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समुद्र के बढ़ते जलस्तर से अस्तित्व के संकट में प्रशांत द्वीपीय देश, पलायन और सांस्कृतिक पहचान बचाने की दोहरी चुनौती

Environment Pulse
Last updated: October 31, 2026 7:56 pm
Environment Pulse
Published: October 31, 2026
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जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का बढ़ता जलस्तर प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय देशों जैसे तुवालु और किरिबाती के लिए अस्तित्व का गंभीर संकट बन गया है, जहाँ जलस्तर प्रतिवर्ष लगभग 5 मिलीमीटर की दर से बढ़ रहा है। तटीय सुरक्षा, कृत्रिम रूप से ऊंची जमीन तैयार करने और नियोजित पुनर्वास के साथ-साथ, तुवालु ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए ‘डिजिटल नेशन’ की अनोखी पहल की है तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ फलेपिली यूनियन समझौते के तहत नागरिकों को विशेष वीजा मार्ग भी प्रदान किए गए हैं। कॉमनवेल्थ की रिपोर्ट में इस संकट को केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि विकास से जुड़ा मुद्दा बताते हुए क्षेत्रीय स्तर पर समन्वित रणनीतियाँ अपनाने पर जोर दिया गया है, ताकि इन देशों की संप्रभुता और राष्ट्रीय पहचान सुरक्षित रह सके। 

एनवायरमेंट पल्स डेस्क : जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का लगातार बढ़ता जलस्तर प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय देशों तुवालु और किरिबाती के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

इन देशों के सामने अपनी जमीन और आबादी को समुद्री बाढ़ से बचाने के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय संप्रभुता और भविष्य की पीढ़ियों का अस्तित्व सुरक्षित रखने की चुनौती है। इसके लिए सरकारें तटीय सुरक्षा, कृत्रिम रूप से ऊंची जमीन तैयार करने और नियोजित पुनर्वास जैसे विकल्पों पर काम कर रही हैं।

तुवालु और किरिबाती के आसपास समुद्र का जलस्तर प्रतिवर्ष लगभग 5 मिलीमीटर बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत 3.2 से 3.5 मिलीमीटर से अधिक है। दोनों देशों की औसत ऊंचाई समुद्र तल से तीन मीटर से भी कम है। इसके परिणामस्वरूप तटीय इलाकों में बाढ़, समुद्री कटाव, मीठे पानी के स्रोतों में खारे पानी का प्रवेश और कृषि भूमि तथा मकानों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ रहा है।

तुवालु ने फिलहाल अपने नागरिकों को उनके पारंपरिक द्वीपों पर बनाए रखने को प्राथमिकता दी है। इसके तहत ग्रीन क्लाइमेट फंड के सहयोग से तुवालु कोस्टल एडाप्टेशन प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। इस परियोजना के तहत राजधानी फुनाफुती एटोल में समुद्र तल से ऊंचाई पर 15.3 हेक्टेयर नई जमीन तैयार की जा चुकी है।

वर्ष 2026 के अंत तक इस क्षेत्र को 20 हेक्टेयर से अधिक करने का लक्ष्य है। इन ऊंचे भूभागों को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि वे वर्ष 2100 के बाद अनुमानित समुद्री जलस्तर वृद्धि के बावजूद सुरक्षित रह सकें। बाहरी द्वीपों पर समुद्री दीवारों और तटीय सुरक्षा संरचनाओं को भी मजबूत किया जा रहा है। हालांकि, कुछ पुराने निर्माण तूफानों और समुद्री कटाव के सामने टिक नहीं पाए हैं।

तुवालु ने अपनी राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए ‘डिजिटल नेशन’ की अवधारणा भी विकसित की है। इसके तहत द्वीपों की थ्री-डी स्कैनिंग, सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण और पारंपरिक गीतों, कहानियों तथा सांस्कृतिक परंपराओं का डिजिटल अभिलेखीकरण किया जा रहा है।

भविष्य में विदेशों में रहने वाले नागरिकों को अपनी मातृभूमि और राष्ट्रीय पहचान से जोड़े रखने के लिए डिजिटल पहचान प्रणाली की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। ऑस्ट्रेलिया और तुवालु के बीच 2023 में हुए फलेपिली यूनियन समझौते के तहत समुद्र के बढ़ते जलस्तर के बावजूद तुवालु की निरंतर राज्यसत्ता को मान्यता दी गई है।

इस समझौते के अंतर्गत प्रतिवर्ष 280 तुवालुवासियों को ऑस्ट्रेलिया में रहने, काम करने और पढ़ाई करने के लिए विशेष वीजा मार्ग उपलब्ध कराया गया है। इस योजना को लेकर लोगों में भारी उत्साह है और लगातार आयोजित चयन प्रक्रियाओं में देश की अधिकांश आबादी ने आवेदन किया है। किरिबाती भी इसी तरह के संकट का सामना कर रहा है। देश के पूर्व राष्ट्रपति अनोटे टोंग ने ‘रेडिकल एडाप्टेशन’ यानी व्यापक और असाधारण अनुकूलन उपायों की वकालत की है।

इसमें द्वीपों की ऊंचाई बढ़ाने और तैरती हुई संरचनाओं की संभावनाएं तलाशने जैसे विकल्प शामिल हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि समुद्र का जलस्तर और 50 सेंटीमीटर बढ़ने पर देश के अधिकांश द्वीप जलमग्न हो सकते हैं। किरिबाती की नीति भी लोगों को उनकी मातृभूमि में बनाए रखने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर सम्मानजनक और नियोजित पलायन के विकल्प खुले रखने पर केंद्रित है।

इस संकट से निपटने के लिए प्रशांत क्षेत्र के देशों ने 2026 में ‘पैसिफिक रीजनल गाइडेंस ऑन प्लान्ड रिलॉकेशन’ को अपनाया है। इसे नियोजित पुनर्वास के लिए दुनिया का पहला क्षेत्रीय ढांचा बताया जा रहा है। इसमें विस्थापन को अंतिम विकल्प मानते हुए स्थानीय समुदायों की सहमति, आदिवासी अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है।

इसी महीने जारी कॉमनवेल्थ की एक रिपोर्ट में भी समुद्र के बढ़ते जलस्तर को केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा मानने की अपील की गई है। रिपोर्ट में इंजीनियरिंग आधारित तटीय सुरक्षा, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, आपदा प्रबंधन और जरूरत पड़ने पर नियोजित पुनर्वास को एकीकृत रणनीति का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है।

तुवालु के नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर से उसकी तटरेखा प्रभावित हो सकती है, लेकिन इससे देश की राज्यसत्ता, संप्रभुता और समुद्री सीमाएं समाप्त नहीं होंगी। विशेषज्ञों और क्षेत्रीय नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण लोगों को अपनी जमीन छोड़नी पड़े तो भी उनकी राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहे।

इन द्वीपीय देशों के लिए संघर्ष केवल जमीन बचाने का नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, परंपराओं और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व बनाए रखने का भी है।

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