विश्व बैंक ने अमेरिका के दबाव में अपने वार्षिक वित्त पोषण के 45% जलवायु वित्त (Climate Finance) के निश्चित लक्ष्य को समाप्त कर दिया है, जिससे जलवायु कोष की निगरानी और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी ऐसे जिलों में रहती है, जो बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसे जलवायु जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। असम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार जैसे राज्यों में जलवायु संकट का असर अब सड़कों की तबाही, खेती में व्यवधान और बार-बार होने वाले विस्थापन के रूप में दिखाई दे रहा है।
स्थानीय स्तर पर यह भी स्पष्ट है कि इन इलाकों को किन उपायों की जरूरत है—ऊंची और मजबूत सड़कें, बेहतर तटबंध, सुरक्षित आश्रय स्थल और प्रभावी शुरुआती चेतावनी प्रणालियां।
असली समस्या यह है कि इन जरूरतों के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं है। ऐसे समय में जब भारत के संवेदनशील जिलों को बढ़ती गर्मी और पानी के बढ़ते खतरे से बचाने के लिए अधिक निवेश की जरूरत है, विश्व बैंक ने अपने 45 प्रतिशत जलवायु वित्त लक्ष्य को समाप्त कर दिया है।
इससे इस बात की जवाबदेही कमजोर हो सकती है कि जलवायु के नाम पर उपलब्ध धन आखिर कहां और किस तरह खर्च हो रहा है। इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन इलाकों पर पड़ने की आशंका है, जहां जलवायु परिवर्तन का जोखिम सबसे अधिक है, लेकिन जहां छोटे और स्थानीय अनुकूलन प्रोजेक्ट निवेश के लिए आकर्षक नहीं माने जाते। बड़े सौर पार्क, बिजली ग्रिड, ट्रांसमिशन लाइन, मेट्रो परियोजनाएं और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी योजनाओं को वित्त उपलब्ध कराना अपेक्षाकृत आसान होता है।
इसके विपरीत गांवों में जीवन और आजीविका बचाने वाले तटबंध, जल प्रणालियां, शीतलन केंद्र, छायादार ढांचे और बाढ़ आश्रय जैसे छोटे प्रोजेक्ट अक्सर वित्त की तलाश में रह जाते हैं। दिसंबर 2023 में दुबई में आयोजित COP28 के दौरान विश्व बैंक ने अपने वार्षिक वित्त पोषण का 45 प्रतिशत ऐसे प्रोजेक्टों के लिए निर्धारित किया था, जिनमें जलवायु से जुड़े सह-लाभ हों। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बैंक का पर्याप्त वित्त पोषण उत्सर्जन कम करने या बाढ़, गर्मी और सूखे जैसे खतरों से लोगों को बचाने वाली परियोजनाओं में जाए।
लेकिन जून 2026 में अमेरिका के दबाव के बीच विश्व बैंक ने इस 45 प्रतिशत लक्ष्य को समाप्त करने का फैसला किया। बैंक अब यह मापने के बजाय कि उसके कुल ऋण का कितना हिस्सा जलवायु से संबंधित है, व्यापक विकास परिणामों और विकास प्रभाव को अधिकतम करने पर ध्यान देने की बात कर रहा है। कागज पर यह बदलाव अधिक लचीला और परिणाम आधारित नजर आ सकता है। लेकिन स्पष्ट लक्ष्य हट जाने के बाद यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि वास्तव में कितना पैसा जलवायु कार्रवाई पर खर्च किया जा रहा है और क्या वह धन उन इलाकों तक पहुंच रहा है, जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
भारत को 2030 तक जलवायु परिवर्तन से निपटने और उसके प्रभावों के अनुकूल होने के लिए हर साल अनुमानतः 160 अरब से 288 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है। इसमें केवल उत्सर्जन कम करने वाली परियोजनाएं ही शामिल नहीं हैं। बाढ़ से सुरक्षा, सूखा राहत, जल प्रबंधन, गर्मी से बचाव और जलवायु-सहनीय आवास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर अनुकूलन परियोजनाओं तक पहुंचने वाला वित्त जरूरत की तुलना में बेहद कम है। अधिकांश जलवायु वित्त अब भी उन क्षेत्रों में जाता है, जहां बड़े पैमाने पर ऋण देना आसान होता है।
सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं, बिजली ग्रिड, ट्रांसमिशन नेटवर्क और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे प्रोजेक्ट अक्सर बड़े शहरों या औद्योगिक गलियारों के आसपास केंद्रित होते हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण जिलों में छोटे पैमाने की वे परियोजनाएं, जो सीधे लोगों की जान और आजीविका बचा सकती हैं, वित्तीय प्राथमिकताओं में पीछे छूट जाती हैं। यह असमानता सामाजिक रूप से कमजोर समुदायों के लिए और गंभीर है। कई संवेदनशील जिलों में दलित, आदिवासी, भूमिहीन मजदूर और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर होने वाले फैसलों में उनकी आवाज अक्सर पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हो पाती। इसके अलावा, यह पता लगाना भी कठिन होता है कि अनुकूलन के लिए स्वीकृत धन वास्तव में इन समुदायों तक पहुंचा या नहीं। जलवायु वित्त के लिए तय कोई स्पष्ट लक्ष्य कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और स्थानीय नेताओं को सरकारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जवाब मांगने का आधार देता था।
यदि ऐसा निश्चित लक्ष्य ही समाप्त हो जाए, तो सबसे कमजोर समुदायों के लिए वित्तीय व्यवस्था की निगरानी और अधिक कठिन हो सकती है। विश्व बैंक का तर्क है कि जलवायु से जुड़े सह-लाभ वाली परियोजनाएं बेहतर विकास का माध्यम हैं और बैंक अब वित्तीय इनपुट की जगह वास्तविक परिणामों को मापने की दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन भारत जैसे असमान समाज में न्यूनतम वित्तीय लक्ष्य का खत्म होना प्राथमिकताओं के कमजोर पड़ने का कारण भी बन सकता है। लचीलेपन के नाम पर यदि कोई स्पष्ट न्यूनतम सीमा नहीं होगी, तो सबसे कठिन और कम आकर्षक परियोजनाओं को लगातार टाला जा सकता है।
यदि विश्व बैंक यह साबित करना चाहता है कि 45 प्रतिशत जलवायु वित्त लक्ष्य को हटाना जलवायु कार्रवाई से पीछे हटना नहीं है, तो भारत को इसके बदले कम से कम दो ठोस आश्वासन मांगने चाहिए। पहला, जलवायु वित्त का एक निश्चित हिस्सा सबसे अधिक जोखिम वाले जिलों और समुदायों तक पहुंचाने की सार्वजनिक गारंटी। दूसरा, ऐसी पारदर्शी और स्वतंत्र रूप से जांची जा सकने वाली रिपोर्टिंग व्यवस्था, जिससे यह पता चल सके कि जलवायु के नाम पर दिया गया प्रत्येक रुपया कहां खर्च हुआ।
वाशिंगटन के किसी बैठक कक्ष से यह बदलाव अधिक लचीले और परिणाम आधारित विकास मॉडल जैसा दिखाई दे सकता है। लेकिन बिहार के बाढ़ग्रस्त पंचायत कार्यालय में इसकी जरूरत कहीं अधिक सीधी है—एक मजबूत तटबंध, सुरक्षित आश्रय स्थल या ऐसी चेतावनी प्रणाली जो समय रहते लोगों को खतरे से आगाह कर सके। जलवायु वित्त की असली परीक्षा इस बात से नहीं होगी कि कितनी बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी मिली, बल्कि इससे होगी कि संकट के समय सबसे कमजोर गांवों और समुदायों तक सुरक्षा कितनी जल्दी पहुंची।
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