एनजीटी के निर्देशों और 2016 के गंगा प्राधिकरण आदेश के तहत उठाया गया है। इससे अनधिकृत निर्माण, अतिक्रमण रोकने और नदी के प्राकृतिक प्रवाह की सुरक्षा में मदद मिलेगी। इसके अलावा, यमुना और रामगंगा जैसी कई सहायक नदियों का सीमांकन भी पूरा हो चुका है, जबकि गोमती, घाघरा और राप्ती नदियों के लिए 31 मार्च 2027 की समयसीमा तय की गई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। उत्तर प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को बताया है कि राज्य में गंगा नदी के बाढ़ मैदान क्षेत्र का भौतिक सीमांकन करीब 700 किलोमीटर लंबी पट्टी में पूरा कर लिया गया है।
यह क्षेत्र 13 जिलों में फैला है और उन्नाव से बलिया तक गंगा के किनारे स्थित है। सीमांकन के दौरान जमीन पर 7,350 सीमा स्तंभ लगाए गए हैं। उत्तर प्रदेश सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता की ओर से एनजीटी में दाखिल हलफनामे में इस कार्य के पूरा होने की पुष्टि की गई।
25 अगस्त को मामले की सुनवाई के दौरान एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने राज्य की ओर से पेश की गई जानकारी को दर्ज किया।
राज्य सरकार के अनुसार, संबंधित सभी 13 जिलों में चिन्हित बाढ़ मैदान क्षेत्र का भौतिक सीमांकन पूरी तरह पूरा हो चुका है। अधिकारियों ने इसे गंगा के बाढ़ मैदान के संरक्षण और सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। यह कार्रवाई रिवर गंगा (रीजनरेशन, प्रोटेक्शन एंड मैनेजमेंट) अथॉरिटीज ऑर्डर, 2016 तथा एनजीटी की ओर से पहले जारी किए गए निर्देशों के अनुरूप की गई है। बाढ़ मैदान की सीमा को जमीन पर स्पष्ट रूप से चिह्नित किए जाने से प्रशासन के लिए इस क्षेत्र की निगरानी आसान होगी।
इसके माध्यम से निर्धारित सीमा के भीतर होने वाली अनधिकृत गतिविधियों, अतिक्रमण और अवैध निर्माण की पहचान तथा रोकथाम अधिक प्रभावी तरीके से की जा सकेगी। साथ ही, नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र और उससे जुड़े पर्यावरणीय संसाधनों की सुरक्षा के लिए भूमि उपयोग को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने एनजीटी को गंगा की सहायक नदियों के बाढ़ मैदानों के सीमांकन की प्रगति की जानकारी भी दी।
राज्य के अनुसार, यमुना, रामगंगा, बेतवा, सुवाव, टेढ़ी, बूढ़ी गंगा, सोलानी और खोकरी समेत कई प्रमुख सहायक नदियों के लिए सीमांकन का काम पूरा हो चुका है। वहीं, काली पूर्वी, वरुणा, हिंडन, पांडु और नून समेत कई अन्य नदियों के बाढ़ मैदानों का सीमांकन अभी जारी है। राज्य ने गोमती, घाघरा और राप्ती नदियों के लिए यह प्रक्रिया पूरी करने की अंतिम समयसीमा 31 मार्च 2027 निर्धारित की है।
गंगा के बाढ़ मैदान का भौतिक सीमांकन पूरा होना उत्तर प्रदेश में नदी संरक्षण और भूमि उपयोग नियमन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। बाढ़ के दौरान नदी को अतिरिक्त जल के फैलाव के लिए प्राकृतिक क्षेत्र उपलब्ध कराने में बाढ़ मैदान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और अतिक्रमण से जल निकासी प्रभावित होने के साथ बाढ़ का जोखिम भी बढ़ सकता है।
सीमांकन के बाद संबंधित जिलों में नदी के किनारे विकास गतिविधियों की निगरानी और नियमन के लिए प्रशासन के पास स्पष्ट भौगोलिक सीमा उपलब्ध होगी। इससे भविष्य में बाढ़ जोखिम कम करने, अनधिकृत निर्माण पर नियंत्रण रखने और गंगा के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने के प्रयासों को मजबूती मिलने की उम्मीद है। राज्य सरकार द्वारा सहायक नदियों के बाढ़ मैदानों का सीमांकन भी चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है।
इससे गंगा और उसकी सहायक नदियों से जुड़े पूरे नदी तंत्र के संरक्षण के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करने में मदद मिल सकती है। 31 मार्च 2027 तक गोमती, घाघरा और राप्ती के सीमांकन का लक्ष्य पूरा होने के बाद राज्य में नदी बाढ़ मैदान प्रबंधन की प्रक्रिया और अधिक व्यापक होने की उम्मीद है। उन्नाव से बलिया तक 700 किलोमीटर क्षेत्र में गंगा के बाढ़ मैदान का भौतिक सीमांकन और 7,350 सीमा स्तंभों की स्थापना के बाद अब चुनौती इन सीमाओं की प्रभावी निगरानी और संरक्षण की होगी।
अधिकारियों के अनुसार, स्पष्ट सीमांकन के आधार पर भूमि उपयोग को नियंत्रित करना और नदी के प्राकृतिक क्षेत्र में अतिक्रमण रोकना गंगा संरक्षण की दीर्घकालिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
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