‘द लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ की दसवीं वार्षिक रिपोर्ट (28 अक्टूबर 2026 जारी) में दुनिया के नेताओं से जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित करने की अपील की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016 से 2023 के बीच अत्यधिक गर्मी के कारण वैश्विक स्तर पर लगभग 30 लाख लोगों की मौत हुई है, जिनमें से 68 प्रतिशत से अधिक मौतें मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के कारण हुईं। केवल वर्ष 2023 में ही गर्मी से जुड़ी लगभग 7,10,000 मौतें दर्ज की गईं। इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी के कारण श्रमिकों की उत्पादकता घटने से 2025 में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 1.07 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि स्वास्थ्य खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे निपटने के लिए डब्ल्यूएचओ (WHO) के माध्यम से नए अंतरराष्ट्रीय तंत्र, उत्सर्जन में कटौती और स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। द लैंसेट में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट ने दुनिया के नेताओं से जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित करने की अपील की है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2016 से 2023 के बीच दुनिया में जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी से संबंधित लगभग 30 लाख लोगों की मौत हुई।
28 अक्टूबर 2026 को जारी द लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज की दसवीं वार्षिक रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है। COP31 जलवायु सम्मेलन से पहले जारी इस रिपोर्ट को 30 से अधिक देशों के 146 शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि उनसे निपटने के वैश्विक प्रयास अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2023 के बीच अत्यधिक गर्मी के कारण हर साल औसतन लगभग 5,40,800 लोगों की मौत हुई। इनमें करीब 68 प्रतिशत यानी लगभग 3,70,000 मौतों के लिए मानव गतिविधियों से प्रेरित जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार माना गया है। इस आठ वर्ष की अवधि में जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी से होने वाली कुल मौतों का आंकड़ा लगभग 30 लाख तक पहुंच गया। वर्ष 2023 विशेष रूप से घातक रहा, जब गर्मी से संबंधित लगभग 7,10,000 मौतें दर्ज की गईं। इनमें 70 प्रतिशत से अधिक मौतों का संबंध जलवायु परिवर्तन से बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ तुलनाओं में यह वार्षिक आंकड़ा मलेरिया या एचआईवी से होने वाली मौतों से भी अधिक रहा। लैंसेट काउंटडाउन की कार्यकारी निदेशक मरीना रोमानेलो ने इस नुकसान की गंभीरता बताते हुए कहा कि आठ वर्षों में गर्मी के कारण हुई मौतों की संख्या वेल्स की पूरी आबादी के बराबर है।
उन्होंने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े कई स्वास्थ्य खतरों की वृद्धि दर लगातार तेज हो रही है। रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के आर्थिक प्रभावों को भी रेखांकित किया गया है। अत्यधिक गर्मी के कारण श्रमिकों की कार्यक्षमता और उत्पादकता प्रभावित हो रही है। अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025 में गर्मी के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को संभावित आय के रूप में लगभग 1.07 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ। इसका प्रभाव विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक देखा जा रहा है, जहां लोगों को खुले वातावरण में काम करना पड़ता है और जहां गर्मी से बचाव के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का स्तर और उनकी बढ़ती रफ्तार अब इसे वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में मान्यता देने की मांग करते हैं। इससे जलवायु संबंधी फैसलों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिल सकेगी और विभिन्न देशों के बीच समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई को बढ़ावा मिलेगा।
इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के माध्यम से किसी नए अंतरराष्ट्रीय तंत्र की संभावनाओं पर भी जोर दिया गया है। रिपोर्ट में उत्सर्जन में तेजी से कटौती करने के साथ-साथ स्वास्थ्य प्रणालियों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए तैयार करने की आवश्यकता बताई गई है। रिपोर्ट में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ने, कुछ क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सुधरने और कई देशों में जलवायु एवं स्वास्थ्य से संबंधित कानून मजबूत होने जैसे सकारात्मक बदलावों का भी उल्लेख है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि ये प्रयास अभी पर्याप्त नहीं हैं और इनका लाभ सभी क्षेत्रों तथा आबादी तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।
विशेष रूप से गरीब, बुजुर्ग, कमजोर स्वास्थ्य वाले और अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहने वाले समुदायों पर इसका प्रभाव अधिक पड़ रहा है। COP31 से कुछ सप्ताह पहले जारी इस रिपोर्ट ने वैश्विक सरकारों पर जलवायु कार्रवाई को केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय मानने के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य की तत्काल प्राथमिकता बनाने का दबाव बढ़ा दिया है। इसका स्पष्ट संदेश है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में देरी अब मानव जीवन और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए भारी कीमत वसूल रही है।
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