CEEW के अध्ययन में पाया गया कि 1980 से 2024 के बीच शिमला, कुल्लू और मंडी के पेरी-अर्बन इलाकों में निर्मित क्षेत्र 44% तक बढ़ा और हरियाली 30% तक घटी। हिमाचल में चरम मौसमी घटनाओं में 8 गुना वृद्धि हुई है, जिससे भूस्खलन, अचानक बाढ़ और पेयजल किल्लत बढ़ रही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ ‘माउंटेन पेरी-अर्बन प्लानिंग फ्रेमवर्क’ लागू करना और स्थानीय ग्राम पंचायतों को विकास योजना में शामिल करना।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। शिमला से सटे शोघी में पहाड़ों का बदलता स्वरूप अब साफ नजर आने लगा है। जहां कभी घने जंगल और प्राकृतिक ढलानें हुआ करती थीं, वहां आज सड़कें, इमारतें और पर्यटन परियोजनाएं तेजी से पांव पसार रही हैं।
इसके साथ ही मौसम के बदलते मिजाज ने भारी बारिश, भूस्खलन और पानी की किल्लत जैसे खतरों को भी बढ़ा दिया है। यह तस्वीर सिर्फ शिमला तक सीमित नहीं है, बल्कि मंडी, कुल्लू सहित प्रदेश के कई अन्य शहरों से लगे गांवों में भी कमोबेश यही हाल है।
एक नए अध्ययन ने इसे जलवायु परिवर्तन और अनियोजित शहरीकरण के दोहरे संकट के रूप में परिभाषित किया है। काउंसिल ऑन एनर्जी, वाटर एंड एन्वायरन्मेंट (सीईईडब्ल्यू), नई दिल्ली द्वारा किए गए इस अध्ययन में मंडी के पंडोह, कुल्लू के बजौरा तथा शिमला के धमून और शोघी क्षेत्रों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है।
यह शोध रिसर्च स्क्वेयर प्रीप्रिंट प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित हुआ है और इसे सीईईडब्ल्यू की शोधकर्ता अहाना चटर्जी और मीत कुमार ने तैयार किया है। शोध के मुताबिक, 1980 से 2024 के बीच इन चारों क्षेत्रों में निर्मित क्षेत्रफल में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है — बजौरा में यह वृद्धि सबसे अधिक 44 प्रतिशत रही, इसके बाद धमून में करीब 43 प्रतिशत, पंडोह में 38 प्रतिशत और शोघी में 24 प्रतिशत निर्माण बढ़ा।
इसके साथ-साथ हरियाली में भी लगातार कमी देखी गई — धमून में पेड़ों का दायरा करीब 30 प्रतिशत, पंडोह में 25 प्रतिशत और शोघी में लगभग 19 प्रतिशत तक घट गया। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पिछले पांच दशकों के दौरान हिमाचल में अत्यधिक मौसमी घटनाओं की संख्या लगभग आठ गुना बढ़ गई है।
भारी बारिश, बाढ़, बादल फटने और लू जैसी घटनाओं का सीधा असर अब खेती-बागवानी के साथ-साथ बुनियादी ढांचे पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट में 2023 की विनाशकारी बाढ़ का भी जिक्र है, जिसमें राज्य को 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान झेलना पड़ा था और सैकड़ों लोगों की जान गई थी।
पहाड़ों और जंगलों को काटकर हो रहे सड़क व भवन निर्माण ने पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक स्थिरता को कमजोर किया है। हरियाली घटने से मिट्टी की पकड़ ढीली पड़ रही है, जबकि बढ़ती कंक्रीट सतह के चलते बारिश का पानी ज़मीन में रिसने के बजाय बहकर तबाही मचा रहा है — इससे भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा और बढ़ जाता है।
पंडोह में 2023 की बाढ़ ने पुलों, घरों और दुकानों को भारी नुकसान पहुंचाया था। बजौरा में खेती की परंपरागत अर्थव्यवस्था अब धीरे-धीरे कारोबार और पर्यटन की ओर शिफ्ट होती दिख रही है। वहीं शोघी में फोरलेन सड़क और बढ़ते पर्यटन के चलते पानी, सीवेज और कचरा प्रबंधन पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि पहाड़ी इलाकों के लिए अलग से भवन निर्माण मानक तय किए जाएं, ढलानों पर निर्माण की सीमा तय हो, बेहतर जल निकासी व्यवस्था और वर्षाजल संरक्षण को बढ़ावा मिले, और जलस्रोतों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
इसके अलावा, एक समर्पित “माउंटेन पेरी-अर्बन प्लानिंग फ्रेमवर्क” तैयार करने और ग्राम पंचायतों को योजना-निर्माण प्रक्रिया में सीधे शामिल करने पर भी जोर दिया गया है। चार क्षेत्रों में बढ़ा निर्मित क्षेत्र: धमून – 43%, बजौरा – 44%, पंडोह – 38%, शोघी – 24% आपदा प्रबंधन विभाग के निदेशक एवं विशेष सचिव डॉ. पुष्पेंद्र राणा के अनुसार, हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों के सामने जलवायु परिवर्तन और तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, दोनों मिलकर एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं।
उनका कहना है कि भारी बारिश, ढलानों पर हो रहा निर्माण, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों में बदलाव और घटती हरियाली जैसी चरम स्थितियां जोखिम को और बढ़ा सकती हैं। उनके मुताबिक, इसका हल विकास कार्यों को रोकना नहीं, बल्कि पहाड़ी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक सोच और जोखिम-आधारित योजना अपनाना है।
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