भारत में संगीत अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक सशक्त माध्यम बन गया है। ग्रैमी विजेता रिकी केज, ‘इंडियन ओशन’ बैंड, हिप-हॉप रैपर्स, बॉलीवुड कलाकारों (शंकर महादेवन, जुबिन नौटियाल, सोना मोहपात्रा) और लोक कलाकारों द्वारा गाए जाने वाले पर्यावरण-केंद्रित गीत पेड़, पहाड़, नदियाँ और ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर मुद्दों पर जनता को जागरूक कर रहे हैं। भाषणों के मुकाबले संगीत लोगों के दिलों पर सीधा असर डालता है, जिससे यह आम किसानों से लेकर युवाओं तक जलवायु संकट को समझाने और एक हरित भविष्य की उम्मीद जगाने का सबसे प्रभावी हथियार बन गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : जब मंच पर गिटार बजता है तो अब सिर्फ प्यार की बात नहीं होती, बल्कि पेड़, पहाड़, नदी और गर्म होती धरती की भी बात होती है। भारत के युवा और दिग्गज संगीतकार अपने गीतों के जरिए पर्यावरण बचाने का अलख जगा रहे हैं।
ग्रैमी से लेकर गांव के मेले तक – ग्रीन म्यूजिक की लहर
वैश्विक मंच से संदेश – रिकी केज
तीन बार ग्रैमी जीत चुके बेंगलुरु के रिकी केज पर्यावरण संगीत के सबसे बड़े चेहरे हैं। हाल ही में ऑक्सफोर्ड में हुए Skoll World Forum में उनका शो “One With Earth Song” चर्चा में रहा। मंच पर फर्न के पत्ते, आदिवासी गायक और उनके बोल – “हम धरती पर नहीं, धरती के साथ हैं”।
इंडियन ओशन बैंड – रॉक से क्रांति
पर्यावरण विज्ञान में पीएचडी कर चुके राहुल राम का बैंड इंडियन ओशन 20 साल से यही कर रहा है। उनका नया गाना ‘तू है’ क्लाइमेट रिफ्यूजी, पिघलते ग्लेशियर और पॉल्यूशन पर है। बेंगलुरु के Nature inFocus फेस्टिवल में राहुल ने कहा, “गाना साझा संदेश देता है, इसीलिए हम इसे एंथम कहते हैं।”
हिप-हॉप से गांव की कहानी – क्लाइमेट इमरजेंसी मिक्सटेप
सबसे नया प्रयोग है Youth Ki Awaaz का ‘क्लाइमेट इमरजेंसी मिक्सटेप’। 6 राज्यों के 6 रैपर्स:
– देवांशी का ‘निसर्गाचा कायदा’ (मराठी रैप): महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश, सूखा और आदिवासी विस्थापन की कहानी।
– गमक सिन्हा का ‘मिट्टी’: मिट्टी खुद बोलती है – “केमिकल ने मुझे बंजर कर दिया, किसान दुखी है।”
– माही जी और ग्रीनपीस का ‘हीटवेव राइजिंग’: ऑटो वाले, सफाईकर्मी, ठेले वालों की कहानी जो लू में सबसे ज्यादा झुलसते हैं।
बॉलीवुड भी पीछे नहीं
शंकर महादेवन, सुनिधी चौहान, शान और आयुष्मान खुराना ने UN के साथ ‘टिक टिक प्लास्टिक’ गाना बनाया। बोल हैं – “हर तरफ बिखरा पॉलिथीन, बोतल, स्ट्रॉ।”
जुबिन नौटियाल का नया गाना ‘बर्बाद’ (2026) हिमालय के उजड़ते जंगलों पर है – “हमने पेड़ काटे और अब सोचते हैं घर जैसा सुकून क्यों नहीं।”
अर्थ डे 2026 पर सोना मोहपात्रा ने ओडिशा के सिजिमाली पहाड़ों को बॉक्साइट खनन से बचाने वाली आदिवासी महिलाओं को अपना गाना समर्पित किया।
लोकगीत में छुपा विज्ञान
छत्तीसगढ़ के चक्रधर समारोह में ‘जल-जंगल-जमीन’ के गीत गूंजते हैं, तो बुंदेलखंड में हरिशंकर आचार्य बुंदेली में गाते हैं – “स्वच्छ पर्यावरण सबहि को प्यारो, खेती जैविक करो यही विनती हमारी।”
क्यों असरदार है संगीत?
विशेषज्ञ मानते हैं कि भाषण से ज्यादा गाना दिल में उतरता है। जब रैपर अपनी भाषा में कहता है कि “तनपुरे का तूंबा गर्मी से सूख गया”, तो गांव का किसान भी समझ जाता है कि जलवायु परिवर्तन किताब की बात नहीं, उसकी रोजी-रोटी की बात है।
संगीत अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, चेतावनी भी है – और उम्मीद भी।
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