भारत में तेजी से फैलते शहरों के बाहरी इलाकों यानी पेरी-अर्बन क्षेत्रों में बढ़ते जलवायु संकट को देखते हुए पारिस्थितिकी शोधकर्ताओं और शहरी नीति विशेषज्ञों ने एक व्यापक राष्ट्रीय शहरीकरण नीति बनाने की मांग तेज कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनियोजित निर्माण, प्रशासनिक बिखराव और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों (जैसे आर्द्रभूमियां, झीलें और हरित क्षेत्र) के लगातार नुकसान के कारण ये क्षेत्र स्थानीय बाढ़ और गंभीर भूजल संकट का सामना कर रहे हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत में तेजी से फैलते शहरों के बाहरी इलाकों यानी पेरी-अर्बन क्षेत्रों पर बढ़ते जलवायु संकट को देखते हुए पारिस्थितिकी शोधकर्ताओं और शहरी नीति विशेषज्ञों ने व्यापक राष्ट्रीय शहरीकरण नीति बनाने की मांग तेज कर दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अनियोजित निर्माण, प्रशासनिक बिखराव और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों के लगातार नुकसान के कारण शहरों के किनारे बसे क्षेत्र अत्यधिक स्थानीय बाढ़ और भूजल संकट का सामना कर रहे हैं।
भारत का वास्तविक शहरी विस्तार आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक व्यापक माना जा रहा है। 2011 की जनगणना में देश की करीब 31 प्रतिशत आबादी को शहरी बताया गया था, जबकि सैटेलाइट आंकड़ों और संयुक्त राष्ट्र के Degree of Urbanisation ढांचे के अनुसार 2025 तक लगभग 61 प्रतिशत भारतीय शहरी क्षेत्रों में और करीब 27 प्रतिशत पेरी-अर्बन क्षेत्रों में रह रहे थे।
ये ऐसे इलाके हैं जो न पूरी तरह ग्रामीण हैं और न ही औपचारिक रूप से शहरी। शहरों के विस्तार का बड़ा दबाव इन्हीं क्षेत्रों पर पड़ रहा है, जहां निर्माण गतिविधियों, अनौपचारिक बस्तियों, औद्योगिक विस्तार और बुनियादी ढांचे की कमी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार पेरी-अर्बन क्षेत्रों में मौजूद आर्द्रभूमियां, तालाब, झीलें और हरित क्षेत्र कभी प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करते थे। ये मानसूनी पानी को रोकने, प्रदूषित जल को छानने, भूजल पुनर्भरण बढ़ाने और स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
इनके अतिक्रमण और क्षरण ने स्थिति बदल दी है। बढ़ते कंक्रीटीकरण और बंद अथवा बाधित नालों के कारण तेज बारिश के दौरान अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। दूसरी ओर, अत्यधिक बोरवेल दोहन और प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण में कमी से जलस्तर लगातार दबाव में है। हाल के मानसून ने इस चुनौती को और स्पष्ट किया है। सितंबर 2026 की शुरुआत में भारी बारिश के बाद गुरुग्राम के कॉरपोरेट और आवासीय इलाकों में व्यापक जलभराव ने शहरी बुनियादी ढांचे की कमजोरियों को सामने रखा।
बेंगलुरु के आईटी कॉरिडोर, दिल्ली के अंडरपास और मुंबई के निचले इलाकों में भी मानसून के दौरान जलभराव की समस्या बार-बार सामने आती रही है। इसी समय हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और दिल्ली-एनसीआर के आसपास के पेरी-अर्बन क्षेत्रों में भूजल पर बढ़ता दबाव दर्ज किया गया है। कई स्थानों पर गहरे बोरवेल और अनौपचारिक टैंकर बाजार सीमित जल संसाधनों के लिए स्थानीय परिवारों तथा कृषि क्षेत्र के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
2026 में Centre for Public Policy Research की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में आकलन किए गए 226 भारतीय शहरों की जलवायु तैयारी का औसत स्तर केवल 34 प्रतिशत था। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के आकलन में हजारों छोटे कस्बों और बड़ी संख्या में ऐसे पेरी-अर्बन गांव शामिल नहीं होते, जो अब शहरी स्तर की समस्याओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन अभी भी ग्रामीण पंचायतों के प्रशासनिक ढांचे के तहत आते हैं।
इन क्षेत्रों में यातायात, कचरा प्रबंधन, जल संकट और बाढ़ जैसी समस्याएं शहरों जैसी हैं, लेकिन संसाधन, कर्मचारियों और कानूनी अधिकारों का स्तर अक्सर ग्रामीण प्रशासन जैसा ही है। यही प्रशासनिक अंतर संकट को और जटिल बना रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल हैबिटेट, AMRUT और विभिन्न शहरों की क्लाइमेट एक्शन योजनाएं महत्वपूर्ण पहल हैं, लेकिन उनकी पहुंच कई बार नगरपालिका सीमाओं तक सीमित रहती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक शहरों की जलवायु सुरक्षा केवल नगर निकाय की सीमा के भीतर की परियोजनाओं से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। हवा, जल और पारिस्थितिकी तंत्र प्रशासनिक सीमाओं का पालन नहीं करते। शहर से बाहर मौजूद कोई आर्द्रभूमि, जलग्रहण क्षेत्र या हरित क्षेत्र भी शहरी आबादी को बाढ़ और गर्मी से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। प्रस्तावित राष्ट्रीय शहरीकरण नीति में ‘शहरी’ क्षेत्र की परिभाषा को केवल प्रशासनिक सीमा के बजाय उसके कार्यात्मक और पारिस्थितिक संबंधों के आधार पर देखने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
इसके तहत ग्रामीण और शहरी प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय, प्राकृतिक संसाधनों और पेरी-अर्बन कॉमन्स की सुरक्षा के लिए स्पष्ट जिम्मेदारियां, हरित बुनियादी ढांचे को बढ़ावा तथा स्थानीय समुदायों की आजीविका की रक्षा जैसे प्रावधान शामिल किए जाने की मांग है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शहरों के आसपास के पारिस्थितिक तंत्रों को विकास योजना का हिस्सा नहीं बनाया गया तो बाढ़, जल संकट और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं की आर्थिक और सामाजिक लागत आने वाले वर्षों में बढ़ सकती है। बदलते मानसून और तेजी से बढ़ती शहरी मांग के बीच पेरी-अर्बन क्षेत्रों की योजना और संरक्षण को भारत की दीर्घकालिक शहरी जलवायु लचीलापन रणनीति का अहम हिस्सा बनाने की जरूरत है।
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