गुजरात के जामनगर जिले में स्थित रामसर स्थल खिजड़िया पक्षी अभयारण्य दुर्लभ ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क (Black-necked Stork) के लिए एक प्रमुख प्रजनन केंद्र के रूप में उभरा है। GEER फाउंडेशन द्वारा जुलाई 2024 से मार्च 2025 के बीच किए गए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, यहाँ इस पक्षी की प्रजनन सफलता असाधारण रूप से अच्छी रही है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। गुजरात के जामनगर जिले में स्थित रामसर सूचीबद्ध खिजड़िया (खिजाडिया) पक्षी अभयारण्य ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क (Ephippiorhynchus asiaticus) के लिए एक महत्वपूर्ण प्रजनन केंद्र के रूप में उभरा है। गुजरात इकोलॉजिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (GEER) फाउंडेशन के एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में इस प्रजाति के सफल प्रजनन और बच्चों के जीवित रहने की उल्लेखनीय दर दर्ज की गई है। गुजरात वन विभाग के अधीन स्वायत्त संस्था GEER फाउंडेशन के शोधकर्ताओं ने जुलाई 2024 से मार्च 2025 के बीच अभयारण्य में अध्ययन किया।
पीयर-रिव्यू जर्नल Journal of Threatened Taxa में प्रकाशित शोध के अनुसार, अध्ययन के दौरान चार सक्रिय घोंसले मिले। प्रत्येक घोंसले पर एक प्रजनन जोड़े ने दो-दो बच्चों को सफलतापूर्वक उड़ने योग्य बनाया। इस तरह कुल आठ किशोर पक्षी दर्ज किए गए। इसके अलावा पांच गैर-प्रजनन वयस्क ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क नियमित रूप से देखे गए, जिससे मौसम के दौरान अभयारण्य में इस प्रजाति की अधिकतम संख्या 21 तक पहुंची।
अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि 100 प्रतिशत फ्लेजिंग सफलता रही। चारों घोंसलों से दो-दो बच्चे सफलतापूर्वक उड़ने योग्य हुए और किसी भी घोंसले को छोड़े जाने, शिकार होने या चूजों की मृत्यु का मामला सामने नहीं आया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि सभी चार घोंसले Neltuma juliflora पर बनाए गए थे, जिसे पहले Prosopis juliflora कहा जाता था और स्थानीय स्तर पर गंडो बबूल के नाम से जाना जाता है। ये घोंसले जमीन से करीब 3 से 4.5 मीटर की ऊंचाई पर थे। ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क सामान्यतः बबूल और अंजीर जैसे बड़े देशी पेड़ों को घोंसले के लिए पसंद करता है। हालांकि, खिजड़िया में मिले निष्कर्ष बताते हैं कि जहां देशी पेड़ों की उपलब्धता सीमित हो, वहां यह पक्षी संरचनात्मक रूप से उपयुक्त आक्रामक प्रजाति के पेड़ों को भी प्रजनन के लिए अपना सकता है। घोंसलों के आसपास उथले आर्द्र क्षेत्र मौजूद थे, जहां पानी की गहराई करीब 0.3 से 0.7 मीटर थी।
इन जल क्षेत्रों में मछली, उभयचर और क्रस्टेशियन जैसे जलीय जीव पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे, जो स्टॉर्क के लिए महत्वपूर्ण भोजन स्रोत हैं। अध्ययन में प्रजनन गतिविधियों की एक स्पष्ट समय-रेखा भी सामने आई। अगस्त-सितंबर में पक्षियों के व्यवहार में बदलाव दिखाई दिए, जबकि अक्टूबर की शुरुआत में घोंसले बनाने का काम शुरू हुआ। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर की शुरुआत तक अंडों से बच्चे निकले।
दिसंबर में चूजों की देखभाल और उन्हें उड़ने योग्य बनाने की प्रक्रिया तेज रही और वर्ष के अंत तक बच्चे घोंसलों से उड़ने लगे। शोधकर्ताओं ने 89 घोंसला निरीक्षणों के दौरान माता-पिता की देखभाल का भी विस्तृत अध्ययन किया। एक वयस्क पक्षी औसतन 62 मिनट तक घोंसले पर मौजूद रहा। करीब 94 प्रतिशत भोजन की तलाश में उड़ान भरने के मामलों में एक अभिभावक के लौटने पर दूसरे ने घोंसले की जिम्मेदारी संभाली।
इससे घोंसले और चूजों की लगातार निगरानी सुनिश्चित हुई। GEER फाउंडेशन के निदेशक बी.पी. पाटी ने कहा कि चारों सक्रिय घोंसलों से दो-दो बच्चे सफलतापूर्वक उड़ने योग्य हुए और कुल आठ किशोर पक्षी दर्ज किए गए। शोधकर्ताओं ने अध्ययन के दौरान आठ जोन में 48 जियो-रेफरेंस्ड सैंपलिंग प्वाइंट बनाए और 320 घंटे से अधिक का अवलोकन डेटा एकत्र किया। ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में 2022 के संशोधन के बाद अनुसूची-II के तहत सूचीबद्ध किया गया है। ऐसे में खिजड़िया में इसके सफल प्रजनन को संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
खिजड़िया रामसर साइट होने के साथ-साथ सेंट्रल एशियन फ्लाईवे का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां मीठे पानी और खारे पानी वाले विभिन्न प्रकार के आवास मौजूद हैं, जो बड़ी संख्या में स्थानीय और प्रवासी जलपक्षियों को आश्रय देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अध्ययन के निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क के संरक्षण के लिए उथले आर्द्र क्षेत्रों, उपयुक्त घोंसला बनाने वाले पेड़ों और कम मानवीय हस्तक्षेप वाले प्रजनन क्षेत्रों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। अभयारण्य में आवास प्रबंधन और मानवीय गतिविधियों में कमी जैसे संरक्षण प्रयासों से हाल के वर्षों में पक्षियों की संख्या में वृद्धि को भी सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। खिजड़िया में ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क की उच्च प्रजनन सफलता पश्चिमी भारत में लक्षित आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए एक उत्साहजनक संकेत है।
वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के अध्ययन भविष्य में महत्वपूर्ण जलपक्षी आवासों की बेहतर निगरानी और संरक्षण रणनीति तैयार करने में मदद करेंगे।
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