राज्य में कुल भूजल विकास स्तर 152.22% पहुंच गया है। आकलन किए गए 153 ब्लॉकों में से 110 ब्लॉक अभी भी ‘अति-दोहित’ (Over-exploited) श्रेणी में हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। पंजाब में भूजल दोहन का संकट लगातार गंभीर बना हुआ है। ताजा आकलन के अनुसार राज्य में भूजल के टिकाऊ उपयोग के लिए उपलब्ध मात्रा की तुलना में करीब 52 प्रतिशत अधिक पानी निकाला जा रहा है।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में स्थिति में मामूली सुधार दर्ज किया गया है, लेकिन राज्य सरकार अब संकट से निपटने के लिए नहर नेटवर्क के विस्तार और सतही जल आधारित सिंचाई को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दे रही है।
राज्य समिति द्वारा तैयार डायनामिक ग्राउंडवाटर रिसोर्स असेसमेंट के अनुसार पंजाब में भूजल का वार्षिक पुनर्भरण करीब 19.14 अरब घन मीटर (BCM) है। इसमें से लगभग 17.29 BCM पानी ही टिकाऊ तरीके से निकासी के लिए उपलब्ध माना जाता है। इसके बावजूद 2025-26 में राज्य में 26.32 BCM भूजल का दोहन किया गया। इसके चलते भूजल विकास का कुल स्तर 152.22 प्रतिशत तक पहुंच गया।
निकाले गए भूजल में से करीब 24.95 BCM का इस्तेमाल कृषि सिंचाई के लिए किया गया। राज्य के 153 आकलन किए गए ब्लॉकों में से 110 ब्लॉक अभी भी अति-दोहित श्रेणी में हैं। छह ब्लॉक गंभीर, 17 अर्ध-गंभीर और केवल 20 ब्लॉक सुरक्षित श्रेणी में हैं। पिछले दो वर्षों में अति-दोहित ब्लॉकों की संख्या 115 से घटकर 110 हुई है, जो सीमित सुधार का संकेत देती है।
इसके बावजूद राज्य के करीब 72 प्रतिशत ब्लॉक गंभीर या अति-दोहित श्रेणी में बने हुए हैं। अधिकारियों के मुताबिक पंजाब में भूजल के अत्यधिक दोहन का सबसे बड़ा कारण पानी की अधिक खपत वाली धान की खेती और सिंचाई के लिए ट्यूबवेल पर भारी निर्भरता है। इस स्थिति को बदलने के लिए राज्य सरकार नहर आधारित सिंचाई का विस्तार करने और नहरों का पानी खेतों के अंतिम छोर तक पहुंचाने पर काम कर रही है।
सरकार का मानना है कि जिन क्षेत्रों में नहर के पानी की उपलब्धता बढ़ी है, वहां भूजल दोहन में कमी देखने को मिली है। इसी दिशा में पुरानी नहरों के पुनर्स्थापन, अतिरिक्त पाइपलाइन बिछाने और नहर नेटवर्क के आसपास भूजल पुनर्भरण केंद्र विकसित करने की योजनाएं तैयार की जा रही हैं।
जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने बताया है कि राज्य में भूजल दोहन का स्तर पहले करीब 164 प्रतिशत तक पहुंच चुका था, जो अब घटकर 152.22 प्रतिशत रह गया है। उनके अनुसार खेतों तक सीधे नहर का पानी पहुंचाने के प्रयासों से इस सुधार में मदद मिली है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नहर नेटवर्क का विस्तार पंजाब के भूजल संकट का स्थायी समाधान नहीं है।
इसके साथ फसल विविधीकरण, सिंचाई की अधिक दक्ष तकनीकों, पानी की बचत और प्रभावी संरक्षण उपायों को भी बड़े पैमाने पर लागू करना जरूरी होगा। पंजाब में दशकों से जारी गहन कृषि गतिविधियों और धान की खेती के कारण भूजल स्तर में उल्लेखनीय गिरावट आई है। मौजूदा आंकड़े इस चुनौती की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। आने वाले महीनों में सरकार की ओर से भूजल संरक्षण, फसल पैटर्न में बदलाव और जल संसाधनों की निगरानी से जुड़े कदमों को और तेज किए जाने की उम्मीद है।
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