नियमों का पालन न करने पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) की धारा 5 के तहत सेवाएं बंद करने और गतिविधियों को रोकने के जारी हो सकते हैं आदेश।
देश भर में जांचे गए 9,178 स्वास्थ्य केंद्रों में से केवल 5,715 ही पाए गए सही; UP के सभी 111 और राजस्थान के सभी 33 केंद्र मिले अमानक।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
देश में बायोमेडिकल (अस्पताली) कचरे के निपटान में उत्तर प्रदेश समेत 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को सूचित किया है कि बायोमेडिकल कचरे के निपटान से जुड़े नियमों का पालन न करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
आठ सप्ताह का अल्टीमेटम और धारा 5 के तहत कार्रवाई
CPCB ने चिन्हित किए गए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कमियों को दूर करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया है। यदि तय समय-सीमा में सुधार नहीं होता है, तो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत निर्देश जारी किए जाएंगे। इस धारा के तहत केंद्र सरकार के पास बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार है, जिसमें स्वास्थ्य संस्थानों की गतिविधियों को नियंत्रित करना, बंद करना और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सेवाएं रोकना शामिल है।
देशव्यापी जांच के आंकड़े और मुख्य गड़बड़ियां
CPCB ने देश भर में बड़े पैमाने पर 9,178 स्वास्थ्य केंद्रों की जांच की, जिनमें से केवल 5,715 केंद्र ही नियमों के अनुकूल पाए गए। जांच में मुख्य रूप से निम्नलिखित कमियां पाई गईं।
भूजल स्तर के नियम का उल्लंघन: 477 स्वास्थ्य केंद्रों में सबसे बड़ी गड़बड़ी पाई गई, जहां कचरा निपटान स्थल से कम से कम 6 मीटर नीचे भूजल स्तर रखने के अनिवार्य नियम का पालन नहीं हो रहा था।
मंजूरी का अभाव: 341 स्वास्थ्य केंद्रों के पास संबंधित प्राधिकरण की जरूरी वैधानिक मंजूरी (Permission) ही नहीं थी।
उत्तर प्रदेश और राजस्थान की चिंताजनक स्थिति
जांच में दो प्रमुख राज्यों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा।
उत्तर प्रदेश: राज्य में जांच किए गए सभी 111 संबंधित स्वास्थ्य केंद्र नियमों का पालन करते नहीं पाए गए।
राजस्थान: राजस्थान में भी जांच किए गए सभी 33 स्वास्थ्य केंद्र मानकों पर खरे नहीं उतरे।
सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरा
बायोमेडिकल कचरा संक्रामक और अत्यंत खतरनाक होता है। इसके सही उपचार और निपटान में लापरवाही से पर्यावरण के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। CPCB का स्पष्ट उद्देश्य सभी स्वास्थ्य संस्थानों से नियमों का शत-प्रतिशत पालन कराना और पाई गई कमियों को तय समय-सीमा के भीतर दुरुस्त करना है।

