सावन-भादों के मौसम में वाराणसी में गंगा का जलस्तर तेजी से बढ़ने के कारण जिला प्रशासन ने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नदी में सभी तरह की नावों के संचालन पर रोक लगा दी है।
सावन-भादों के मौसम में वाराणसी के घाटों पर गंगा का बढ़ता जलस्तर अब नाविकों और घाट किनारे कारोबार करने वालों के लिए बड़ी चिंता बन गया है।
शनिवार को नदी का पानी लगातार ऊपर चढ़ता रहा, जिसके बाद जिला प्रशासन ने सुरक्षा के मद्देनजर गंगा में सभी तरह की नावों के संचालन पर रोक लगा दी। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार वाराणसी में गंगा का जलस्तर 68.74 मीटर तक पहुंच गया है और पानी करीब 20 मिलीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहा है।
नदी अब 71.26 मीटर के खतरे के निशान से लगभग ढाई मीटर ही नीचे है। प्रशासन के इस फैसले का सबसे सीधा असर उन नाविकों पर पड़ा है जिनकी रोजी-रोटी गंगा की लहरों से जुड़ी है।
दशाश्वमेध, अस्सी, पंचगंगा और अन्य प्रमुख घाटों पर रोजाना पर्यटकों और श्रद्धालुओं को नाव की सैर कराने वाले नाविकों को अपनी नावें किनारे बांधकर खड़ी करनी पड़ी हैं।
छोटी नावों से लेकर बड़ी नावों तक सभी का संचालन फिलहाल बंद कर दिया गया है। अचानक लगी रोक ने नाविक समुदाय के सामने कमाई का संकट खड़ा कर दिया है, खासकर उन परिवारों के लिए जिनकी दैनिक आय का बड़ा हिस्सा नाव चलाने से आता है।
घाटों पर नावों की आवाजाही बंद होने से वाराणसी के गंगा किनारे का पारंपरिक दृश्य भी बदल गया है। आम दिनों में जहां नदी में नावों की कतार, श्रद्धालुओं की आवाजाही और पर्यटकों की चहल-पहल दिखाई देती है, वहीं बढ़ते जलस्तर के कारण कई स्थानों पर नावें किनारे खड़ी नजर आ रही हैं।
प्रशासन का कहना है कि नदी के तेज बहाव और लगातार बढ़ते पानी के बीच नाव संचालन की अनुमति देना यात्रियों और नाविकों दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। गंगा का पानी बढ़ने से शहर के प्रसिद्ध घाटों को जोड़ने वाले कई रास्ते भी जलमग्न हो गए हैं। घाटों की निचली सीढ़ियां पानी में डूब चुकी हैं और कई स्थानों पर लोगों की सामान्य आवाजाही प्रभावित हुई है।
नदी का पानी बढ़ने के साथ धार्मिक और पारंपरिक गतिविधियों में भी बदलाव करना पड़ रहा है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार के लिए निचले हिस्सों की जगह ऊंची सीढ़ियों और छतों का सहारा लेना पड़ रहा है। घाटों के आसपास काम करने वाले लोगों के लिए यह स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।
शाम के समय होने वाली प्रसिद्ध गंगा आरती पर भी बढ़ते जलस्तर का असर पड़ा है। गंगा के किनारे सामान्य परिस्थितियों में होने वाले धार्मिक आयोजनों के लिए अब अतिरिक्त सावधानी बरती जा रही है। घाटों पर भीड़ को नियंत्रित करने और लोगों को पानी के बेहद करीब जाने से रोकने की कोशिश की जा रही है।
प्रशासन श्रद्धालुओं और पर्यटकों से अपील कर रहा है कि वे जलस्तर बढ़ने के दौरान नदी के किनारे अनावश्यक जोखिम न लें। जिला प्रशासन की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि बढ़ते जलस्तर और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए गंगा में सभी नावों के संचालन पर प्रतिबंध लगाया गया है।
अधिकारियों के अनुसार मौजूदा रफ्तार से पानी बढ़ता रहा तो आने वाले एक-दो दिनों में नदी खतरे के निशान के करीब पहुंच सकती है। इसी संभावना को देखते हुए प्रशासन ने पहले ही एहतियाती कदम उठाए हैं। गंगा का जलस्तर इस सप्ताह लगातार बढ़ रहा है। सप्ताह के मध्य में नदी का जलस्तर करीब 68.35 मीटर दर्ज किया गया था, जो अब बढ़कर 68.74 मीटर पहुंच गया है।
वाराणसी में चेतावनी का स्तर 70.262 मीटर निर्धारित है। इसका मतलब है कि नदी का पानी चेतावनी सीमा की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यदि ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश जारी रहती है तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। नावों पर रोक का असर केवल पर्यटन पर नहीं पड़ा है। गंगा घाटों के आसपास छोटी दुकानों, फूल-माला बेचने वालों, पूजा सामग्री विक्रेताओं, चाय-नाश्ते की दुकानों और अन्य छोटे कारोबारियों की आय भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आवाजाही पर निर्भर रहती है।
नाव संचालन बंद होने से गंगा दर्शन और नाव यात्रा के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या प्रभावित होने की आशंका है। इससे पहले से ही बारिश से प्रभावित घाट किनारे के कारोबार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। नाविकों के लिए यह स्थिति खास तौर पर मुश्किल है क्योंकि नदी का बढ़ता जलस्तर उनके काम को सीधे रोक देता है।
नावें घाटों पर बांधकर खड़ी होने के कारण वे यात्रियों को एक घाट से दूसरे घाट तक ले जाने या गंगा की सैर कराने में सक्षम नहीं हैं। वहीं तेज बहाव के कारण नावों को सुरक्षित स्थान पर बांधकर रखना भी जरूरी हो गया है। कई नाविकों के सामने आने वाले दिनों में रोजमर्रा के खर्च और परिवार की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती पैदा हो सकती है।
वाराणसी में गंगा का बढ़ता जलस्तर शहर के लिए केवल बाढ़ का संभावित खतरा नहीं है, बल्कि यह उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनशैली को भी प्रभावित करता है। शहर के प्रमुख घाटों पर होने वाली धार्मिक गतिविधियां, अंतिम संस्कार, पर्यटन और नाव आधारित अर्थव्यवस्था सभी नदी के जलस्तर से सीधे जुड़ी हुई हैं।
गंगा का पानी जब सामान्य सीमा में रहता है तो यही नदी शहर की पहचान और अर्थव्यवस्था का आधार बनती है, लेकिन जलस्तर बढ़ने पर वही नदी प्रशासन और नागरिकों के लिए चुनौती बन जाती है। जिला प्रशासन और आपदा प्रतिक्रिया दल स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। बाढ़ चौकियों को सक्रिय रखा गया है और निचले इलाकों में जरूरत पड़ने पर राहत एवं बचाव कार्य शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाई गई है ताकि पानी के और ऊपर आने की स्थिति में प्रभावित लोगों तक समय पर मदद पहुंचाई जा सके। प्रशासन ने स्थानीय लोगों के साथ-साथ वाराणसी आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों से भी सावधानी बरतने की अपील की है।
लोगों को नदी के किनारे फिसलन वाले हिस्सों और जलमग्न सीढ़ियों पर जाने से बचने की सलाह दी गई है। नावों पर प्रतिबंध के बावजूद यदि कोई व्यक्ति निजी तौर पर नदी में उतरने या असुरक्षित तरीके से नाव चलाने की कोशिश करता है तो यह गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकता है।
आने वाले दिनों में स्थिति काफी हद तक ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में होने वाली बारिश पर निर्भर करेगी। यदि बारिश का सिलसिला जारी रहता है तो गंगा का जलस्तर और बढ़ सकता है और प्रशासन को घाटों से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी प्रतिबंधात्मक कदम उठाने पड़ सकते हैं।
फिलहाल नावों का थम जाना वाराणसी के घाटों पर बढ़ते जल संकट का सबसे स्पष्ट संकेत है। गंगा की लहरों पर रोजी-रोटी और शहर की सांस्कृतिक पहचान दोनों टिकी हैं, ऐसे में नदी का बढ़ता पानी अब केवल घाटों की सीढ़ियों को नहीं डुबो रहा, बल्कि नाविकों की आजीविका और वाराणसी की पारंपरिक गंगा-आधारित अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल रहा है।
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