पश्चिमी घाट को इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया (ESA) घोषित करने के केंद्र सरकार के सातवें ड्राफ्ट नोटिफिकेशन (कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों पर आधारित) को लेकर कर्नाटक में सियासी घमासान मचा हुआ है। इसके विरोध में कर्नाटक विधानमंडल का तीन दिवसीय विशेष सत्र (21 से 23 सितंबर) आयोजित किया गया है। इस प्रस्ताव के तहत कर्नाटक के 10 जिलों के लगभग 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (33 तालुक और 1,449 गांव) को ESA के दायरे में लाने की योजना है, जहां खनन और उद्योगों पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण का प्रस्ताव है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: पश्चिमी घाट को इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया (ESA) घोषित करने के प्रस्ताव को लेकर कर्नाटक में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। राज्य सरकार, विपक्षी दलों, किसानों और स्थानीय समुदायों की आपत्तियों के बीच कर्नाटक विधानमंडल का तीन दिवसीय विशेष सत्र 21 से 23 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है।
केंद्र के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 27 जुलाई 2026 को पश्चिमी घाट के लिए सातवां ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया था। यह कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले हाई लेवल वर्किंग ग्रुप की 2013 की सिफारिशों पर आधारित है। प्रस्ताव के तहत कर्नाटक में 10 जिलों के करीब 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ESA के दायरे में रखने की बात है।
इसमें 33 तालुक और करीब 1,449 गांव शामिल हैं। प्रस्तावित क्षेत्र में बेलगावी, चामराजनगर, चिक्कमगलुरु, कोडागु, हासन, उत्तर कन्नड़, दक्षिण कन्नड़, मैसूरु, शिवमोग्गा और उडुपी जिले शामिल हैं। ड्राफ्ट में खनन, पत्थर खनन, रेत खनन, थर्मल पावर परियोजनाओं और रेड-कैटेगरी उद्योगों पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण का प्रस्ताव है।
कुछ निर्माण और अन्य विकास गतिविधियों पर भी नियमन लागू होगा। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा है कि राज्य सरकार प्रस्ताव को मौजूदा स्वरूप में स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और स्थानीय निवासियों के बीच चिंता का हवाला देते हुए जमीन के अधिक सटीक आकलन की जरूरत बताई है।
शिवकुमार ने प्राकृतिक जंगलों, कृषि भूमि और प्लांटेशन को अलग-अलग चिन्हित करने के लिए ड्रोन आधारित LiDAR सर्वे और प्लॉट-स्तरीय मैपिंग का सुझाव दिया है। राज्य सरकार ने केंद्र को अपनी आपत्तियां भेजने से पहले विशेष सत्र में इस मुद्दे पर चर्चा की है। केंद्र ने कर्नाटक को 27 सितंबर तक अपना जवाब और आपत्तियां दाखिल करने का समय दिया है। सरकार ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के समक्ष राज्य का पक्ष रखने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की योजना भी बताई है।
विपक्ष ने भी प्रस्ताव पर आपत्तियां दर्ज की हैं, हालांकि उसने सरकार से केवल विधानसभा प्रस्ताव पारित करने के बजाय विस्तृत सर्वे और कानूनी कार्रवाई की तैयारी करने की मांग की है। विपक्षी नेताओं ने प्रभावित गांवों का भौतिक सर्वे कराने और स्थानीय स्तर पर भूमि की स्थिति स्पष्ट करने की बात कही है।
किसानों और स्थानीय निवासियों की ओर से शिवमोग्गा, उडुपी, चिक्कमगलुरु और हासन समेत विभिन्न जिलों में विरोध प्रदर्शन और पदयात्राएं भी हुई हैं। स्थानीय समुदायों की चिंता मुख्य रूप से भूमि उपयोग, कृषि, निर्माण और आजीविका से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर है। दूसरी ओर, पर्यावरण समूहों का एक वर्ग पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए मजबूत संरक्षण उपायों की मांग करता रहा है।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर विवाद के केंद्र में पश्चिमी घाट के पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन का सवाल है। विशेष सत्र के बाद कर्नाटक के प्रस्तावित रुख में जमीनी सर्वे, अधिक सटीक मानचित्रण और कृषि तथा आबादी वाले क्षेत्रों की स्थिति स्पष्ट करने पर जोर रहने की संभावना है। राज्य को 27 सितंबर की समयसीमा तक केंद्र को अपनी औपचारिक आपत्तियां देनी हैं।
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