ग्लोबल अलायंस फॉर इन्सिनरेटर अल्टरनेटिव्स (GAIA) की हालिया रिपोर्ट ‘द बर्न बुक’ के अनुसार, कचरे से बिजली बनाने वाले संयंत्र (वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट) जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं। अध्ययन में शामिल 11 संयंत्रों से हर साल लगभग 50 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जित होती है, जो 13 लाख गाड़ियों के सालाना उत्सर्जन के बराबर है। इसके अलावा, इन संयंत्रों से सालाना 17 लाख टन जहरीली राख भी निकलती है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : कचरे से बिजली बनाने वाले संयंत्र (वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट) जलवायु परिवर्तन की चुनौती को और बढ़ा सकते हैं। एक नए वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि विभिन्न देशों में संचालित ऐसे संयंत्रों से हर साल लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जित हो रही है।
अध्ययन में शामिल 11 संयंत्रों से संयुक्त रूप से लगभग 50 लाख मीट्रिक टन CO₂ प्रतिवर्ष उत्सर्जित होती है, जो करीब 13 लाख पेट्रोल और डीजल कारों के सालाना उत्सर्जन के बराबर है। ग्लोबल अलायंस फॉर इन्सिनरेटर अल्टरनेटिव्स (GAIA) ने द बर्न बुक: इन्सिनरेटर्स दैट थ्रेटन द क्लाइमेट, पब्लिक हेल्थ एंड आवर फाइनेंस शीर्षक से यह रिपोर्ट जारी की। शोधकर्ताओं ने 16 देशों में संचालित 20 वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्रों का अध्ययन किया।
इनमें भारत का दिल्ली स्थित तिमारपुर-ओखला वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट भी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, अध्ययन में शामिल 11 संयंत्रों से हर साल लगभग 17 लाख टन जहरीली राख भी निकलती है। इसका वजन करीब 230 एफिल टावर के बराबर बताया गया है। GAIA के शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रति इकाई ऊर्जा उत्पादन के आधार पर वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्र प्रमुख ऊर्जा स्रोतों की तुलना में सबसे अधिक जलवायु प्रभावित करने वाला उत्सर्जन करते हैं।
इसके बावजूद कई देशों की सरकारें इस तकनीक में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं। अध्ययन में शामिल 20 संयंत्रों में कुल करीब 7 अरब डॉलर का पूंजी निवेश किया गया है। इटली, जिम्बाब्वे, थाईलैंड और ब्राजील सहित कई देशों में नए संयंत्र प्रस्तावित हैं या निर्माणाधीन हैं। रिपोर्ट में उत्सर्जन और जहरीली राख से संबंधित आंकड़ों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, नीदरलैंड के एटेरो मोरडिज्क संयंत्र से राख उत्पादन और कुल उत्सर्जन का अद्यतन विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है।
अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि कचरा जलाने की तकनीक रीसाइक्लिंग और कम्पोस्टिंग जैसे विकल्पों को प्रभावित कर सकती है। इससे स्थानीय समुदाय लंबे समय तक कचरा जलाने से जुड़े अनुबंधों में बंध सकते हैं। ऐसे संयंत्रों से जीवाश्म और जैविक स्रोतों से निकलने वाले कार्बन के अलावा अन्य प्रदूषकों का उत्सर्जन भी होता है। हालांकि, इस तकनीक के समर्थकों का तर्क है कि आधुनिक संयंत्रों में उन्नत प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियां लगाई जाती हैं।
इनके माध्यम से लैंडफिल में कचरे के सड़ने से उत्पन्न मीथेन उत्सर्जन कम किया जा सकता है और अनुपयोगी कचरे से बिजली एवं गर्मी पैदा की जा सकती है। GAIA की रिपोर्ट में सरकारों से वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक धन के इस्तेमाल की अधिक गहन समीक्षा करने और कचरा कम करने, पुन: उपयोग तथा रीसाइक्लिंग को प्राथमिकता देने की अपील की गई है। जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में प्रयासरत देशों के सामने अब यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या कचरा जलाकर ऊर्जा पैदा करने वाली तकनीक को वास्तव में स्वच्छ, नवीकरणीय या कम कार्बन उत्सर्जन वाले ऊर्जा विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए।

