सोशल मीडिया handle @sustainable_ashwin के ज़रिए लोगों को सिखा रहे हैं आसान वेस्ट सेग्रीगेशन और ज़ीरो-वेस्ट लाइफ़स्टाइल।
महंगे इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट्स के बजाय व्यावहारिक आदतों पर जोर, ऑनलाइन के साथ स्कूलों और सोसाइटियों में चला रहे जागरूकता अभियान।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
प्लास्टिक प्रदूषण और घर से निकलते कचरे की समस्या जहां एक ओर बेहद जटिल नज़र आती है, वहीं @sustainable_ashwin के नाम से लोकप्रिय एक सस्टेनेबिलिटी एजुकेटर अपने आसान और व्यावहारिक तरीकों से बड़ा बदलाव ला रहे हैं। महंगे इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट्स या कठिन ‘ज़ीरो-वेस्ट’ लाइफ़स्टाइल को थोपने के बजाय, अश्विन का ध्यान एक ही मूल विचार पर है: सस्टेनेबिलिटी प्रैक्टिकल, सस्ती और हर व्यक्ति की पहुँच में होनी चाहिए।
कम्पोस्टिंग और वेस्ट सेग्रीगेशन (कचरा प्रबंधन) पर जोर
अश्विन के काम का मुख्य हिस्सा घर पर कम्पोस्टिंग (खाद निर्माण) और कचरे को अलग-अलग करने (Waste Segregation) को बढ़ावा देना है। वीडियो और डेमो के माध्यम से वे दिखाते हैं कि कैसे सब्ज़ियों और फलों के छिलकों जैसे गीले कचरे को, जो आमतौर पर डंपिंग ग्राउंड में सड़ता है, पोषक तत्वों से भरपूर खाद में बदला जा सकता है। छोटे अपार्टमेंट्स से लेकर बड़े घरों तक के लिए व्यावहारिक तरीके बताने के साथ वे बदबू, नमी और कीड़े-मकोड़ों जैसी शुरुआती समस्याओं का समाधान भी देते हैं।
वे घरों में गीले कचरे, रीसायकल योग्य सूखे कचरे, सैनिटरी वेस्ट और इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (E-waste) को स्रोत पर ही अलग करने का आग्रह करते हैं, ताकि डंपिंग ग्राउंड जाने वाले कचरे की मात्रा में भारी कमी लाई जा सके।
बायो-एंज़ाइम, प्लास्टिक का विकल्प और किचन गार्डनिंग
अश्विन का कंटेंट केवल कम्पोस्टिंग बिन तक सीमित नहीं है बल्कि वे लोगों को फलों के छिलकों, गुड़ और पानी को फर्मेंट (किण्वित) करके बायो-एंज़ाइम बनाना सिखाते हैं। यह नेचुरल सॉल्यूशन केमिकल क्लीनर्स पर निर्भरता को कम करता है। वे डिस्पोज़ेबल चीज़ों की जगह दोबारा इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं को अपनाने और प्लास्टिक का उपयोग घटाने के लिए लगातार प्रेरित करते हैं। किचन गार्डनिंग और ऑर्गेनिक फर्टिलाइज़र्स के ज़रिए वे बिना ज़्यादा खर्च किए पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार घर बनाने के व्यावहारिक तरीके साझा करते हैं।
सोशल मीडिया से ज़मीनी स्तर तक पहुंच
इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर अपने सहज और सरल अंदाज़ के कारण अश्विन ने एक बड़ा समर्थक वर्ग तैयार कर लिया है। वे केवल डिजिटल माध्यमों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्कूलों और रिहायशी कॉलोनियों (Residential Areas) में ऑफ़लाइन वर्कशॉप्स और जागरूकता सत्र भी आयोजित करते हैं।
हाल ही में ज़मीनी स्तर पर पर्यावरण में बड़ा बदलाव लाने वाले लोगों पर केंद्रित एक रिपोर्ट में प्रसिद्ध डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ‘द बेटर इंडिया’ (The Better India) ने भी अश्विन के काम को प्रमुखता से शामिल किया है।
अश्विन की यह पहल एक साधारण सी बात को साबित करती है कि पर्यावरण में सार्थक बदलाव के लिए हमेशा बड़ी-बड़ी सरकारी नीतियों या उद्योगों में बदलाव का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है; इसकी शुरुआत बहुत छोटी चीज़ों से हो सकती है, जैसे कि कोई परिवार अपने रोज़मर्रा के कचरे का निपटान किस प्रकार करता है।
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