consultech की नवीनतम ‘सस्टेनेबिलिटी एंड क्लाइमेट पल्स’ (Sustainability & Climate Pulse) रिपोर्ट में हुआ है।
4 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की संपत्ति पर खतरा
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक भारत की लगभग 90% नियोजित रिन्यूएबल एनर्जी (अक्षय ऊर्जा) पाइपलाइन पर जलवायु परिवर्तन से जुड़े गंभीर जोखिमों का साया है। इसके तहत देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैले करीब 239 गीगावाट (GW) के सोलर, विंड और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स बाढ़, भीषण गर्मी और तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ सकते हैं, जिससे 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति दांव पर लगी है।
Uniqus Consultech की पार्टनर और ग्लोबल हेड (सस्टेनेबिलिटी एंड क्लाइमेट कंसल्टिंग) अनु चौधरी ने कहा, “भारत का सस्टेनेबिलिटी का सफ़र अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। अब ध्यान सिर्फ़ रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाने पर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने पर होना चाहिए कि हमारा महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर जलवायु जोखिमों का सामना कर सके। सस्टेनेबिलिटी को अब केवल प्रोजेक्ट-लेवल की चिंता के बजाय बोर्डरूम और निवेश निर्णयों की मुख्य प्राथमिकता बनाना अनिवार्य है।”
जैव विविधता और समुदाय विकास पर ज़ोर
रिपोर्ट में एक ऐसे व्यापक ढाँचे को रेखांकित किया गया है जो पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक आवास बहाली और कम्युनिटी डेवलपमेंट को बढ़ावा देता है। इन पहलों से देश भर के 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में 10,500 से अधिक बायोडायवर्सिटी मैनेजमेंट कमेटियों, किसानों, राज्य वन विभागों और अनुसंधान संस्थानों को सीधे तौर पर फ़ायदा पहुँचा है।
रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि वैश्विक स्तर पर सस्टेनेबिलिटी नियम तेज़ी से सख्त हो रहे हैं। ‘साइंस-बेस्ड टारगेट्स इनिशिएटिव’ (SBTi) के नए नेट-ज़ीरो स्टैंडर्ड्स के तहत अब कंपनियों को सालाना पारदर्शी रिपोर्टिंग, बोर्ड की निगरानी और वित्तीय निर्णयों में सस्टेनेबिलिटी को शामिल करना अनिवार्य हो रहा है। मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंकों द्वारा 2025 में रिकॉर्ड 163 बिलियन अमेरिकी डॉलर का क्लाइमेट फ़ाइनेंस दिया जाना यह साबित करता है कि ग्लोबल कैपिटल अब कम-कार्बन और क्लाइमेट-रेज़िलिएंट इंफ़्रास्ट्रक्चर की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है।
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