बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS), असम वन विभाग और काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के सहयोग से, दुनिया में पहली बार कैद में पाले गए गंभीर रूप से संकटग्रस्त स्लेंडर-बिल्ड और व्हाइट-रम्प्ड गिद्धों को असम के बिश्वनाथ वन प्रभाग स्थित जटायु सॉफ्ट रिलीज सेंटर से जंगल में छोड़ा गया है। रानी स्थित वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर में पले-बढ़े कुल 10 गिद्धों (5 स्लेंडर-बिल्ड और 5 व्हाइट-रम्प्ड) को रिहाई से पहले तीन महीने तक एवियरी में अनुकूलित किया गया था।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: वैश्विक वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तहत बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने असम वन विभाग और काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिजर्व के सहयोग से गंभीर रूप से संकटग्रस्त स्लेंडर-बिल्ड और व्हाइट-रम्प्ड गिद्धों को जंगल में छोड़ा है।
बिश्वनाथ वन प्रभाग के तेवारिपाल स्थित जटायु सॉफ्ट रिलीज सेंटर में कैद में पाले गए 10 गिद्धों को सॉफ्ट रिलीज किया गया। इनमें पांच स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris) और पांच व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis) शामिल थे। यह दुनिया में पहली बार है जब कैद में पाले गए स्लेंडर-बिल्ड गिद्धों को जंगल में छोड़ा गया है।
इन गिद्धों का पालन-पोषण गुवाहाटी के निकट रानी स्थित BNHS के वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर में हुआ। असम वन विभाग के सहयोग और रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स (RSPB) समेत अन्य संस्थाओं के समर्थन से 2007 में स्थापित इस केंद्र में अब तक इन दोनों प्रजातियों के 190 से अधिक गिद्धों का सफल प्रजनन कराया जा चुका है। रिहाई से पहले 10 गिद्धों को लगभग तीन महीने तक विशेष सॉफ्ट-रिलीज एवियरी में अनुकूलन कराया गया।
इनकी उम्र करीब दो से चार वर्ष थी। पक्षियों को कम से कम तनाव देने के लिए एवियरी के दरवाजे करीब 100 मीटर की दूरी से पुली सिस्टम के जरिए रिमोट तरीके से खोले गए। रिहाई समारोह में असम के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्ल बरुआ, मुख्य वन्यजीव वार्डन डॉ. विनय गुप्ता, काजीरंगा के अधिकारी और BNHS के उपनिदेशक डॉ. सचिन रानाडे समेत कई अधिकारी मौजूद रहे। गिद्धों की गतिविधियों पर लगातार CCTV निगरानी रखी जाएगी। उनके पैरों में लगाए गए नंबरयुक्त नीले रिंग, बैक टैग और GSM-GPS सैटेलाइट ट्रांसमीटर वैज्ञानिकों को उनकी आवाजाही, जीवित रहने की स्थिति और जंगली आबादी के साथ उनके एकीकरण पर नजर रखने में मदद करेंगे।
दोनों प्रजातियों को IUCN ने गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में रखा है। भारत में 1990 के दशक के बाद व्हाइट-रम्प्ड, स्लेंडर-बिल्ड और लॉन्ग-बिल्ड गिद्धों की संख्या में 99 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। इसका प्रमुख कारण पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दर्द-निवारक दवा डाइक्लोफेनाक रहा है।
इस दवा से उपचारित पशुओं के शव खाने वाले गिद्धों में घातक किडनी फेलियर हो सकता है। असम को भारत में स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध के अंतिम महत्वपूर्ण आवासों में से एक माना जाता है। BNHS के डॉ. सचिन रानाडे ने कहा कि गिद्ध मृत पशुओं के शवों को साफ कर बीमारियों और प्रदूषण के प्रसार को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, असम में यह कार्यक्रम प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला को बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मार्च 2026 में रानी में व्हाइट-रम्प्ड गिद्धों की एक पायलट रिहाई भी की गई थी, जिसमें कैद में पाले गए और बचाए गए गिद्ध शामिल थे। यह पूर्वोत्तर भारत में कैद में पाले गए गिद्धों के पुनर्वास की पहली पहल थी। अधिकारियों ने बताया कि रिहाई स्थलों के 100 किलोमीटर के दायरे में पशुओं के शवों में जहरीली NSAID दवाओं की मौजूदगी की व्यापक जांच की गई है।
BNHS के निदेशक किशोर रिथे के अनुसार, केंद्र अब हर वर्ष 20 से 25 गिद्धों को जंगल में छोड़ने में सक्षम है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्रयासों की सफलता के लिए लंबे समय तक निगरानी, आवास संरक्षण, डाइक्लोफेनाक और अन्य जहरीली दवाओं पर प्रतिबंध का प्रभावी पालन तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी होगी। यह पहल भारत में गिद्धों की घटती आबादी को पुनर्जीवित करने और पूर्वोत्तर के पारिस्थितिकी तंत्र में इन महत्वपूर्ण सफाईकर्मी पक्षियों की भूमिका बहाल करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
Also Read: भारत लाए जाएंगे बोत्सवाना से आठ चीते, प्रोजेक्ट चीता को मिलेगा आनुवंशिक विविधता का सहारा

