सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2015 में शुरू किए गए इस शुल्क का उद्देश्य व्यावसायिक वाहनों को हतोत्साहित करना और सार्वजनिक परिवहन व बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना था। CAG की समीक्षा के मुताबिक, 31 मार्च 2025 तक केवल ₹781.51 करोड़ ही खर्च हुए, यानी करीब 52% राशि उपयोग से बाहर पड़ी रही। ऑडिट में यह भी खुलासा हुआ कि 10 में से 5 वित्तीय वर्षों में ECC से कोई खर्च नहीं किया गया, और 280 दिनों का डेटा भी गायब मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि इस राशि का उपयोग इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन और स्थायी प्रदूषण नियंत्रण उपायों में किया जा सकता था।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: दिल्ली में सालभर बने रहने वाले वायु प्रदूषण के बीच प्रदूषण नियंत्रण के लिए जुटाई गई बड़ी राशि के इस्तेमाल को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दिल्ली विधानसभा में पेश ‘State Finances for the Year 2024-25’ रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (Environment Compensation Charge-ECC) के रूप में पिछले एक दशक में जुटाए गए ₹1,624.63 करोड़ में से ₹843.12 करोड़ अब भी खर्च नहीं किए गए हैं।
CAG ने 2015-16 से 2024-25 तक के आंकड़ों की समीक्षा की। रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2025 तक ECC की कुल ₹781.51 करोड़ राशि खर्च की गई, जबकि करीब 52 प्रतिशत राशि यानी ₹843.12 करोड़ उपयोग से बाहर पड़ी रही। ECC की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वर्ष 2015 में दिल्ली में प्रवेश करने वाले व्यावसायिक वाहनों पर की गई थी। यह शुल्क नगर निगम दिल्ली (MCD) द्वारा एकत्र किया जाता है और दिल्ली सरकार के खाते में जमा होता है।
इसका उद्देश्य राजधानी में प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के प्रवेश को हतोत्साहित करने के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन और पैदल यात्रियों से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए संसाधन उपलब्ध कराना था। CAG के आंकड़ों के अनुसार, ECC से होने वाली आय शुरुआती वर्षों में तेजी से बढ़ी। वर्ष 2015-16 में ₹144.06 करोड़ संग्रह हुआ, जो 2016-17 में बढ़कर ₹358.11 करोड़ और 2017-18 में ₹472.63 करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इसके बाद संग्रह में लगातार गिरावट दर्ज की गई। 2023-24 में यह ₹95.30 करोड़ और 2024-25 में ₹93.54 करोड़ रहा। दूसरी ओर, ECC राशि के खर्च का पैटर्न भी असमान रहा। वर्ष 2018-19 में ₹271.43 करोड़ खर्च किए गए, लेकिन 2019-20 में यह घटकर केवल ₹9 करोड़ रह गया।
इसके बाद लगातार तीन वित्तीय वर्षों में ECC से कोई खर्च दर्ज नहीं हुआ। वर्ष 2023-24 में एक बार फिर ₹500 करोड़ खर्च किए गए। ऑडिट में शामिल 10 वर्षों में से पांच वित्तीय वर्षों में ECC से कोई खर्च नहीं हुआ। रिपोर्ट ने रिकॉर्ड प्रबंधन में भी गंभीर खामियों की ओर इशारा किया है। CAG के अनुसार ECC संग्रह से संबंधित 280 दिनों का डेटा उपलब्ध नहीं था। इसमें 6 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक 21 दिन तथा 18 दिसंबर 2020 से 2 सितंबर 2021 तक 259 दिन शामिल हैं।
CAG ने संबंधित अधिकारियों से रिकॉर्ड गायब होने के कारणों पर स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला। CAG की यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब दिल्ली लंबे समय से वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है। सर्दियों में स्थिति विशेष रूप से गंभीर हो जाती है और पार्टिकुलेट मैटर का स्तर स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि उपलब्ध ECC राशि का इस्तेमाल दीर्घकालिक और स्थायी प्रदूषण नियंत्रण उपायों में किया जा सकता था। इनमें इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन का विस्तार, पैदल और गैर-मोटर चालित परिवहन के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा तथा प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी अन्य स्थायी परियोजनाएं शामिल हैं।
CAG के निष्कर्षों ने राजधानी में पर्यावरण से जुड़े शुल्क के संग्रह और उसके उपयोग के बीच अंतर को उजागर किया है। रिपोर्ट से यह सवाल भी सामने आया है कि प्रदूषण से निपटने के लिए निर्धारित धनराशि का समयबद्ध और प्रभावी इस्तेमाल किस हद तक किया जा रहा है।
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