एक नए सैटेलाइट-ट्रैकिंग अध्ययन से खुलासा हुआ है कि गंभीर रूप से संकटग्रस्त लेसर फ्लोरिकन (दुनिया की सबसे छोटी बस्टर्ड प्रजाति, जिसकी राष्ट्रीय आबादी केवल 480 बची है) पूरे वर्ष प्राकृतिक और अक्षुण्ण घास के मैदानों पर अत्यधिक निर्भर रहती है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क । एक नए सैटेलाइट-ट्रैकिंग अध्ययन ने खुलासा किया है कि गंभीर रूप से संकटग्रस्त लेसर फ्लोरिकन (Lesser Florican) पूरे वर्ष प्राकृतिक और अपेक्षाकृत अक्षुण्ण घास के मैदानों पर अत्यधिक निर्भर रहता है। अध्ययन ऐसे समय सामने आया है जब भारत में इन प्राकृतिक घासभूमियों का तेजी से क्षरण, विखंडन और कृषि विस्तार के कारण नुकसान हो रहा है।
शोधकर्ताओं ने 2020 से 2022 के बीच गुजरात में 12 लेसर फ्लोरिकन के शरीर पर सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाए और वर्ष 2025 तक उनकी गतिविधियों पर नजर रखी।
इस दौरान 1.5 लाख से अधिक उपयोगी GPS लोकेशन प्राप्त हुईं। यह भारत में एक ही अध्ययन के तहत इस प्रजाति पर किया गया अब तक का सबसे बड़ा सैटेलाइट-ट्रैकिंग प्रयास माना जा रहा है। अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं ने पश्चिमी और मध्य भारत में लगभग 2.06 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले एक व्यापक प्रवास मार्ग की पहचान की है।
इसके भीतर करीब 60,000 वर्ग किलोमीटर का एक ऐसा क्षेत्र सामने आया जहां लेसर फ्लोरिकन की गतिविधियों का घनत्व विशेष रूप से अधिक रहा। प्रजनन और गैर-प्रजनन दोनों मौसम में घासभूमि पहली पसंद अध्ययन में पाया गया कि जून से सितंबर के प्रजनन मौसम के दौरान भी और गैर-प्रजनन अवधि में भी प्राकृतिक घासभूमि लेसर फ्लोरिकन का सबसे पसंदीदा आवास बनी रहती है।
प्रवासी पक्षी गैर-प्रजनन मौसम में कभी-कभी कृषि क्षेत्रों और झाड़ीदार इलाकों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं के अनुसार ये क्षेत्र प्राकृतिक घासभूमि का विकल्प नहीं हैं। पक्षी उन स्थानों को स्पष्ट रूप से अधिक पसंद करते हैं जो घासभूमि के पैच के नजदीक होते हैं। जैसे-जैसे घासभूमि से दूरी बढ़ती जाती है, दूसरे प्रकार के आवासों का इस्तेमाल भी तेजी से कम होता जाता है।
अध्ययन का निष्कर्ष है कि कृषि भूमि कभी-कभी भोजन और थोड़े समय के लिए विश्राम का अवसर उपलब्ध करा सकती है, लेकिन प्राकृतिक घासभूमि इस प्रजाति के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवास बनी रहती है। वहीं, स्थानीय यानी रेजिडेंट लेसर फ्लोरिकन पूरे वर्ष लगभग अनिवार्य रूप से घासभूमि पर निर्भर रहने वाली प्रजाति के रूप में सामने आए हैं।
करीब 480 पक्षियों की राष्ट्रीय आबादी लेसर फ्लोरिकन को दुनिया की सबसे छोटी बस्टर्ड प्रजाति माना जाता है। भारत में इसकी अनुमानित राष्ट्रीय आबादी केवल करीब 480 पक्षियों की रह गई है। आवासों के नष्ट होने, घासभूमियों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने और कृषि गतिविधियों के बढ़ते दबाव ने इस पक्षी की संख्या में गंभीर गिरावट दर्ज की है। विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण प्रयासों को केवल उन स्थानों तक सीमित नहीं रखा जा सकता जहां वर्तमान में लेसर फ्लोरिकन दिखाई देता है।
इसके बजाय बड़े और आपस में जुड़े प्राकृतिक घासभूमि क्षेत्रों को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि पक्षियों को प्रजनन, भोजन, मौसमी आवाजाही और लंबी दूरी के प्रवास के लिए पर्याप्त जगह मिल सके। घासभूमियों के बीच संपर्क बनाए रखना जरूरी शोधकर्ताओं के मुताबिक, अलग-अलग घासभूमि पैच के बीच कनेक्टिविटी बनाए रखना संरक्षण की प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके साथ ही कृषि भूमि और प्राकृतिक घासभूमि के मिश्रित क्षेत्रों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन भी आवश्यक है।
लेसर फ्लोरिकन के लिए महत्वपूर्ण प्रवास गलियारों की पहचान कर उन्हें विकास और भूमि-उपयोग में होने वाले अनियंत्रित बदलावों से बचाना भी अहम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक घासभूमियों का संरक्षण केवल एक पक्षी को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि इन पारिस्थितिक तंत्रों पर निर्भर अनेक प्रजातियों और स्थानीय जैव विविधता की रक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
अध्ययन इस बात को रेखांकित करता है कि भारत में बची हुई प्राकृतिक घासभूमियों का संरक्षण लेसर फ्लोरिकन के भविष्य के लिए असाधारण महत्व रखता है। यदि घासभूमियों के लगातार नुकसान और विखंडन को तत्काल नहीं रोका गया, तो इस गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति के दीर्घकालिक अस्तित्व पर खतरा और गहरा सकता है।
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