भारत के सौर ऊर्जा उद्योग में उत्पादन क्षमता और वास्तविक मांग के बीच भारी असंतुलन पैदा हो गया है, जहाँ जून 2026 तक 233 गीगावाट सोलर पैनल निर्माण क्षमता होने के बावजूद कारखाने अपनी क्षमता के केवल 35 से 40 प्रतिशत हिस्से पर ही काम कर रहे हैं। इस संकट की मुख्य वजह केवल अंतिम चरण यानी पैनल बनाने पर अत्यधिक ध्यान देना है, जबकि सेल, वेफर, इंगॉट और पॉलीसिलिकॉन जैसे बुनियादी घटकों के निर्माण में देश काफी पीछे है। अमेरिकी बाजारों में भारी आयात शुल्क (200 प्रतिशत तक ड्यूटी) लगने से निर्यात प्रभावित हुआ है, और आने वाले कुछ वर्षों में संभावित अतिरिक्त मांग (लगभग 17 से 22 गीगावाट) भविष्य की नियोजित अतिरिक्त क्षमता के मुकाबले बहुत कम है, जिससे छोटे कारखानों और पुरानी तकनीक (PERC से TOPCon का बदलाव) पर टिके उद्योगों पर बंदी का खतरा मंडरा रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत की सौर ऊर्जा उद्योग में एक बड़ी समस्या सामने आई है। देश ने जून 2026 तक 233 गीगावाट सोलर पैनल बनाने की क्षमता तो तैयार कर ली है, लेकिन ये क्षमता इस्तेमाल नहीं हो रही। सोलर पैनल बनाने वाले कारखाने मात्र 35 से 40 फीसदी क्षमता से काम कर रहे हैं। यानी अगर कोई कारखाना रोज 100 पैनल बना सकता है, तो वो सिर्फ 35-40 ही बना रहा है और बाकी 60-65 मशीनें खाली बैठी हैं।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब पता चलता है कि भारत ने अभी से 135 गीगावाट और क्षमता बनाने की योजना बना रखी है। यानी आने वाले दिनों में और भी ज्यादा कारखाने आने वाले हैं। यह सवाल उठता है कि इतने सारे पैनल कौन खरीदेगा?
असल समस्या यह है कि भारत ने सिर्फ पैनल बनाने पर फोकस किया है। पैनल बनाने के लिए जो चीजें चाहिए — सेल, वेफर, इंगॉट, पॉलीसिलिकॉन — उन सब में भारत बहुत पिछड़ा हुआ है। पैनल की क्षमता सेल की क्षमता का 7 गुना है और इंगॉट-वेफर की क्षमता का 116 गुना। यह संतुलन बिल्कुल नहीं है। भारत को बाहर से ये सब चीजें आयात करनी पड़ रही हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है और मुनाफे में कटौती होती है।
विश्लेषकों को आशा है कि नई मांग कहीं से तो आ सकती है। डेटा सेंटर जैसे-जैसे बढ़ेंगे और AI सेवाएं फैलेंगी, उन्हें बिजली चाहेगी। अनुमान है कि 2030 तक 2-3 गीगावाट की अतिरिक्त मांग हो सकती है। ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग भी सोलर पैनलों की खपत बढ़ा सकता है। 8-10 गीगावाट तक की मांग इसी क्षेत्र से आ सकती है। निर्यात भी एक विकल्प है। लेकिन सब मिलाकर भी 2030 तक सिर्फ 17-22 गीगावाट की अतिरिक्त मांग आएगी। जबकि अभी से ही 135 गीगावाट और बनने वाली है। यह गणित साफ दिखाता है कि पैनल की आपूर्ति मांग से कहीं ज्यादा है।
निर्यात का मामला भी चिंताजनक है। भारत 2026 में जितने पैनल निर्यात कर रहा था, उसका 97 फीसदी अमेरिका जा रहा था। बाकी दुनिया को बस 128 मेगावाट ही मिल रहा था। अमेरिका में 2024 में भारत की बिक्री पीक पर थी, लेकिन फिर अमेरिका ने कड़े ड्यूटी लगा दिए। अब 200 फीसदी तक ड्यूटी लग गई है। नतीजा यह है कि भारत का निर्यात गिर गया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका जैसी नई मार्केटों में जाना चाहिए। लेकिन इसके लिए उसे चीन जैसी कीमतों पर प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
जब पूरा बाजार इस तरह भर जाएगा, तो सबको नुकसान होगा, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान छोटे कारखानों को होगा। जो बड़ी कंपनियां पूरी चीन की खुद बना सकती हैं, वो बच जाएंगी। बाकी 45-50 गीगावाट क्षमता वाली छोटी कंपनियों को या तो बड़ी कंपनियां निगल जाएंगी या वो बिल्कुल बंद हो जाएंगी। साथ ही, नई तकनीक भी आ रही है। PERC नाम की पुरानी तकनीक से देश अब TOPCon नई तकनीक की ओर जा रहा है। जो कंपनियां पुरानी तकनीक पर अटकी हैं, वो भी खतरे में हैं।
एक्सपर्ट्स और विश्लेषण रिपोर्टें भारत को कई सुझाव दे रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण है पीछे की ओर बढ़ना। सेल, वेफर, पॉलीसिलिकॉन में भी कारखाने बनाने चाहिए। सिर्फ पैनल बनाने पर निर्भरता खतरनाक है। दूसरा, भारत को दुनिया भर में अपनी पहुंच बढ़ानी चाहिए, अमेरिका के अलावा। तीसरा, तकनीक में निवेश करना चाहिए और चीन से अलग नई तकनीकों में शोध करना चाहिए। चौथा, Pax Silica जैसी पहल से जुड़कर चीन के बजाय दूसरे देशों से सिलिकॉन आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।
भारत की सोलर मैनुफैक्चरिंग का सफर अभी शुरुआत है। लेकिन पैनल बनाने के सपने में उतावली नहीं आनी चाहिए। जब तक मांग और आपूर्ति में संतुलन न हो, जब तक पिछले हिस्सों में भी विकास न हो, तब तक यह खेल नहीं बदलेगा। बड़ी कंपनियों के लिए तो सब ठीक है, पर छोटे-मझोले कारखानों के लिए आने वाले दिन काफी चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।
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